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लोकसभा चुनाव 2019: मतदान पर नहीं किसी मुद्दे का असर, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण ही आया नजर
Fri, 12 Apr 2019 11:50 AM IST
कपिल kapil
अनुज मित्तल, अमर उजाला, मेरठ
अनुज मित्तल, अमर उजाला, मेरठ
Published by: कपिल kapil
Updated Fri, 12 Apr 2019 11:50 AM IST
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- फोटो : अमर उजाला
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विकास, जाट आरक्षण, गन्ना बकाया भुगतान, सरकारी योजनाएं, तीन तलाक, कानून व्यवस्था, भ्रष्टाचार, राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद जैसे तमाम मुद्दे चुनावी भाषणों में नेताओं की जुबान पर थे। लेकिन मतदान के दिन सब हाशिए पर नजर आए। एक बार फिर से चुनाव सांप्रदायिक ध्रुवीकरण पर ही टिका नजर आया।
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लोकसभा चुनाव 2014 में हालांकि मोदी लहर के बीच मुजफ्फरनगर दंगे के ताजा घावों में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण नजर आया था। लेकिन इस बार भी प्रत्याशियों की नजर इसी ध्रुवीकरण पर थी। इसका असर भी मतदान के दिन साफ नजर आया। शहर से लेकर देहात तक सिर्फ ध्रुवीकरण की बयार चली। गठबंधन से इस सीट पर बसपा के हाजी याकूब कुरैशी चुनाव मैदान में थे, तो भाजपा ने लगातार दो बार के सांसद राजेंद्र अग्रवाल को तीसरी बार चुनाव मैदान में उतारा। इनके बीच कांग्रेस ने भी वैश्य बिरादरी के हरेंद्र अग्रवाल को मैदान में उतारा था।
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बसपा प्रत्याशी एससी-मुस्लिम गठजोड़ के सहारे शुरू से ही मजबूत स्थिति में थे। बसपा प्रत्याशी के पक्ष में एससी और मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण आठ अप्रैल को बसपा सुप्रीमो मायावती की रैली में साफ नजर आ गया था। ऐसे में भाजपा को अपने पक्ष में अन्य हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण की दरकार थी। लेकिन उसकी राह में कांग्रेस के हरेंद्र अग्रवाल कहीं न कहीं बाधा बने नजर आ रहे थे। लेकिन प्रचार के अंतिम दिन 9 अप्रैल को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस कसर को पूरी कर गए। उन्होंने अली और बजरंगबली के साथ ही हरे वायरस का जिक्र कर हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण करने का कार्ड खेल दिया।
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गुरुवार को कैंट विधानसभा से मेरठ शहर, मेरठ दक्षिण और किठौर विधानसभा में यह ध्रुवीकरण साफ नजर आया। मुस्लिम और एससी बहुल बूथों पर बसपा प्रत्याशी के पक्ष में एक तरफा मतदान का रुझान दिखाई दिया तो अन्य बूथों पर भाजपा का बोलबाला रहा। पूरी टक्कर आमने-सामने की होने से कांग्रेस प्रत्याशी मुकाबले से लगभग बाहर नजर आए। जबकि अन्य छोटे दलों और निर्दलियों का तो कुछ पता ही नहीं चला।
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