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जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव: सपा और रालोद के खेमे में सन्नाटा, अब इस रणनीति पर काम कर रही भाजपा

Fri, 18 Jun 2021 01:52 PM IST
कपिल kapil न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अनुज मित्तल, मेरठ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अनुज मित्तल, मेरठ Published by: कपिल kapil Updated Fri, 18 Jun 2021 01:52 PM IST
सार

जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव को लेकर भाजपा अब अलग रणनीति पर काम रही है। वहीं बसपा के रुख से झटका खाए सपा-रालोद खेमे में सन्नाटा है।

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Meerut District Panchayat President Election: BJP is working on the strategy of unopposed election in Meerut
भाजपा। - फोटो : amar ujala

विस्तार

मेरठ में जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव में विपक्षी दलों पर बढ़त बना चुकी भाजपा, अब निर्विरोध निर्वाचन की रणनीति पर काम कर रही है। भाजपा नेताओं की कोशिश है कि विपक्षी प्रत्याशी को अनुमोदक व प्रस्ताव तक न मिल पाए। वहीं बसपा के रुख से झटका खाए सपा-रालोद खेमे में सन्नाटा है।

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भाजपा ने गौरव चौधरी कुसैड़ी को प्रत्याशी घोषित किया है। भाजपा के 33 में से मात्र पांच जिला पंचायत सदस्य ही जीत कर आए थे। लेकिन भाजपा ने बहुत ही सधी हुई रणनीति पर चलते हुए अपना प्रत्याशी घोषित किया। जनप्रतिनिधि और संगठन के लोग विपक्ष के सदस्यों को भाजपा प्रत्याशी के पक्ष में करने के लिए जुट गए। परिणाम यह हुआ कि जब तक सपा-रालोद गठबंधन अपना प्रत्याशी घोषित करता, तब तक भाजपा प्रबंधन को अंतिम रूप दे चुकी थी। 
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विपक्ष का खेल गुटबाजी से बिगड़ गया। रालोद के पास कोई प्रत्याशी नहीं था। सपा में गुटबाजी के चलते प्रत्याशी तय नहीं हो पाया। धनबल के इस चुनाव में सपा के पास भी कोई ऐसा प्रत्याशी नहीं था जो चुनाव प्रबंधन कर सके। ऐसे में बसपा की सलोनी गुर्जर को सपा ज्वॉइन कराकर विपक्ष का साझा प्रत्याशी घोषित कर दिया गया। इस कदम से बसपा नेता उखड़ गए और उन्होंने घोषणा कर दी कि वह सपा प्रत्याशी का समर्थन नहीं करेंगे। इससे भाजपा को जहां बल मिल गया तो बसपा के सदस्यों को विकल्प चुनने का रास्ता मिल गया। 

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भाजपा नेताओं का दावा है कि वर्तमान में उनके पास बहुमत से ज्यादा सदस्यों का समर्थन है। भाजपा नेताओं की मानें तो वे सपा प्रत्याशी को छोड़कर बाकी उनके पास प्रस्तावक और अनुमोदक तक के लिए सदस्य नहीं छोड़ना चाहते हैं। 

अखिलेश से मुलाकात के बाद भी नहीं आई सक्रियता
सपा की गुटबाजी की बात जब राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव तक पहुंची तो पार्टी नेताओं को तलब किया गया। पहले प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम से स्थानीय सपा नेताओं की वार्ता हुई और उसके बाद अखिलेश यादव से मिले। तय हुआ कि सभी एकजुट होकर अपना प्रत्याशी चुनाव में उतारें और मजबूती से लड़ाएं। लेकिन राष्ट्रीय अध्यक्ष के दरबार में भी हाथ तो मिले, लेकिन सपा नेताओं के मन नहीं मिल पाए। यूं भी कह सकते हैं कि अब बाजी काफी हद तक हाथ से निकल चुकी है।

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