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क्या है प्राचीन टीला विवाद: मुस्लिम पक्ष का दावा खारिज, मस्जिद-कब्रिस्तान नहीं, वहां है लाक्षागृह और शिव मंदिर

Mon, 05 Feb 2024 09:48 PM IST
कपिल kapil संवाद न्यूज एजेंसी, बागपत
संवाद न्यूज एजेंसी, बागपत Published by: कपिल kapil Updated Mon, 05 Feb 2024 09:48 PM IST
सार

Baghpat News : बरनावा के प्राचीन टीले का आखिर क्या विवाद है, जिसमें 54 साल बाद कोर्ट का बड़ा फैसला आया है। मुस्लिम पक्ष की तरफ से दावा कि गया था कि वहां दरगाह, मस्जिद व कब्रिस्तान है, जबकि कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए हिंदुओं के पक्ष में फैसला दिया है।

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What is dispute about ancient mound: Muslim side claims, Mosque cemetery Court accepted Lakshgriha Shiv temple
बरनावा में प्राचीन टीला। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

बागपत में बरनावा के प्राचीन टीले को लेकर 54 साल से चल रहे मामले में सोमवार को फैसला आया। जहां मुस्लिम पक्ष की तरफ से दरगाह, मस्जिद व कब्रिस्तान होने का दावा करते हुए दायर की गई याचिका को सिविल जज जूनियर डिवीजन प्रथम ने खारिज कर दिया। न्यायालय ने वहां महाभारत कालीन लाक्षागृह और शिव मंदिर मानते हुए जमीन पर हिंदुओं को मालिकाना हक दिया है।

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बरनावा के रहने वाले मुकीम खान ने वर्ष 1970 में मेरठ की अदालत में वाद दायर किया था। जिसमें लाक्षागृह गुरुकुल के संस्थापक ब्रह्मचारी कृष्णदत्त महाराज को प्रतिवादी बनाया गया था। इसमें मुकीम खान की तरफ से दावा किया गया था कि बरनावा में प्राचीन टीले पर खसरा संख्या 3377 की 36 बीघा 6 बिस्से 8 बिस्वांसी जमीन है। जिस पर करीब 600 साल पहले हजरत शेख बदरुद्दीन ने इबादत की और वहीं दफन हो गए। जहां उनकी दरगाह, बड़ा चबूतरा बतौर मस्जिद थी। उनके दफन होने के बाद सैकड़ों वर्ष से लोगों को मरने पर यहां दफन करना शुरू कर दिया गया और यहां कब्रिस्तान में हजारों कब्र मौजूद है।

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वह कब्रिस्तान टीला दरगाह मकदूम शाह विलायत साहब के नाम से मशहूर है और वह इसके मुतवल्ली हैं। यह भी दावा किया गया कि सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड में वह जमीन बतौर वक्फ दर्ज है। यह भी कहा गया था कि कृष्णदत्त महाराज बाहर के रहने वाले हैं और वह कब्रिस्तान को खत्म करके हिंदुओं का तीर्थ बनाना चाहते हैं।

दोनों पक्षों ने अपने-अपने साक्ष्य रखे
अधिवक्ता रणवीर सिंह तोमर व अनिल कुमार के अनुसार, मुकीम खान और कृष्णदत्त महाराज दोनों का निधन हो चुका है। वहीं, वर्ष 1997 में बागपत जिला बनने पर यह मामला मेरठ से यहां आने पर सिविल जज जूनियर डिवीजन प्रथम के न्यायालय में चल रहा था। जिसमें एक पक्ष से खालिद खान समेत अन्य और दूसरे पक्ष से गांधी धाम समिति के प्रबंधक राजपाल त्यागी, पैरोकार विजयपाल कश्यप वकीलों के माध्यम से कोर्ट में अपने-अपने साक्ष्य प्रस्तुत किए। जिसमें हिंदुओं के पक्ष की तरफ से राजस्व विभाग का रिकॉर्ड देने के साथ ही कहा गया कि यह एतिहासिक टीला महाभारत कालीन लाक्षागृह है। यहां सुरंग व शिव मंदिर के अवशेष इसका प्रमाण हैं। 

यह भी पढ़ें: 54 साल बाद बड़ा फैसला: 875 लगीं तारीखें, 12 बने गवाह, पहले ज्ञानवापी... अब लाक्षागृह भी हिंदुओं का हुआ

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इन सभी साक्ष्यों के आधार पर न्यायाधीश शिवम द्विवेदी ने 54 साल बाद मुस्लिम पक्ष की याचिका को खारिज कर दिया। जिससे महाभारत कालीन लाक्षागृह और शिव मंदिर मानते हुए 36 बीघा 6 बिस्से 8 बिस्वांसी जमीन पर हिंदुओं को मालिकाना हक दिया है।

यह भी पढ़ें: Baghpat: बरनावा में दरगाह नहीं, लाक्षागृह की जमीन, मुस्लिम पक्ष की याचिका खारिज, 53 वर्ष से चल रहा था वाद

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