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बरनावा मे दरगाह नहीं लाक्षागृह: सर्वेक्षण में महाभारत काल के साक्ष्य मिले, राजस्व रिकॉर्ड में भी दर्ज है स्थान

Tue, 06 Feb 2024 12:50 PM IST
Dimple Sirohi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बागपत
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बागपत Published by: Dimple Sirohi Updated Tue, 06 Feb 2024 12:50 PM IST
सार

उत्तर प्रदेश के बागपत स्थित बरनावा गांव का प्राचीन ऐतिहासिक टीला महाभारत का लाक्षागृह है न कि शेख बदरुउद्दीन की दरगाह और कब्रिस्तान। इसे लेकर 53 साल से चल रहे वाद पर अदालत ने सोमवार को अपना फैसला सुना दिया। इस  स्थान पर फिलहाल सुरक्षा के लिहाज से पुलिस फोर्स तैनात की गई है।

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Lakshagraha in Barnawa is not a Dargah: Survey found evidence of Mahabharata period, recorded in revenue
बरनावा का एतिहासिक टीला - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

बागपत जनपद में हिंडन और कृष्णा नदी के संगम पर बसे बरनावा गांव स्थित ऐतिहासिक टीला महाभारत का लाक्षागृह है या शेख बदरुउद्दीन की दरगाह व कब्रिस्तान को लेकर 53 वर्षों से न्यायालय में चल रहे वाद पर सोमवार को कोर्ट ने अपना फैसला सुना दिया। बरनावा में दरगाह नहीं, लाक्षागृह की जमीन है और इसलिए ही मुस्लिम पक्ष की याचिका खारिज कर दी गई। 

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बरनावा के रहने वाले मुकीम खान ने वर्ष 1970 में मेरठ की अदालत में दायर किए वाद में लाक्षागृह गुरुकुल के संस्थापक ब्रह्मचारी कृष्णदत्त महाराज को प्रतिवादी बनाया था। इसमें मुकीम खान और कृष्णदत्त महाराज दोनों का निधन हो चुका है। दोनों पक्ष से अन्य लोग वाद की पैरवी कर रहे हैं। जिला अलग हो जाने के बाद अब यह मामला सिविल जज जूनियर डिवीजन प्रथम की कोर्ट में चल रहा था। 

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Lakshagraha in Barnawa is not a Dargah: Survey found evidence of Mahabharata period, recorded in revenue
बरनावा का एतिहासिक टीला पर तैनात पुलिस - फोटो : Amar Ujala

बागपत जनपद के बरनावा के लाक्षागृह में टीले पर पुरातत्व विभाग के सर्वेक्षण में महाभारत काल के साक्ष्य मिले हैं। यह जगह राजस्व रिकॉर्ड में लाखागृह (लाक्षागृह) के नाम दर्ज है, जिसका सरकार से नोटिफिकेशन तक जारी हुआ था। वन विभाग व सरकार से भी हिंदू पक्ष ने जमीन पर मालिकाना हक को लेकर न्यायालय में केस जीता था। इन सभी साक्ष्यों को न्यायालय में रखा गया था और ये सभी साक्ष्य मुस्लिम पक्ष की याचिका निरस्त होने के आधार बने।

Lakshagraha in Barnawa is not a Dargah: Survey found evidence of Mahabharata period, recorded in revenue
बरनावा का एतिहासिक टीला पर तैनात पुलिस - फोटो : Amar Ujala

न्यायालय में सुनवाई के दौरान हिंदू पक्ष की ओर से सबसे पहले राजस्व रिकॉर्ड दिया गया, जिसमें सरकार ने 25 नवंबर 1920 को उस जगह को प्राचीन धरोहर के रूप में लाखा मंडप मानते हुए नोटिफिकेशन जारी किया था। उसके बाद दोबारा 29 नवंबर 1065 में दोबारा नोटिफिकेशन जारी हुआ और इसको लेकर 21 सितंबर 1968 को गजट जारी होने पर सरधना तहसीलदार ने राजस्व रिकॉर्ड में इसे लाखागृह की जमीन दर्ज कर दिया।

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बरनावा में लाक्षागृह - फोटो : Amar Ujala

हिंदू पक्ष ने यह तर्क रखा कि यहां कौरवों ने लाख का किला बनवाया था, जिससे वे पांडवों को उसमें बुलाकर आग लगाकर मारना चाहते थे। यहां से सुरंग के सहारे पांडव बचकर निकले थे। आज भी उस सुरंग, लाख के किले की बड़ी ईंट, आग लगने पर जमीन के अंदर राख, शिव मंदिर के अवशेष के साक्ष्य भी यहां मौजूद हैं।

यह भी पढ़ें: क्या है प्राचीन टीला विवाद: मुस्लिम पक्ष का दावा खारिज, मस्जिद-कब्रिस्तान नहीं, वहां है लाक्षागृह और शिव मंदिर 

Lakshagraha in Barnawa is not a Dargah: Survey found evidence of Mahabharata period, recorded in revenue
बरनावा में एतिहासिक स्थल - फोटो : Amar Ujala

भारतीय पुरातत्व विभाग सर्वेक्षण में यहां ये सब साक्ष्य मिल चुके हैं। इसलिए ही पुरातत्व विभाग ने उसे संरक्षित किया था। वहां ईंटों पर पुरानी भाषा में लेख भी लिखे मिले हैं। इसके साथ ही साक्ष्य दिया गया कि वन विभाग व सरकार ने इस जमीन को अपना होने का दावा किया था, न्यायालय में गांधी धाम समिति बरनावा का केस चला और वर्ष 1997 में हिंदू पक्ष की समिति केस जीत गई। इस तरह ये सभी साक्ष्य ही मुस्लिम पक्ष की याचिका निरस्त होने के आधार बने।

Lakshagraha in Barnawa is not a Dargah: Survey found evidence of Mahabharata period, recorded in revenue
बरनावा का एतिहासिक टीला - फोटो : Amar Ujala

हिंदू पक्ष का चला आ रहा कब्जा
बरनावा के लाक्षागृह में वर्तमान में एक हिस्से में गुरुकुल आश्रम चल रहा है, वहां गोशाला भी बनी है। गुरुकुल के पास ही बड़ी यज्ञशाला बनी हुई है और वहां नलकूप भी लगा हुआ है। इसके अलावा जिसको शिव मंदिर होने का दावा किया गया है, उसके अवशेष और महाभारत कालीन वह गुफा अभी भी वहां मौजूद है। जिससे पांडवों के बचकर निकलने की बात कही जाती है। इन सभी पर फिलहाल हिंदू पक्ष की गांधी धाम समिति का कब्जा है और उसकी देखरेख भी समिति करती है।

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