‘गैलन साहब’ के बंदोबस्त की आड़ में बड़ा खेल, गलत अनुवाद से करोड़ों की जमीन पर कब्जा
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मेरठ में वक्फ बोर्ड की संपत्तियों में करोड़ों का खेल सामने आया है। मालिकाना हक को लेकर किए गए अनुवाद में पहले करोड़ों की संपत्ति ठिकाने लगा दी गई और जब आयुक्त ने मुकदमा दर्ज कराने के निर्देश दिए तो उसमें भी बहानेबाजी कर दी गई। बहाना बनाया गया कि गैलन साहब के नक्शों का अनुवाद नहीं हो पा रहा है, क्योंकि उर्दू, फारसी का अनुवाद करने वाला कोई नहीं मिल रहा है। जानें क्या था पूरा माजरा :-
1359 फसली रिकॉर्ड से होती है रिकॉर्ड की पुष्टि
उत्तर प्रदेश में राजस्व रिकॉर्ड की सत्यता की पुष्टि अभिलेखों में दर्ज 1359 फसली रिकॉर्ड से होती है। उसी समय उत्तर प्रदेश में जमींदारी उन्मूलन हुआ था। लिहाजा उसी समय से रिकॉर्ड की पुष्टि की जाती है। यह सारा रिकॉर्ड उस अफसर के बंदोबस्त पर कराया गया, जिसे वाह साहब नाम दिया गया। ये नक्शे और अभिलेख साल 1936 में दर्ज कराए गए और आज भी वाह साहब के नाम से ही जाने जाते हैं। वाह साहब के रिकॉर्ड का आधार है गैलन साहब का बंदोबस्त।
वर्ष 1896-97 से 1936 तक का रिकॉर्ड यदि तलाशना है तो गैलन साहब का बंदोबस्त चेक करना होगा। यदि वर्तमान में भी किसी जमीन का वास्तविक रिकॉर्ड तलाशना हो तो वाह साहब और उससे पूर्व गैनल साहब के बंदोबस्त के अभिलेखों से ही पुष्टि की जाती है। ये नक्शे ही पुष्ट करते हैं कि संपत्ति का वास्तविक मालिक कौन है। इस रिकॉर्ड से लेकर वर्तमान तक का सारा रिकॉर्ड मिलाया जाता है तो तभी यह साबित होता है कि जमीन का कब-कब नामांतरण हुआ।
उर्दू, फारसी में हैं यह दस्तावेज
वाह साहब और गैलन साहब के अधिकतर दस्तावेज उर्दू एवं फारसी में हैं। रिकॉर्ड अभिलेखागार में सुरक्षित इन दस्तावेजों का अध्ययन करने के लिए विशेष रूप से अनुवादकों की मदद ली जाती है। अनुवाद इसका हिंदी और अंग्रेजी दोनों में तर्जुमा कर रिपोर्ट तैयार करते हैं।
गलत अनुवाद पर बोर्ड ने छोड़ दी जमीन
वक्फ बोर्ड की जमीनों पर मेरठ में लगातार कब्जे हुए हैं। करोड़ों की संपत्ति के खेल उजागर हुए हैं। कई मामलों में वक्फ बोर्ड ने कह दिया कि यह खेवट तथा खसरा नंबर वक्फ के नहीं हैं। दरअसल बोर्ड ने तहसील की रिपोर्ट के आधार पर इन नंबरों को मुक्त किया। बोर्ड ने उस रिपोर्ट को आधार बनाया जिसमें तहसील कर्मियों ने ही इन नंबरों का गलत अनुवाद कर दिया और उसे बोर्ड को भेज दिया। बाद में जांच हुई तो यह भी मान लिया कि गलती हो गई।
अब्दुल्लापुर का मामला उदाहरण
हाल ही में अब्दुल्लापुर में पचास करोड़ रुपये की जमीन को वक्फ बोर्ड ने ऐसे ही मुक्त किया। जांच में सामने आ गया है कि राजस्व टीम ने अनुवाद भी गलत किया और अभिलेखागार में खेल हुआ। हालांकि लेखपाल को सस्पेंड कर दिया गया है। सरधना रोड की एक प्रॉपर्टी में भी तहसील की संदिग्ध भूमिका सामने आई है। यहां कथित मुतवल्ली ने शिया वक्फ बोर्ड का एक फर्जी लेटर बनाया जिसमें कहा गया कि इस संपत्ति को बेचकर दूसरी जगह संपत्ति ले ली जाए। अन्य भी संपत्तियां ऐसी हैं।
एफआईआर की बजाय तहसील की बहानेबाजी
अब्दुल्लापुर प्रकरण में आयुक्त स्तर पर जांच के बाद कार्रवाई के निर्देश दिए गए। कहा कि डीएम सारी रिपोर्ट वक्फ बोर्ड को प्रेषित करें। तत्कालीन लेखपाल और ईआरके के खिलाफ कार्रवाई हो। एसडीएम की रिपोर्ट को आधार बनाकर संबंधित पर मुकदमा दर्ज कराया जाए। एमडीए अवैध निर्माण तोड़े। एफआईआर को लेकर जब शिकायतकर्ता हसीन नकवी ने मुख्यमंत्री जन सुनवाई पोर्टल पर शिकायत की तो सभी ने अपना बचाव शुरू कर दिया।
जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी ने डीएम को रिपोर्ट भेज दी कि वह राजस्व विभाग के किसी भी कर्मचारी पर कार्रवाई करने में सक्षम प्राधिकारी नहीं हैं। तहसील से रिपोर्ट मांगी तो लेखपाल ने रिपोर्ट लगा दी कि प्रकरण तो गंभीर है। लेकिन वाह साहब के अलावा गैलन साहब के बंदोबस्त दस्तावेजों का उर्दू व फारसी से अनुवाद करने को अनुवादक की तलाश की जा रही है। आसपास जिलों में तलाश हो रही है
एक्शन होगा, कब्जा मुक्त कराएंगे
जिलाधिकारी अनिल ढींगरा के मुताबिक मैं पूरे प्रकरण को दिखवाता हूं। आयुक्त के निर्देश का पालन होगा। यदि एफआईआर की बात है तो होगी। लापरवाही करने पर एक्शन होगा और वक्फ की जमीन को कब्जा मुक्त कराएंगे।
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