बगावत पर उतरे पुलिस वाले, महकमे में मची खलबली, अफसरों के आगे बड़ी चुनौती
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यूपी में 2019 लोकसभा चुनाव की सरगर्मी तेज हो गई। छोटी-छोटी घटनाओं को तूल देकर सियासी मोड़ दिया जा रहा है। विपक्ष ही नहीं सत्ताधारी नेता भी पुलिस के लिए सिरदर्द बन रहे हैं। राजनीतिक हस्तक्षेप पर अधिकारियों का बैकपुट पर आना पुलिस वालों को गवारा नहीं है। वे उच्चाधिकारियों के खिलाफ बगावत के सुर में बोलने लगे हैं। इसका असर सोशल साइट पर रोजाना दिखने लगा है। इसे लेकर पुलिस विभाग में खलबली है। पुलिस वालों और नेताओं के आचरण को लेकर मुख्यमंत्री ने नाराजगी भी जताई थी। अधिकारियों का मानना है कि मेरठ जोन में बदमाशों के एनकाउंटर से अपराध का ग्राफ गिरा है। लेकिन अब क्राइम कंट्रोल से ज्यादा कानून व्यवस्था बनाने की चुनौती है। इसको देखते हुए कप्तान थानों की जिम्मेदारी को प्रबंधन से जोड़ रहे हैं।
राजनीतिक हस्तक्षेप से बैकपुट पर पुलिस
कंकरखेड़ा में होटल में दरोगा की पिटाई का प्रकरण, गाजियाबाद में भाजपा विधायक के भतीजे का चालान काटने पर इंस्पेक्टर, चौकी इंचार्ज व सिपाही का निलंबन व दूसरे जिले में ट्रांसफर, इंचौली के बिसौला गांव में दो समुदाय के लोगों में विवाद में क्रास केस, दो अप्रैल को हिंसा के मामले में पुलिस का बैकपुट पर आना आदि मामलों में पुलिस वाले ही अपने अफसरों के खिलाफ उतर गए। राजनीतिक हस्तक्षेप हुआ तो भी पुलिस को बैकपुट पर आना पड़ा। पुलिस वालों ने काली पट्टी बांधकर विरोध किया। आंदोलन की चेतावनी दी। प्रदेश के सभी जिलों में पुलिस वाले अधिकारियों के खिलाफ आवाज भी उठाने लगे।
बागी नहीं होने चाहिए पुलिस वाले
लोकसभा चुनाव सर पर है, ऐसे माहौल में पुलिस वाले अपने विभागीय अधिकारियों व सत्ताधारी नेताओं के खिलाफ बागी नहीं होने चाहिए। मुख्यमंत्री व डीजीपी ने सभी कप्तानों को इसके प्रति खास निर्देश दिए हैं। पुलिस वाले किसी सूरत में नाराज न हों, शासन भी इसको लेकर गंभीर है। चुनाव से पहले पुलिस की भर्ती की प्रक्रिया भी पूरी करने की कवायद चल रही है। इसको देखते हुए कप्तानों ने अपना रवैया थोड़ा बदला है। चर्चा है कि थाने की जिम्मेदारी भी नए दरोगा या हाल में बने इंस्पेक्टरों को ज्यादा दी जा रही है।
केस : एक
कंकरखेड़ा में होटल में दरोगा को भाजपा पार्षद ने पीटा। पार्षद के पक्ष में भाजपा उतर गई। मुख्यमंत्री से भी शिकायत की गई। चौतरफा दबाव पड़ते ही पुलिस बैकपुट पर आई। पार्षद पर लगी डकैती की धारा हटाकर दरोगा और महिला वकील पर जानलेवा हमले की रिपोर्ट दर्ज कर ली गई। जिससे पुलिस महकमे में अफसरों के खिलाफ आक्रोश है। सोशल साइट पर पुलिस वालों ने सत्ताधारी नेताओं और नेताओं के खिलाफ खराब मैसेज पोस्ट किए।
केस : दो
गाजियाबाद में भाजपा विधायक के करीबी का चालान काटने पर इंस्पेक्टर समेत तीन पुलिस वालों को निलंबित कर दूसरे जनपद में ट्रांसफर कर दिया गया। इसको लेकर पुलिस अधिकारियों के खिलाफ खुद पुलिस वालों ने फेसबुक पर पोस्ट डाली। एफबी पर पुलिस व नेताओं ने एक दूसरे पर कमेंट किए। कानून व्यवस्था को लेकर अफसरों में खलबली मची रही।
केस : तीन
दो अप्रैल को दलितों के बंद के दौरान मेरठ पुलिस ने कई लोगों को जेल भेज दिया। इसको लेकर पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठे। जातीय संघर्ष फैलने लगा। सरधना, इंचौली, मवाना, किठौर समेत कई जगहों पर जातीय संघर्ष हुआ। पुलिस ने कानून व्यवस्था बनाने के लिए कई गांव में पुलिस फोर्स तैनात कर दी। पुलिस के साथ पीएसी और आरएएफ भी लगानी पड़ी। कानून व्यवस्था खराब न हो, इसको देखते आज भी सरधना, इंचौली में पुलिस तैनात है।
केस : चार
इंचौली के बिसौला गांव में दो संप्रदायों में हुए विवाद हुआ। दोनों तरफ से पुलिस ने मुकदमा पंजीकृत किया। भाजपा सांसद, विधायक समेत कई नेता एक पक्ष के लोगों की तरफ से पैरवी करने लगे। पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठाए। नतीजा हुआ कि पुलिस ने एक मुकदमे में एफआर लगा दी। इसको लेकर एफबी पर पुलिस वालों के खिलाफ लोग मैसेज पोस्ट कर रहे हैं। तनाव की स्थिति बन रही है।
आगामी लोकसभा चुनाव को देखते पुलिस अलर्ट है। छोटे-छोटे मामलों को कुछ लोग तूल देने का प्रयास भी करते हैं। कानून व्यवस्था को लेकर पुलिस सतर्क है। पुलिस वाले खिलाफ नहीं हैं। मेरठ जोन में क्राइम कंट्रोल है और कानून व्यवस्था भी बेहतर रखेंगे। -प्रशांत कुमार, एडीजी मेरठ जोन
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