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रालोद का सूपड़ा साफ करने का दांव भाजपा पर पड़ा उल्टा, जानिए खास बातें

Fri, 01 Jun 2018 01:53 PM IST
यूपी अमर उजाला ब्यूरो, मदन बालियान, बागपत
यूपी अमर उजाला ब्यूरो, मदन बालियान, बागपत Updated Fri, 01 Jun 2018 01:53 PM IST
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Kairana byelection: RLD defeats BJP, know special things
समर्थकों के साथ तबस्सुम हसन और साइड में मृगांका सिंह

वजूद बचाने की लड़ाई में उलझे रालोद का सूपड़ा साफ करने का दांव भाजपा पर ही उल्टा पड़ गया। राज्यसभा चुनाव में छपरौली के विधायक की क्रॉस वोटिंग और इसके बाद उनके भाजपा में शामिल होने से रालोद के पक्ष में सहानुभूति की लहर चली। वजह यह है कि पिछले 81 साल की सियासत में छपरौली ने कभी चौधरी परिवार का साथ नहीं छोड़ा। भाजपा ने राज्यसभा सीट जरूर जीती, लेकिन सियासत में अकेले पड़ गए चौधरी अजित सिंह के पाले में जाट वोट बैंक खड़ा होना शुरू हुआ। इसका संदेश छपरौली से सटे कैराना तक पहुंचा।

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कैराना लोकसभा और नूरपुर विधानसभा सीट के उप चुनाव में जीत की कई वजह हैं। पिछले छह माह की सियासत के पन्ने पलटें तो भाजपा की हार उसके ही दांव से दिखती है। फूलपुर और गोरखपुर उपचुनाव में हार के बाद भाजपा ने राज्यसभा चुनाव में जीत के लिए पूरी ताकत झोंक दी। भाजपा ने बसपा के उम्मीदवार को हराया। चौधरी अजित सिंह ने बड़ा दांव चलकर छपरौली सीट से अकेले विधायक सहेंद्र सिंह रमाला को पार्टी से निकाल दिया। लखनऊ और दिल्ली की सियासत में खाली हाथ खड़े चौधरी अजित सिंह को देखकर जाट वोट बैंक भावुक होना शुरू हुआ। छपरौली से 1937 में कांग्रेस के टिकट पर मेरठ की दक्षिण पश्चिम सीट से संयुक्त प्रांत धारा सभा के चुनाव में जीतकर पहली बार चौधरी चरण सिंह विधायक बने थे। पिछले 81 साल में चौधरी परिवार को कभी छपरौली ने निराश नहीं किया और जाट वोट बैंक छपरौली के संदेश से ही साधा जाता रहा है, लेकिन भाजपा ने छपरौली विधायक को अपने पाले में खड़ा कर लिया, जिसका लाभ कैराना उप चुनाव में सीधे तौर पर रालोद को हुआ। कैराना की सीट छपरौली से सटी हुई है। दोनों जगह के लोग खेती पास करते हैं और रोजाना भाईचारे का नाता भी है। सहानुभूति की जो लहर छपरौली से शुरू हुई, उसका असर कैराना में भी पड़ा। धीरे-धीरे सहानुभूति रालोद के पक्ष में चली गई। यही वजह है कि दलित और मुस्लिम के अलावा जाट वोट बैंक रालोद के पाले में खड़ा हो गया।
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सियासी वजूद पाने के लिए लंबे समय से जद्दोजहद कर रहे रालोद के लिए कैराना की जीत संजीवनी जैसा साबित होगी। लखनऊ और दिल्ली की सियासत में एक जीत के बाद फिर चौधरी अजित सिंह की साख पुख्ता हुई है। यह भी साबित हो गया कि वर्ष 2019 के चुनाव में वेस्ट यूपी का चुनाव बेहद दिलचस्प होने जा रहा है।

नेताओं के जाने से रालोद को सहानुभूति
छपरौली विधायक सहेंद्र सिंह रमाला के अलावा विधानसभा चुनाव 2017 से पहले योगेश धामा भाजपा के पाले में गए, वर्तमान में धामा बागपत से भाजपा के विधायक हैं। पूर्व विधायक साहब सिंह और जिलाध्यक्ष ठाकुर प्रदीप सिंह भी भाजपा के पाले में जा खड़े हुए। गढ़ में ही एक-एक करके नेताओं के भाजपा के पाले में जाने से भी रालोद को वोटरों की सहानुभूति मिली।

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