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मिशन 2019: प्रत्याशी चयन के चक्रव्यूह में फंसी भाजपा, भितरघात का भी डर
Fri, 15 Mar 2019 11:23 AM IST
देव कश्यप
अनुज मित्तल, अमर उजाला, मेरठ
अनुज मित्तल, अमर उजाला, मेरठ
Published by: देव कश्यप
Updated Fri, 15 Mar 2019 11:23 AM IST
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बीजेपी
- फोटो : गूगल
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प्रथम चरण में होने वाले चुनाव की नामांकन प्रक्रिया शुरू होने में चार दिन शेष बचे हैं, लेकिन भाजपा की प्रत्याशी चयन प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है। यूपी में गठबंधन के सामने भाजपा प्रत्याशी चयन के चक्रव्यूह में फंसी है, जीतने वाले प्रत्याशी का चयन चुनौती बन गया है। ऊपर से दावेदारों की लंबी लाइन ने अलग से भाजपा के सामने संकट खड़ा कर दिया है।
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भाजपा इस चुनाव में कोई जोखिम नहीं लेना चाहती है और ऐसे में सिर्फ जिताऊ प्रत्याशी का चयन करना है। लेकिन आपसी गुटबाजी और नेताओं की खेमेबंदी में यह काम किसी चुनौती से कम नहीं है। प्रदेश स्तर पर भाजपा ही नहीं बल्कि संघ नेताओं का दबाव भी प्रत्याशी चयन प्रक्रिया में है। इसमें अहम बात यह है कि आम कार्यकर्ताओं का सर्वे अलग है। पिछले दो दिन के भीतर जो रिपोर्ट तैयार हुई है, उसमें अब आधा दर्जन सीटों पर नए चेहरे उतारने की कवायद शुरू हो गई है।
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भितरघात का भी है डर
भाजपा में 2014 के बाद लगातार दूसरे दलों से नेताओं ने अपनी आमद दर्ज कराई है। ये नेता भी चुनाव लड़ने की लाइन में हैं। वहीं, पुराने निष्ठावान नेता पहले से अपनी दावेदारी दर्ज करा रहे हैं। शायद ही कोई सीट ऐसी हो, जहां पर आधा दर्जन से ज्यादा दावेदार न हों। अब यदि भाजपा वर्तमान सांसदों का टिकट बदल कर नए चेहरों को मैदान में उतारती है, तो उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती बगावत और भितरघात को रोकना होगा। क्योंकि भितरघात में सिर्फ मतदाताओं को उदासीन कर देने भर से भाजपा को झटका लग सकता है।
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प्रत्याशी चयन में हैं कई दबाव
भाजपा के आला नेताओं की धड़ेबाजी भी किसी से छिपी नहीं है। कई प्रभावशाली नेता अपने चहेतों को प्रत्याशी बनाने के लिए लगातार लगे हुए हैं। इसमें कुछ संघ परिवार के नेता भी सक्रिय हैं, जो कुछ प्रभावशाली दावेदारों को टिकट कटवाने और कुछ को दिलाने में सक्रिय हो रहे हैं। इन सबके बीच आम कार्यकर्ताओं की सर्वे रिपोर्ट भी आलाकमान के सामने है। ऐसे में इन तीन दबावों के बीच प्रत्याशी चयन आसान नहीं है। इस चक्रव्यूह को भेदकर प्रत्याशी चयन करना भाजपा के सामने बड़ी चुनौती बना हुआ है।
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