मेरठ के आधुनिक कृषि यंत्रों की पूरे देश में है धाक, पढ़िए- अमर उजाला की ये खास रिपोर्ट
गन्ना बेल्ट के रूप में मशहूर पश्चिमी उप्र की खेती का स्वरूप पूरी तरह से बदल चुका है। परंपरागत खेती अब आधुनिक खेती में बदल चुकी है। इस बदलाव के वाहक बने हैं आधुनिक कृषि यंत्र। जिन्हें बनाने में मेरठ की दो नामचीन कंपनियां भी शामिल हैं...
मेरठ में गंगा-यमुना दोआब की यह धरती देश में सिर्फ उपजाऊ खेती-किसानी के लिए ही नहीं जानी जाती, यहां के कृषि यंत्रों की धाक भी पूरे देश में है। समय चक्र के साथ खेती में व्यापक बदलाव आ चुका है। इस परिवर्तन के सहयात्री मेरठ में बनने वाले कृषि यंत्र भी हैं। कृषि यंत्र बनाने वाली मेरठ की नामचीन कंपनी मित्तल इंजीनियरिंग वर्क्स 1957 में ही अस्तित्व में आ गई थी। हंस इंजीनियरिंग वर्क्स की स्थापना 1969 में हुई। पश्चिमी उप्र में खेती में तकनीक को जो बढ़ावा मिला, उसमें दोनों ही कंपनियों का अहम योगदान है।
मेरठ और आसपास ही नहीं इनके कृषि यंत्र के देश के कोने-कोने में पहुंच रहे हैं। खासकर मेरठ और पश्चिमी उप्र के किसान तो पंजाब में बनने वाले यंत्रों की बजाय मेरठ में बनने वाले कृषि यंत्रों को ही तरजीह दे रहे हैं। दोनों कंपनियां किसानों की मांग और वक्त की जरूरत के हिसाब से कृषि यंत्र तैयार कर रही हैं। इसमें परंपरागत हैरो और टिलर के साथ ही आधुनिक कृषि यंत्रों में शामिल हो चुके रोटावेटर, सब सोयलर (चिजलर), हाइड्रोलिक एमबी प्लाऊ, डिस्क प्लाऊ, मोल्ड बोर्ड प्लाऊ, गन्ना पेड़ी प्रबंधन यंत्र, ईख जोतने वाला कल्टीवेटर के साथ ही तमाम उपकरण शामिल हैं। यह किसानी को आसान बन रहे हैं।
यंत्रों से फायदे का सौदा हुई खेती
हंस इंजीनियरिंग वर्क्स की एमडी प्रीति अग्रवाल कहती हैं 30-35 साल पहले तक किसान पशु चालित यंत्रों का इस्तेमाल कर खेती करते थे। 15-20 सालों से आधुनिक यंत्रों की तरफ किसानों का रुझान तेजी से बढ़ा है। पश्चिमी यूपी के किसान भी पंजाब के किसानों की तरह आधुनिक खेती और यंत्रों की तरफ अग्रसर हुए हैं। जैसे-जैसे किसानी आधुनिक हो रही है, यह फायदे में भी तब्दील हो रही है।
तकनीक ने दोगुना किया उत्पादन
मित्तल इंजीनियरिंग वर्क्स के एमडी शुभेंद्र मित्तल बताते हैं कि 2005 के बाद से कृषि यंत्रों में उल्लेखनीय प्रगति हुई। पिछले 4 सालों में तो जैसे क्रांति आ गई। गहरी जोताई और बोआई का चलन होने से किसान आधुनिक कृषि यंत्रों की तरफ बढ़ रहा है। इससे उन्हें फायदा भी मिल रहा है। पहले जहां प्रति बीघा 40 से 45 कुंतल गन्ना निकलता था, अब 100 से 120 कुंतल तक गन्ना निकल रहा है।
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