मिशन 2019: पश्चिम की इन सीटों पर बिरादरियों का मूड सबसे बड़ा पेंच, हर सीट पर टक्कर का मुकाबला
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सपा, बसपा और रालोद के बीच गठबंधन होने से पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सात सीटों पर जातीय समीकरण इस बार काफी बदल गए हैं। हर सीट पर प्रत्याशियों का अपना गणित है। किसी को मतों के बिखराव की चिंता है तो किसी को अपने वोट बैंक में सेंध लगने की। लगभग हर सीट पर तमाम समीकरण पक्ष में होने के बावजूद कई प्रत्याशियों को चुनाव में काफी उलझना पड़ रहा है। इससे इन सीटों पर चुनाव काफी दिलचस्प हो गया है। मतदान के दिन अपने पक्ष के वोटरों को घर से निकालना भी एक बड़ा पेंच है। किस सीट पर किस प्रत्याशी के सामने क्या पेंच फंसा है, इस पर अमर उजाला की रिपोर्ट...
मेरठ-हापुड़ लोकसभा सीट
वोटों के बंटवारे के पेंच में फंसे प्रत्याशी
भाजपा प्रत्याशी राजेंद्र अग्रवाल इस सीट से लगातार दो बाद सांसद बन चुके हैं, हैट्रिक पर नजर है। उनके सामने सबसे बड़ा पेंच भितरघात का है। प्रत्याशी चयन के समय ही पार्टी की अंतर्कलह सामने आ गई। अंतर्कलह को दूर करने के लिये हालांकि कई बैठकें भी हो चुकी हैं। इसके अलावा दूसरा पेंच है कांग्रेस प्रत्याशी हरेंद्र अग्रवाल। कांग्रेस ने अग्रवाल समाज के हरेंद्र को टिकट देकर वैश्य वोटों में बिखराव की कोशिश की है। बसपा से प्रत्याशी हाजी याकूब कुरैशी मैदान में हैं। उनके सामने पेंच यह है कि मुस्लिमों में अंसारी, सैफी आदि जातियों को कुरैशियों के पाले में खड़ा करना टेढ़ी खीर है, तो वहीं कांग्रेस भी मुस्लिम वोटों में सेंध लगा सकती है। हालांकि इस बार गठबंधन से मजबूत मुस्लिम प्रत्याशी होने की वजह से इस बार मुस्लिम वोटों में बिखराव कम होने की उम्मीद है। दूसरा पेंच अनुसूचित जाति के वोटरों को भाजपा के पाले में जाने से रोकना है। 2014 के चुनाव में भाजपा अनुसूचित जाति के वोटरों में सेंध लगाने में सफल रही थी। कांग्रेस उम्मीदवार हरेंद्र अग्रवाल चुनाव प्रचार तो खूब कर रहे हैं, सभी वर्गों में अपनी उपस्थिति दर्ज कर रहे हैं। पर किसी एक वर्ग या जाति का एकतरफा वोट उनके पक्ष में न दिखना बड़ा पेंच है। चूंकि वोटों का बंटवारा जातीय या सांप्रदायिक आधार पर होने के आसार हैं, इसलिये सभी के लिये मुश्किलें हैं।
सहारनपुर लोकसभा सीट
वोटरों को अपने पाले में सहेजना सबसे बड़ा पेंच
भाजपा प्रत्याशी राघव लखनपाल के सामने बड़ा पेंच यही है कि 2014 की तरह इस बार वोटरों को कैसे सहेजा जाए। इस बार समीकरण बदले हुए हैं। परंपरागत वोटरों के अलावा अनुसूचित जाति और ओबीसी वर्ग का वोट हासिल करना भी चुनौती है। वीरेंद्र सिंह और रामसकल गुर्जर के भाजपा में आने से गुर्जर समाज के वोटरों में पकड़ मजबूत करने का प्रयास है, लेकिन 2014 के चुनाव जैसा मतदान प्रतिशत रखना भी आसान नहीं होगा। बसपा प्रत्याशी हाजी फजलुर्रहमान और कांग्रेस प्रत्याशी इमरान मसूद के सामने भी कुछ ऐसे ही पेंच फंसे हुए हैं, दोनों सर्वाधिक करीब छह लाख मुस्लिम मतदाताओं में दावेदारी कर रहे हैं। गठबंधन का प्रयास बसपा के परंपरागत वोटरों के साथ ही ज्यादा से ज्यादा मुस्लिम मतदाता हासिल करना है, लेकिन सामने कांग्रेस प्रत्याशी इमरान मसूद हैं, जिनकी मुस्लिम मतदाताओं के बीच पकड़ है। मुस्लिम मतों में बंटवारा रोकना गठबंधन प्रत्याशी के लिए सबसे बड़ा पेंच है। पिछले चुनाव में मुस्लिमों के अधिकांश वोट हासिल करने वाले कांग्रेस प्रत्याशी इमरान मसूद के लिए इस बार बड़ी चुनौती है। मुस्लिम मतों के अलावा अन्य जातियों के वोट हासिल करने का पेंच उनके सामने फंसा है। भीम आर्मी भी यहां एक फैक्टर है। इसका समर्थन किसे मिलता है, यह अभी देखना बाकी है।
बागपत लोकसभा सीट
जातियों के चक्रव्यूह को तोड़ने की उलझन
रालोद और भाजपा दोनों के लिए ही बिरादरियों के गणित का पेंच फंस गया है। भाजपा के लिए जाट और अनुसूचित जाति के वोटरों का मूड सबसे बड़ा पेंच है। गठबंधन के चक्रव्यूह को तोड़ने के लिए भाजपा जाट और अनुसूचित जाति के वोटों में सेंधमारी का प्रयास कर रही है। रालोद-सपा-बसपा गठबंधन में मुस्लिम वोट बैंक के साथ जाट और अनुसूचित जाति के मतदाताओं का समीकरण है। पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में जाट वोट बैंक का भाजपा के पाले में ध्रुवीकरण होता रहा है, यही वजह है कि इस बार रालोद भी अपने परंपरागत वोट बैंक को संभालने में जुटा है। सपा का वोट बैंक माने जाने वाले यादव बाहुल्य क्षेत्र में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की रैली कराने की तैयारी है। रालोद के लिए भी जाट, अनुसूचित जाति, गुर्जर और यादव वोट बैंक का मूड बड़ा सवाल है।
मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट
मुजफ्फरनगर में जातीय समीकरणों पर फंसा पेंच
लोकसभा चुनाव में इस बार रालोद अध्यक्ष चौधरी अजित सिंह और भाजपा के संजीव बालियान के बीच सीधा मुकाबला है। भाजपा के लिए जाट मतों में बंटवारे का पेंच फंसा है तो रालोद के लिए अति पिछड़ों और सवर्ण वोटरों का गणित उलझ रहा है। मुस्लिम वोटरों का रुख रालोद की ओर है। अति पिछड़ों और सवर्ण मतदाताओं की गोलबंदी भाजपा करने में जुटी है। दोनों प्रत्याशियों का पेंच जाट और जाटव पर आकर फंसा हुआ है। जाट मतदाताओं पर रालोद और भाजपा दोनों ही दावा जता रहे हैं। इस बार बसपा का कोई प्रत्याशी नहीं होने के कारण एससी वोटर अभी तक चुप्पी साधे हुए है। बसपा का गठबंधन रालोद के साथ है, इसलिए इन पर रालोद मजबूत दावा कर रहा है। लेकिन गांवों में जाट-जाटव के बीच बनी दूरियां उसका पेंच फंसा रही हैं।
कैराना लोकसभा सीट
समीकरणों को बैठाने के लिए लामबंदी की कोशिश
कैराना लोकसभा सीट चुनाव रोचक मोड़ पर पहुंच रहा है। भाजपा प्रत्याशी प्रदीप चौधरी के लिए सबसे ज्यादा मुश्किल अपनों को लेकर ही है। मृगांका का टिकट कटने से कैराना क्षेत्र के गूर्जरों की नाराजगी दूर करना उनकी सबसे बड़ी चुनौती होगी, हालांकि भाजपा ने हाल ही में सपा छोड़ भाजपा में शामिल हुए गुर्जर नेता वीरेंद्र सिंह को इस काम में लगाया है। दूसरी भाजपा की मुश्किल जाट मतदाता है। कांग्रेस प्रत्याशी भी जाट मतदाताओं में सेंध लगा रहे हैं। उपचुनाव में तबस्सुम बेगम रालोद के सिंबल पर चुनाव लड़ी थीं। जयंत चौधरी ने गांव- गांव जाकर उनके लिए वोट मांगे थे। जयंत की वजह से जाट मत तबस्सुम को मिला था, लेकिन इस बार तबस्सुम सपा के सिबंल पर हैं। उनका बड़ा पेंच यही है कि क्या इस बार जाट मतदाता उन्हें मिलेगा। कांग्रेस नेता हरेंद्र मलिक अपने व्यक्तिगत प्रभाव से मतदाताओं के बीच जा रहे हैं, लेकिन क्षेत्र में पार्टी संगठन की कमजोरी उनके लिए बड़ा पेंच बन रही है।
बिजनौर लोकसभा सीट
यहां तो हर किसी का गड़बड़ा रहा गणित
लोकसभा सीट पर भाजपा प्रत्याशी भारतेंद्र सिंह, बसपा प्रत्याशी मलूक नागर व कांग्रेस प्रत्याशी नसीमुद्दीन सिद्दीकी में त्रिकोणीय मुकाबला दिखाई दे रहा है। तीनों प्रत्याशियों में शह मात का खेल चल रहा है। भाजपा प्रत्याशी सांसद भारतेंद्र सिंह के लिए इस बार अपनों की नाराजगी और भितरघात का पेंच फंसा हुआ है। उन्हें भाजपा के परंपरागत वोटों को मनाने में काफी कोशिश करनी पड़ रही है। गठबंधन में रालोद के रहने से भाजपा के जाट वोटों में सेंध लग सकती है। नाराज लोगों को बसपा और कांग्रेस प्रत्याशी भी अपने पाले में करने के लिये जुटे हैं। गठबंधन प्रत्याशी होने की वजह से मुस्लिम, एससी व गुर्जर वोट मलूक नागर के साथ माना जा रहा है। जाट वोटों को एक करने के लिये उन्होंने रालोद के नेताओं की सभा कराई है। कांग्रेस से नसीमुद्दीन के मैदान में उतरने से वह भी मुस्लिम मतों पर जोर लगा रहे हैं। कांग्रेस प्रत्याशी नसीमुद्दीन सिद्दीकी को मुस्लिमों और अन्य जातियों के बीच समर्थन बटोरना बड़ा पेंच है।
नगीना लोकसभा सीट
अपनों की नाराजगी के फंस रहे पेंच
नगीना सुरक्षित लोकसभा सीट पर जातियों से समीकरणों को पार पाना प्रत्याशियों के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। नगीना लोकसभा सीट से भाजपा सांसद डाक्टर यशवंत सिंह, कांग्रेस से ओमवती व बसपा से गिरीशचंद चुनाव मैदान में हैं। भाजपा प्रत्याशी के लिए इस बार सपा, बसपा और रालोद के बीच हुए गठबंधन से पार पाने का पेंच फंसा है। इसके अलावा अपनों की नाराजगी भी उनके लिए मुद्दा बनी है। बसपा ने जाट वोटों में सेंध लगाने के लिए जाट नेताओं को यहां प्रचार में लगाया है।
कांग्रेस प्रत्याशी ओमवती का भाजपा से दल बदलकर कांग्रेस में जाने का पेंच फंसा है। दलबदलू की छवि को वह वोटरों के बीच साफ कर रही हैं। बता रही हैं कि क्यों उन्होंने भाजपा का दामन छोड़ा। बसपा प्रत्याशी गिरीश चंद के सामने भी अपनों को मनाने का पेंच फंसा है। इसके चलते त्रिकोणीय मुकाबला काफी रोचक हो गया है।
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