उल्देपुर प्रकरण: 10 साल में 2400 से ज्यादा बैनामे, सर्किल रेट से 10 गुना कीमत पर बिकी जमीन
मेरठ के उल्देपुर में 10 साल में 2400 से अधिक बैनामे होने का मामला सामने आया है। सुप्रीम कोर्ट के न्यायिक आयोग ने अवैध कॉलोनियों का निरीक्षण कर जमीन की खरीद-फरोख्त और मेडा की भूमिका की जांच की।
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सरकारी अभिलेखों में उपजाऊ और लाल डोरा चिह्नित उल्देपुर गांव की भूमि पर प्रॉपर्टी एजेंटों ने बिना किसी अनुमति या भू-उपयोग बदलवाए धड़ल्ले से अवैध कॉलोनियां विकसित कर दीं। यहां सर्किल रेट से दस गुना अधिक कीमत पर पिछले 10 साल में करीब 2400 बैनामे कराए गए।
सवाल उठ रहा है कि तीन हजार की आबादी वाले गांव में इतने बैनामे कैसे हुए? चर्चा है कि पल्लवपुरम की पॉश कॉलोनी में रहने वाले लोगों ने यहां अवैध कॉलोनियां विकसित कीं या प्लॉट खरीदकर निवेश किया। याचिकाकर्ता लोकेश खुराना का कहना है कि उनके पास इसके सारे प्रमाण हैं, जिन्हें वे सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित न्यायिक आयोग को सौंपने का प्रयास करेंगे।
आरोप है कि यह पूरा खेल मेरठ विकास प्राधिकरण (मेडा) के अधिकारियों की सांठगांठ से हुआ, जो कार्रवाई के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति करते रहे। मेडा ने जनपद को चार जोन में बांटा है। जोन-ए में 16,726 भवनों को अवैध घोषित कर 21 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट में आख्या प्रस्तुत की गई थी। वहीं, जोन-बी में उल्देपुर गांव आता है, जहां सबसे ज्यादा अवैध कॉलोनियां विकसित हुईं और यहां निकिता सिंह पिछले दो साल से जोन प्रभारी के रूप में तैनात हैं।
प्राधिकरण के दस्तावेजों में उल्देपुर की 12 से ज्यादा अवैध कॉलोनियों पर ध्वस्तीकरण की कार्रवाई दर्ज है, लेकिन सवाल यह है कि ध्वस्तीकरण के बावजूद यहां कॉलोनियां कैसे दोबारा विकसित हो गईं। हालात यह हैं कि विद्युत विभाग ने खंभे लगाकर बिजली लाइन चालू कर दी, लोग मकान बनाकर रहने लगे और बाहर बाजार तक बन गई, लेकिन प्राधिकरण आंखें मूंदे रहा। अफसरों में खलबली,
सुप्रीम कोर्ट द्वारा न्यायिक आयोग के गठन के बाद अब प्राधिकरण ने रजिस्ट्री विभाग से पिछले 10 साल के बैनामों का सारा लेखा-जोखा निकाला है। सुप्रीम कोर्ट ने इन अवैध कॉलोनियों को विकसित कराने का जिम्मेदार विकास प्राधिकरण को माना है और पिछले 5 साल में तैनात रहे उपाध्यक्ष, सचिव, जोन प्रभारी व अन्य कर्मचारियों का पूरा ब्यौरा मांगा है। जिम्मेदार अफसरों पर कड़ी कार्रवाई की तलवार लटक गई है, जिससे मेडा में खलबली मची है और अधिकारी अब अपने दस्तावेज पूरे करने में जुटे हैं।
विकास प्राधिकरण से दस्तावेज लिए और उल्देपुर का मुआयना करके न्यायिक आयोग के दोनों पूर्व न्यायधीश शाम को वापस दिल्ली लौट गए। अब आयोग की जांच रिपोर्ट से ही उल्देपुर के भविष्य की तस्वीर साफ होगी। इस पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं। आयोग की टीम के उल्देपुर पहुंचने के बाद बिल्डरों से लेकर कॉलोनियों में रहने वाले लोगों तक की बेचैनी बढ़ गई है। हर किसी के मन में यही सवाल है कि जांच के बाद आखिर क्या होगा और प्रकरण में आगे प्रशासन की ओर से क्या कदम उठाए जाएंगे।
आयोग की जांच को इस मामले में अहम माना जा रहा है। आयोग की टीम करीब दोपहर 2:30 बजे लावड़-सोफीपुर मार्ग स्थित उल्देपुर पहुंची। आयोग की टीम ने कॉलोनियों का क्षेत्रफल, वहां किस स्तर तक विकास कार्य कराए गए हैं और कितने लोग रह रहे हैं, जैसे बिंदुओं पर जानकारी ली गई है। मौके पर नक्शे का अवलोकन कर वास्तविक स्थिति को समझने का प्रयास किया गया। निरीक्षण के दौरान जुटाई गई जानकारी प्रकरण की आगे की जांच के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
प्रॉपर्टी एजेंटों ने लोगों को सपना दिखाकर बना डाली अवैध कॉलोनियां
उल्देपुर गांव में विकसित अवैध कॉलोनियों को देखकर सुप्रीम कोर्ट के न्यायिक आयोग के अध्यक्ष पूर्व न्यायाधीश सुधांशु धूलिया और पूर्व न्यायाधीश ब्रह्म सिंह वर्मा भी हैरान रह गए। उन्होंने कहा कि प्रॉपर्टी एजेंटों ने लोगों को सपने दिखाकर इन कॉलोनियों का निर्माण किया है। बाउंड्रीवाल की रंगीन दीवारों, मुख्य गेट पर बनी मार्केट और दुकानों को देखकर उन्होंने दस्तावेजों की जांच की और अंदेशा जताया कि यहाँ प्रॉपर्टी को कई बार बेचा गया है।
न्यायिक आयोग इस बात की जांच कर रहा है कि इन कॉलोनियों की जमीन किसकी थी, खरीद-फरोख्त कैसे हुई और लंबे समय तक अवैध निर्माण होने के बावजूद प्राधिकरण ने कार्रवाई क्यों नहीं की। जांच का मुख्य पहलू यह है कि क्या इसमें प्राधिकरण के अधिकारियों की मिलीभगत थी। निरीक्षण के दौरान स्थानीय लोगों से कोई बातचीत किए बिना दोनों पूर्व न्यायाधीशों ने दस्तावेज लेकर भौगोलिक स्थिति को बारीकी से समझा। वर्तमान में यहाँ मार्केट और दुकानों के साथ-साथ लोग घर बनाकर रह रहे हैं।