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कैंची का कारोबार कर रहा सेहत पर वार
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Fri, 27 Apr 2018 01:02 AM IST
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फाइल फोटो
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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अपना जिला कैंची के लिए मशहूर है, लेकिन कैंची के कारीगरों पर बीमारी के वार को नजरअंदाज किया जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग इस ओर कोई ध्यान नहीं दे रहा है। न कोई हेल्थ चेकअप कैंप और न ही दवाइयां। इससे इन लोगों के सांस और सिडरोसिस नामक बीमारी की चपेट में आने की आशंका बनी रहती है। लोहे की डस्ट (धूल) उनके फेफड़ों में न जमे इसके लिए कैंची तैयार करने वाले लोग गुड़ पर निर्भर रहते हैं।
मेरठ में कैंची का इतिहास करीब 350 साल पुराना है। 25 हजार से ज्यादा लोग कैंची के कारोबार से जुड़े हैं और किसी न किसी रूप में आयरन की डस्ट से प्रभावित हो रहे हैं। 125 से ज्यादा दुकानें हैं। साबुन ग्रान, कोटला, श्यामनगर, जाकिर कालोनी, देहात में मवाना, सनौता और बड़ा गांव आदि में यह कारोबार होता है। इससे बचने के लिए कैंची को धार लगाने वाली मशीन पर बॉक्स लगाकर इससे कुछ हद तक बचा जा सकता है, मगर दुकानें छोटी होने के कारण यह भी नहीं हो पा रहा है। इसके लिए आखून नगर में दुकानें बनाने का प्रस्ताव भी था, मगर वह अमली जामा नहीं पहन सका है। कैंची बनाने वाले आसिम और मो. आलम का मानना है कि गुड़ खाने से डस्ट फेफड़ों में नहीं जमती है। वह मल के साथ निकल जाती है।
सीएमओ ने बताया कि सांस और सिडरोसिस बीमारी की जांच के लिए जिला अस्पताल में परीक्षण होता है। टीबी वार्ड में इनका बलगम टेस्ट कराते हैं। उन्होंने बताया कि जागरूकता फैलाने के लिए बैठक बुलाकर इन्हें समझाया जाएगा। दरअसल, यह इनका पैतृक व्यवसाय बन गया है। इससे यह लोग जल्दी उम्रदराज भी लगने लगते हैं।
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हेल्थ चेकअप कैंप लगाने की मांग
यह एक बड़ी समस्या है। इससे बचने के लिए साप्ताहिक कैंप लगाए जाने चाहिए। दवाइयां वितरित की जाएं। इस संबंध में जल्द ही उनकी एसोसिएशन सीएमओ से मिलेगी। कैंची कारोबार को सरकार की तरफ से बौद्धिक संपदा का सर्टिफिकेट भी मिल चुका है।
- शरीफ अहमद, उपाध्यक्ष, मेरठ सीजर्स मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन
बचाव ही इलाज है
सीएमओ डॉ. राजकुमार का कहना है कि आयरन की डस्ट से सिडरोसिस की बीमारी होती है। इससे मरीज की सांस फूलने लगती है और फेफड़ों से खून भी आ सकता है। टीबी की भी आशंका बनी रहती है। उन्होंने बताया कि इसका कोई पुख्ता इलाज नहीं है। बचाव ही इसका इलाज है। बचने के लिए मास्क लगाकर ही कैंची पर धार लगानी चाहिए। इसके लिए जागरूकता अभियान चलाया जाएगा। लंबे समय तक कैंची पर धार लगाने वाले को यह बीमारी होने की पूरी आशंका रहती है। एक बार बीमारी होने पर मरीज को दवाइयां खानी ही पड़ेंगी।
यह होता है सिडरोसिस
सिडरोसिस शब्द का अर्थ है, लोहे की अधिकता। लोहे का संग्रहीकरण यकृत, प्लीहा और अस्थि-मज्जा में होता है। अधिक मात्रा में लोहा लेने से यकृत में इसका संग्रह भी ज्यादा हो जाता है। लोहे की कुछ मात्रा पैरेन्काइमल कोशिकाओं तथा पोर्टल में जमा हो जाती है, लेकिन इसका प्रयोग नहीं हो पाता। इससे फेफड़ों की बीमारी होती है।
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मेरठ में कैंची का इतिहास करीब 350 साल पुराना है। 25 हजार से ज्यादा लोग कैंची के कारोबार से जुड़े हैं और किसी न किसी रूप में आयरन की डस्ट से प्रभावित हो रहे हैं। 125 से ज्यादा दुकानें हैं। साबुन ग्रान, कोटला, श्यामनगर, जाकिर कालोनी, देहात में मवाना, सनौता और बड़ा गांव आदि में यह कारोबार होता है। इससे बचने के लिए कैंची को धार लगाने वाली मशीन पर बॉक्स लगाकर इससे कुछ हद तक बचा जा सकता है, मगर दुकानें छोटी होने के कारण यह भी नहीं हो पा रहा है। इसके लिए आखून नगर में दुकानें बनाने का प्रस्ताव भी था, मगर वह अमली जामा नहीं पहन सका है। कैंची बनाने वाले आसिम और मो. आलम का मानना है कि गुड़ खाने से डस्ट फेफड़ों में नहीं जमती है। वह मल के साथ निकल जाती है।
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सीएमओ ने बताया कि सांस और सिडरोसिस बीमारी की जांच के लिए जिला अस्पताल में परीक्षण होता है। टीबी वार्ड में इनका बलगम टेस्ट कराते हैं। उन्होंने बताया कि जागरूकता फैलाने के लिए बैठक बुलाकर इन्हें समझाया जाएगा। दरअसल, यह इनका पैतृक व्यवसाय बन गया है। इससे यह लोग जल्दी उम्रदराज भी लगने लगते हैं।
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हेल्थ चेकअप कैंप लगाने की मांग
यह एक बड़ी समस्या है। इससे बचने के लिए साप्ताहिक कैंप लगाए जाने चाहिए। दवाइयां वितरित की जाएं। इस संबंध में जल्द ही उनकी एसोसिएशन सीएमओ से मिलेगी। कैंची कारोबार को सरकार की तरफ से बौद्धिक संपदा का सर्टिफिकेट भी मिल चुका है।
- शरीफ अहमद, उपाध्यक्ष, मेरठ सीजर्स मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन
बचाव ही इलाज है
सीएमओ डॉ. राजकुमार का कहना है कि आयरन की डस्ट से सिडरोसिस की बीमारी होती है। इससे मरीज की सांस फूलने लगती है और फेफड़ों से खून भी आ सकता है। टीबी की भी आशंका बनी रहती है। उन्होंने बताया कि इसका कोई पुख्ता इलाज नहीं है। बचाव ही इसका इलाज है। बचने के लिए मास्क लगाकर ही कैंची पर धार लगानी चाहिए। इसके लिए जागरूकता अभियान चलाया जाएगा। लंबे समय तक कैंची पर धार लगाने वाले को यह बीमारी होने की पूरी आशंका रहती है। एक बार बीमारी होने पर मरीज को दवाइयां खानी ही पड़ेंगी।
यह होता है सिडरोसिस
सिडरोसिस शब्द का अर्थ है, लोहे की अधिकता। लोहे का संग्रहीकरण यकृत, प्लीहा और अस्थि-मज्जा में होता है। अधिक मात्रा में लोहा लेने से यकृत में इसका संग्रह भी ज्यादा हो जाता है। लोहे की कुछ मात्रा पैरेन्काइमल कोशिकाओं तथा पोर्टल में जमा हो जाती है, लेकिन इसका प्रयोग नहीं हो पाता। इससे फेफड़ों की बीमारी होती है।