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UP: जातिगत समीकरण तय करेंगे पश्चिम का चुनाव...कड़े मुकाबले से तय होगा हवा का रुख; विपक्षी दलों का ये है प्लान

Tue, 02 Apr 2024 01:20 PM IST
शाहरुख खान राजकुमार सैनी, अमर उजाला, मेरठ
राजकुमार सैनी, अमर उजाला, मेरठ Published by: शाहरुख खान Updated Tue, 02 Apr 2024 01:20 PM IST
सार

पश्चिम का चुनाव जातिगत समीकरण तय करेंगे। भाजपा के कोर वोट बैंक से प्रत्याशी उतारकर विपक्षी पार्टियों ने दांव खेला है। कड़े मुकाबले से हवा का रुख तय होगा।

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Lok Sabha Election 2024 Caste equation will decide western elections
Lok Sabha Election 2024 - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

पश्चिम उप्र की कई लोकसभा सीटें जातिगत समीकरण में उलझती दिख रही हैं। सभी दलों में मुकाबला कड़ा होता नजर आ रहा हैं। पश्चिम की अधिकांश सीटों पर भाजपा जीतती रही है। पिछली बार सपा-बसपा गठबंधन ने बिजनौर, नगीना और सहारनपुर की सीटें जीत ली थीं।  खास बात यह है कि इस बार सपा और बसपा का गठबंधन नहीं है, जबकि रालोद इस बार भाजपा के साथ है। ऐसे में सभी दलों भाजपा के गढ़ में टक्कर देने के लिए जातिगत समीकरणों का सहारा लिया है। सपा और बसपा के इस गणित ने कई सीटों पर मुकाबले को रोचक और सभी दलों के बीच टक्कर का बना दिया है। इन्हीं समीकरणों से जुड़ी राजकुमार सैनी की रिपोर्ट.... 
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कड़े मुकाबले से तय होगा हवा का रुख
मेरठ समेत मुजफ्फरनगर, बिजनौर लोकसभा सीट पर भाजपा, बसपा और सपा- कांग्रेस गठबंधन के बीच कड़ा मुकाबला माना जा रहा है। मुस्लिम मतदाता अभी चुनाव का रुख भांप रहा है। उसकी निगाह बसपा या सपा-कांग्रेस गठबंधन के प्रत्याशियों के सियासी वजूट पर टिकी है। पूर्व के चुनावों में भी ऐसा ही देखने को मिलता रहा है। पश्चिम उप्र में सैनी समेत अति पिछड़ी जातियों के मतदाताओं के बिखराव को रोकने के लिए भाजपा ने हरियाणा के सीएम नायब सैनी और यूपी के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य को उतारा हुआ है। यूपी में केशव प्रसाद मौर्य अति पिछड़ों में काफी पकड़ रखते हैं।
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पश्चिम उप्र में ही नहीं बल्कि पूरे उप्र में त्यागी, ठाकुर, ब्राह्मण, सैनी, प्रजापति, कश्यप, सेन आदि समाज को भाजपा का कोर वोटर माना जाता रहा है। भले ही पश्चिम उप्र में रालोद को जाटों की पार्टी कहा जाता है, लेकिन भाजपा फिर भी जाट समाज से काफी वोट प्रतिशत अपना मानकर चलती है। कारण है कि जाट समाज का प्रतिनिधित्व उप्र और केन्द्र की सरकार में भी है। इस बार रालोद का भाजपा के साथ गठबंधन भी है। रालोद के साथ चलने वाले जाट मतदाता को भाजपा के साथ खड़ा होना बताया जा रहा है। 
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बिजनौर : मुकाबला दिलचस्प होगा
बिजनौर से बसपा प्रत्याशी के रूप में चौ. विजेन्द्र सिंह चुनाव मैदान में हैं। जाट,दलित के साथ अतिपिछड़ों के समीकरण को साधकर चुनाव में ताल ठोके हुए हैं। इस लोकसभा सीट पर काफी संख्या में जाट मतदाता हैं। बिजनौर सीट 2019 के चुनाव में बसपा के खाते में रही है। इसका फायदा भी विजेन्द्र लेने की तैयारी कर रहे हैं। हालांकि भाजपा-रालोद गठबंधन प्रत्याशी चंदन चौहान मीरापुर से रालोद विधायक भी हैं। गुर्जर जाति से ताल्लुक रखते हैं। इनके दादा चौ. नारायण सिंह उप्र के डिप्टी सीएम रहे और पिता संजय चौहान सांसद रहे हैं। इसलिए चंदन चौहान का राजनीति से पुराना रिश्ता रहा है। इसका फायदा भी इनको मिलने की उम्मीद है।  
 

मेरठ में मुकाबला त्रिकोणीय
मेरठ से बसपा ने त्यागी कार्ड खेलते हुए देवव्रत त्यागी को चुनाव मैदान में उतारा है। वहीं भाजपा से इस बार भी वैश्य उम्मीदवार के तौर पर रामायण में श्रीराम का किरदार निभाने वाले कलाकार अरुण गोविल  मैदान में हैं।  उधर, समाजवादी पार्टी ने पहले एससी प्रत्याशी भानु प्रताप सिंह को टिकट दिया था लेकिन अब गुर्जर समाज से अतुल प्रधान को टिकट दिया है। इस बार तीनों हिंदू प्रत्याशी होने के कारण जहां सपा और बसपा के बीच मुस्लिम वोटों की जद्दोजहद होगी वहीं भाजपा के लिए चुनौती होगी कि वह अपना गुर्जर और त्यागी वोट बैंक कैसे बचाए।

पिछले कुछ चुनाव से मेरठ भाजपा का गढ़ रहा है। लेकिन गुर्जर प्रत्याशी भी इस सीट पर जीता है। वहीं बसपा को उम्मीद है कि त्यागी समाज के साथ-साथ दलित और मुस्लिम भी आए तो नतीजे चौंकाने वाले हो सकते हैं। हालांकि भाजपाइयों का मानना है कि पीएम नरंेद्र मोदी के चेहरे के आगे किसी भी तरह के दूसरे समीकरण महत्वहीन है।

सहारनपुर: मुस्लिम कार्ड का खेल
सहारनपुर में स्थिति एकदम जुदा है। यहां भाजपा ने राघव लखनपाल शर्मा को अपना प्रत्याशी बनाया है। सपा-कांग्रेस से इमरान मसूद और बसपा से माजिद अली प्रत्याशी हैं। यहां सबकी निगाह मुस्लिम वोट बैंक पर टिकी है। यदि मुस्लिम वोट में बिखराव होता है तो भाजपा को लाभ मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।

कैराना : चुनाव रोचक मोड़ पर
कैराना लोकसभा सीट पर चुनाव रोचक मोड़ पर आ गया है। यहां हसन परिवार से इकरा हसन सपा-कांग्रेस की उम्मीदवार हैं। बसपा ने श्रीपाल राणा को प्रत्याशी बनाकर भाजपा के ठाकुर वोट बैंक में सेंध लगाने का प्रयास किया है। भाजपा ने गुर्जर समाज के प्रदीप चौधरी दुबारा मौका दिया है। 
 

मुजफ्फरनगर  : वोट बैंक में सेंध की कोशिश
बसपा ने मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट से दारा सिंह प्रजापति को प्रत्याशी बनाकर भाजपा के कोर वोट बैंक में सेंध लगाने का प्रयास किया है। इस सीट पर प्रजापति समाज की भी संख्या काफी बतायी जाती है। उधर दलित व प्रजापति वोट बैंक के समीकरण के साथ बसपा चुनाव मैदान में है। वहीं कांग्रेस-सपा गठबंधन ने हरेन्द्र मालिक को चुनाव मैदान में उतारा हुआ है। इस लोकसभा सीट पर हरेन्द्र मलिक अपने समाज में ही नहीं बल्कि हर समाज में पकड़ रखते हैं। उधर भाजपा ने दो बार से सांसद एवं केन्द्रीय मंत्री संजीव बालियान को मैदान में उतारा हुआ है। जाट समाज के अलावा ओबीसी जातियों में इनका अपना अलग स्थान बताया जाता है। भाजपा के वोट बैंक में इनकी अच्छी पकड़ है। 
 

नगीना  : सुरक्षित सीट पर जोर-आजमाइश
नगीना लोकसभा सीट सुरक्षित से इस बार बीजेपी ने ओमकुमार को प्रत्याशी बनाया है तो सपा ने मनोज कुमार को उतारा है। बसपा ने सुरेन्द्र पाल सिंह चुनाव मैदान में हैं, वहीं आजाद समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद पहली बार लोकसभा चुनाव में भाग्य आजमा रहे हैं। सभी प्रत्याशी अनूसूचित जाति के वोट बैंक में सेंध लगाने की रणनीति बनाए हुए हैं।

 

बागपत  : एक-दूसरे के वोट पर चोट
रालोद-भाजपा गठबंधन ने जाट बिरादरी के डा. राजकुमार सांगवान को मैदान में उतारा हुआ है तो सपा-कांग्रेस गठबंधन ने भी जाट कार्ड खेलते हुए मनोज चौधरी को प्रत्याशी बनाया है। जबकि बसपा ने गुर्जर बिरादरी की काफी वोटों को देखते हुए प्रवीण बंसल पर दांव खेला है। क्योंकि यहां सबसे ज्यादा करीब 28 प्रतिशत मुस्लिम वोटर है तो करीब 22 प्रतिशत जाट वोटर है और करीब दस प्रतिशत गुर्जर वोटर है।  इस तरह के जातीय समीकरण के कारण सभी एक-दूसरे के वोटों में सेंधमारी की तैयारी कर रहे हैं। बसपा अपने कोर वोटर के साथ ही गुर्जर वोट पर नजर गड़ाए है तो सपा ने मुस्लिम व यादव के साथ ही जाट व पिछड़ों पर नजर गड़ाई हुई है। ऐसे में रालोद-भाजपा की जाटों के साथ ही ब्राह्मण, गुर्जर, पिछड़ों, वैश्य पर नजर है। उधर यहां से समाजवादी पार्टी का प्रत्याशी बदला जा सकता है। अमर पाल शर्मा का नाम चर्चा में हैं।
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