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लॉकडाउन की मार, 20 फीसदी रह गया निर्यात
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लॉकडाउन की मार, 20 फीसदी रह गया निर्यात
खेकड़ा। कोरोना संक्रमण काल का खेकड़ा विख्यात हैंडलूम उद्योग पर बड़ा असर पड़ा है और करीब बीस फीसदी ही निर्यात रह गया है। लॉकडाउन से पहले करीब 500 करोड़ रुपये का निर्यात था, जो अब सौ करोड़ रुपये रह गया। हालांकि अनलॉक के बाद उद्यमी हैंडलूम उद्योग को फिर से पटरी पर लाने की कोशिश कर रहे हैं। सरकार ने भी एक जिला एक उत्पाद योजना में उद्योग को शामिल कर रियायतें दी हैं।
जिला मुख्यालय से करीब 12 किमी दूर दिल्ली-सहारनपुर हाईवे पर स्थित खेकड़ा को औद्योगिक नगरी के नाम से जाना जाता है। वर्ष 1972 में यहां हैंडलूम उद्योग की स्थापना की गई। यह उद्योग इस कदर चमका कि कुछ ही सालों में इसकी पहचान विश्व स्तर पर होने लगी। यहां की बनी चादरें, कुशन, पर्दे, सीट कवर, दीवारों के कवर, दरी, टेबिल मेट, कुर्सी और सोफों के कवर आदि ने यूरोप, अमेरिका, हांगकांग, चीन, आस्ट्रेलिया, सिंगापुर, बैंकॉक, जापान, ग्रीस जैसे देशों में धूम मचाई। कुछ इकाइयों का माल तो सीधे विदेशों में ही निर्यात होता था। शेष इकाइयों का माल एजेंसी के माध्यम से विदेशों को निर्यात होता रहा। इस उद्योग के सहारे क्षेत्र के करीब 10 हजार श्रमिकों की रोजी-रोटी चलती है।
कई झंझावत झेल चुका है हैंडलूम उद्योग
एक समय था जब यहां हैंडलूम की करीब 250 इकाइयां स्थापित हो गईं। करीब 50 साल पुराना यह उद्योग अब मात्र एक दर्जन फर्म में सिमट गया है। विश्व बाजार में चीन उत्पादित माल की प्रतिद्वंदिता में यहां के उद्योग को झटका लगा। उद्यमियों ने पावरलूम मशीनें लगाईं। पावरलूम एसोसिएशन के सचिव मुकेश गुप्ता ने बताया कि वर्ष 1996 तक यहां 100 के करीब इकाइयां थीं, जो धीरे-धीरे बंद होती चली गईं। बड़ी वजह बिजली की समस्या रही। बिजली की खराब आपूर्ति होने के कारण यह कारोबार एक दर्जन छोटी-बड़ी कंपनियों में सिमट गया। इनमें चाहत एक्सपोर्ट, कॉन्टिनेंटल होम फर्निशिंग, सूर्या होम फर्निशिंग, बालाजी लूम टैक्स व विवटैक्स बड़ी हैं। अधिकतर श्रमिक इन्हीं में काम करते हैं। अब उद्योगों के लिए अलग बिजलीघर साकरौंद मार्ग पर स्थापित हो चुका है। लेकिन इसमें हुई देरी ने कारोबारियों का बड़ा नुकसान कर दिया। बिजली की कमी के चलते माल प्रतिस्पर्धा में कीमत के मामले में पिछड़ गया। इसके चलते कई खरीदारों ने पानीपत की ओर रुख कर लिया। अब उद्योग कुछ संभला तो कोरोना के चलते श्रमिक पलायन, ऑर्डर कैंसिल होने की मार पड़ गई।
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खेकड़ा को एक्सपोर्ट जोन के रूप में विकसित करें : गुप्ता
खेकड़ा मैन्युफैक्चरिंग एंड एक्सपोर्ट एसोसिएशन के महासचिव मुकेश गुप्ता का कहना है कि सरकार इंटरनेट स्पीड में सुधार करे। पानी निकासी दुरुस्त हो। वाटर ट्रीटमेंट प्लांट की व्यवस्था, बेहतर बैंकिंग सुविधा, श्रम कानूनों को लचीला बनाया जाए। खेकड़ा को एक्सपोर्ट जोन के रूप में विकसित किया जाए। इकाइयों को अपग्रेड किया जाए और उद्यमियों को सरकारी अनुदान छूट पर मिले तो पावरलूम उद्योग फिर से दुनियाभर में छाने को तैयार है।
एक जिला एक उत्पाद योजना से बदल रही तस्वीर
जिला उद्योग केंद्र के उपायुक्त हिमांशु गंगवार का कहना है कि हैंडलूम के एक जिला एक उत्पाद योजना में शामिल होने से रोजगार के अवसर बढ़े हैं। लोन मिल रहा है और कारोबारियों को जिले में ही कच्चा माल उपलब्ध कराने के प्रयास किए जा रहे हैं, जिससे उनकी लागत कम हो और मुनाफा बढ़े।
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खेकड़ा। कोरोना संक्रमण काल का खेकड़ा विख्यात हैंडलूम उद्योग पर बड़ा असर पड़ा है और करीब बीस फीसदी ही निर्यात रह गया है। लॉकडाउन से पहले करीब 500 करोड़ रुपये का निर्यात था, जो अब सौ करोड़ रुपये रह गया। हालांकि अनलॉक के बाद उद्यमी हैंडलूम उद्योग को फिर से पटरी पर लाने की कोशिश कर रहे हैं। सरकार ने भी एक जिला एक उत्पाद योजना में उद्योग को शामिल कर रियायतें दी हैं।
जिला मुख्यालय से करीब 12 किमी दूर दिल्ली-सहारनपुर हाईवे पर स्थित खेकड़ा को औद्योगिक नगरी के नाम से जाना जाता है। वर्ष 1972 में यहां हैंडलूम उद्योग की स्थापना की गई। यह उद्योग इस कदर चमका कि कुछ ही सालों में इसकी पहचान विश्व स्तर पर होने लगी। यहां की बनी चादरें, कुशन, पर्दे, सीट कवर, दीवारों के कवर, दरी, टेबिल मेट, कुर्सी और सोफों के कवर आदि ने यूरोप, अमेरिका, हांगकांग, चीन, आस्ट्रेलिया, सिंगापुर, बैंकॉक, जापान, ग्रीस जैसे देशों में धूम मचाई। कुछ इकाइयों का माल तो सीधे विदेशों में ही निर्यात होता था। शेष इकाइयों का माल एजेंसी के माध्यम से विदेशों को निर्यात होता रहा। इस उद्योग के सहारे क्षेत्र के करीब 10 हजार श्रमिकों की रोजी-रोटी चलती है।
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कई झंझावत झेल चुका है हैंडलूम उद्योग
एक समय था जब यहां हैंडलूम की करीब 250 इकाइयां स्थापित हो गईं। करीब 50 साल पुराना यह उद्योग अब मात्र एक दर्जन फर्म में सिमट गया है। विश्व बाजार में चीन उत्पादित माल की प्रतिद्वंदिता में यहां के उद्योग को झटका लगा। उद्यमियों ने पावरलूम मशीनें लगाईं। पावरलूम एसोसिएशन के सचिव मुकेश गुप्ता ने बताया कि वर्ष 1996 तक यहां 100 के करीब इकाइयां थीं, जो धीरे-धीरे बंद होती चली गईं। बड़ी वजह बिजली की समस्या रही। बिजली की खराब आपूर्ति होने के कारण यह कारोबार एक दर्जन छोटी-बड़ी कंपनियों में सिमट गया। इनमें चाहत एक्सपोर्ट, कॉन्टिनेंटल होम फर्निशिंग, सूर्या होम फर्निशिंग, बालाजी लूम टैक्स व विवटैक्स बड़ी हैं। अधिकतर श्रमिक इन्हीं में काम करते हैं। अब उद्योगों के लिए अलग बिजलीघर साकरौंद मार्ग पर स्थापित हो चुका है। लेकिन इसमें हुई देरी ने कारोबारियों का बड़ा नुकसान कर दिया। बिजली की कमी के चलते माल प्रतिस्पर्धा में कीमत के मामले में पिछड़ गया। इसके चलते कई खरीदारों ने पानीपत की ओर रुख कर लिया। अब उद्योग कुछ संभला तो कोरोना के चलते श्रमिक पलायन, ऑर्डर कैंसिल होने की मार पड़ गई।
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खेकड़ा को एक्सपोर्ट जोन के रूप में विकसित करें : गुप्ता
खेकड़ा मैन्युफैक्चरिंग एंड एक्सपोर्ट एसोसिएशन के महासचिव मुकेश गुप्ता का कहना है कि सरकार इंटरनेट स्पीड में सुधार करे। पानी निकासी दुरुस्त हो। वाटर ट्रीटमेंट प्लांट की व्यवस्था, बेहतर बैंकिंग सुविधा, श्रम कानूनों को लचीला बनाया जाए। खेकड़ा को एक्सपोर्ट जोन के रूप में विकसित किया जाए। इकाइयों को अपग्रेड किया जाए और उद्यमियों को सरकारी अनुदान छूट पर मिले तो पावरलूम उद्योग फिर से दुनियाभर में छाने को तैयार है।
एक जिला एक उत्पाद योजना से बदल रही तस्वीर
जिला उद्योग केंद्र के उपायुक्त हिमांशु गंगवार का कहना है कि हैंडलूम के एक जिला एक उत्पाद योजना में शामिल होने से रोजगार के अवसर बढ़े हैं। लोन मिल रहा है और कारोबारियों को जिले में ही कच्चा माल उपलब्ध कराने के प्रयास किए जा रहे हैं, जिससे उनकी लागत कम हो और मुनाफा बढ़े।