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मजदूरी में घिरे बचपन में जला रहीं शिक्षा की लौ
अमर उजाला ब्यूरो/मेरठ
Updated Sun, 12 Jun 2016 02:26 AM IST
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मेरठ के एक ढाबे पर काम करता बच्चा।
- फोटो : अमर उजाला
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बाल मजदूरी में जकड़े बचपन को अगर शिक्षा और संसाधनों की लौ मिल जाए तो देश के नौनिहाल सफलता के मार्ग पर अग्रसर दिखाई देंगे। ऐ छोटू जरा चाय लाना कि जगह यदि इन बच्चों के कानों में शिक्षा का ककहरा गूंजे तो यह भारत के विकास में सशक्त भागेदारी निभाएंगे।
समाज में फैले बाल मजदूरी के जाल को काटने के लिए शहर की कई महिलाओं ने कदम बढ़ाए हैं। ये महिलाएं बिना किसी सामाजिक संस्था की मदद और बिना किसी स्पांसरशिप के बच्चों को बाल मजदूरी के अंधेरे से बाहर निकालने का प्रयास कर रही हैं। बाल मजदूरी निषेध दिवस पर शहर की ऐसी ही कुछ महिलाओं पर एक नजर
5 सालों से दे रहीं शिक्षा
मोती प्रयाग कालोनी निवासी मधुलिका गर्ग 5 सालों से गरीब बालिका राखी को शिक्षित कर रही हैं। मधुलिका कहती हैं अपने बच्चों को पढ़ता हुआ देखती थी, लेकिन वहीं एक बच्ची दबी-सहमी और काम करती मिली तो अच्छा नहीं लगा। अपने बच्चों के साथ मैंने राखी को भी पढ़ाना शुरू कर दिया। वह दो घंटे घर पर ही पढ़ाती हैं। इसे पढ़ता हुआ देखकर मन को तसल्ली मिलती है कि मेरी शिक्षा किसी के काम तो आ रही है।
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इसकी सफलता में ही मेरी सफलता
फूलबाग कॉलोनी निवासी ममता, अपनी मेड मंजू के बेटे अमन राजपूत को खुद ही पढ़ाती हैं। ममता कहती हैं अमन का सपना डॉक्टर बनना है। मैं पूरी कोशिश करूंगी कि अमन डॉक्टर बने। अमन स्कूल जाता है, लेकिन उसका होमवर्क और प्रोजेक्ट का काम ममता ही कराती हैं। बकौल ममता इसकी सफलता मेरी सफलता होगी।
समझनी होगी जिम्मेदारी
सूरजकुंड निवासी अर्चना मांगलिक, 12 वर्षीय फरदीन को निशुल्क पढ़ाती हैं। अर्चना कहती हैं कि यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे किसी बच्चे को पढ़ाने का मौका मिला। बकौल अर्चना मन को तसल्ली मिलती है। उनका कहा है कि समाज में तमाम लोग हैं जो अपनी शिक्षा और संसाधनों के प्रयोग से गरीब बच्चों को शिक्षित कर सकते हैं। उनके जीवन को बाल मजदूरी से बाहर निकाल शिक्षा का उजियारा दे सकते हैं, बस जरूरत अपनी जिम्मेदारी समझने की है।
मेरठ की बेटी ने किया है कमाल
जानी ब्लॉक गांव कुढ़ला की रजिया सुल्तान ने फुटबॉल बनाने की फैक्ट्री में काम करने वाले 83 बच्चों को बाल मजदूरी के गर्त से बाहर निकाला है। रजिया ने कैलाश सत्यार्थी के आंदोलन बचपन बचाओ से जुड़कर मेरठ में बच्चों को पढ़ाई की राह दिखाई है। रजिया के इस काम को यूएन ने भी सराहा। यूएन में हुए पहले मलाला सम्मान समारोह में प्रथम मलाला अवार्ड से उन्हें नवाजा गया है।
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समाज में फैले बाल मजदूरी के जाल को काटने के लिए शहर की कई महिलाओं ने कदम बढ़ाए हैं। ये महिलाएं बिना किसी सामाजिक संस्था की मदद और बिना किसी स्पांसरशिप के बच्चों को बाल मजदूरी के अंधेरे से बाहर निकालने का प्रयास कर रही हैं। बाल मजदूरी निषेध दिवस पर शहर की ऐसी ही कुछ महिलाओं पर एक नजर
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5 सालों से दे रहीं शिक्षा
मोती प्रयाग कालोनी निवासी मधुलिका गर्ग 5 सालों से गरीब बालिका राखी को शिक्षित कर रही हैं। मधुलिका कहती हैं अपने बच्चों को पढ़ता हुआ देखती थी, लेकिन वहीं एक बच्ची दबी-सहमी और काम करती मिली तो अच्छा नहीं लगा। अपने बच्चों के साथ मैंने राखी को भी पढ़ाना शुरू कर दिया। वह दो घंटे घर पर ही पढ़ाती हैं। इसे पढ़ता हुआ देखकर मन को तसल्ली मिलती है कि मेरी शिक्षा किसी के काम तो आ रही है।
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इसकी सफलता में ही मेरी सफलता
फूलबाग कॉलोनी निवासी ममता, अपनी मेड मंजू के बेटे अमन राजपूत को खुद ही पढ़ाती हैं। ममता कहती हैं अमन का सपना डॉक्टर बनना है। मैं पूरी कोशिश करूंगी कि अमन डॉक्टर बने। अमन स्कूल जाता है, लेकिन उसका होमवर्क और प्रोजेक्ट का काम ममता ही कराती हैं। बकौल ममता इसकी सफलता मेरी सफलता होगी।
समझनी होगी जिम्मेदारी
सूरजकुंड निवासी अर्चना मांगलिक, 12 वर्षीय फरदीन को निशुल्क पढ़ाती हैं। अर्चना कहती हैं कि यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे किसी बच्चे को पढ़ाने का मौका मिला। बकौल अर्चना मन को तसल्ली मिलती है। उनका कहा है कि समाज में तमाम लोग हैं जो अपनी शिक्षा और संसाधनों के प्रयोग से गरीब बच्चों को शिक्षित कर सकते हैं। उनके जीवन को बाल मजदूरी से बाहर निकाल शिक्षा का उजियारा दे सकते हैं, बस जरूरत अपनी जिम्मेदारी समझने की है।
मेरठ की बेटी ने किया है कमाल
जानी ब्लॉक गांव कुढ़ला की रजिया सुल्तान ने फुटबॉल बनाने की फैक्ट्री में काम करने वाले 83 बच्चों को बाल मजदूरी के गर्त से बाहर निकाला है। रजिया ने कैलाश सत्यार्थी के आंदोलन बचपन बचाओ से जुड़कर मेरठ में बच्चों को पढ़ाई की राह दिखाई है। रजिया के इस काम को यूएन ने भी सराहा। यूएन में हुए पहले मलाला सम्मान समारोह में प्रथम मलाला अवार्ड से उन्हें नवाजा गया है।