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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Meerut News ›   #HindiHainhum: Santkavi Chaudhary Mulkiram, an administrative officer who became a seeker of Hindi literature

#हिंदीहैंहम: संतकवि चौधरी मुल्कीराम, एक प्रशासनिक अधिकारी जो बन गया हिंदी साहित्य का साधक

Fri, 28 Aug 2020 02:40 PM IST
Dimple Sirohi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ Published by: Dimple Sirohi Updated Fri, 28 Aug 2020 02:40 PM IST
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#HindiHainhum: Santkavi Chaudhary Mulkiram, an administrative officer who became a seeker of Hindi literature
संतकवि चौधरी मुल्कीराम - फोटो : अमर उजाला

वह क्षमता मुझको दो हे मां, हर गीत लिखूं तुलसी बनके,

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जो शब्द लेखनी से टपके, रस टपके उनसे छन-छनके

 
भक्ति रस में नहाई ये पंक्तियां, जिनके शब्दों ने भावना के समस्त द्वारों को खोल दिया। हिंदी साहित्य में ऐसी अप्रतिम रचना को संतकवि चौधरी मुल्कीराम ने आकार दिया। चौधरी मुल्कीराम अंग्रेजी हुकूमत के दौर के वह अफसर थे, जिसकी रगों में हिंदी लहू बनकर बहती थी। जो गोरों के सामने अकड़ से हिंदी में बात करता, हिंदी रचता और हिंदी को प्रचारित करता था। 

हापुड़ के गांव भटियाना में हुआ जन्म 
अपनी हिंदी पर रौब गालिब करने वाले चौधरी मुल्कीराम 11 अप्रैल 1910 को मेरठ जिले की तहसील (अब जिला) हापुड़ के गांव भटियाना में जन्मे। हापुड़ से प्रारंभिक शिक्षा के बाद मेरठ कॉलेज से स्नातक किया।
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1939 में उप्र पीसीएस परीक्षा पास कर प्रोबेशन अधिकारी बने। 1940 में हरदोई के डिप्टी कलेक्टर बने। कई जिलों में महत्वपूर्ण पद संभाले। 21 अगस्त 1954 को साहित्य के इस सितारे का 
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लोप हो गया।  

साहित्य से समाज सुधार की अपील
चौ. मुल्कीराम ने साहित्य को समाजसुधार का जरिया बनाया। अपनी कविताओं से जातिभेद मिटाने का संदेश दिया। भक्तिरस में पगी रचनाएं रचीं और संतकवि कहलाए। विचारशील व्यक्तित्व से धनी मुल्कीराम ने जातिभेद पर खूब लिखा। वो लिखते हैं निज सर पर लादे पापा भार, मन डोल रहा है बार बार, प्रभु दो मुझको सदविचार, जीवन की नैया करुं पार। 

पुस्तक की शक्ल में आए हृदयोदगार
चौ. मुल्कीराम की कविताओं को महाकवि डॉ. ताराचंद पाल बेकल ने हृदयोदगार पुस्तक में समाहित कर प्रकाशित किया। मेरठ के आयुक्त रहे आरडी सोनकर मुल्कीराम के दामाद थे। चौधरी यादराम से बहुत अच्छी मित्रता रही। ताराचंद पाल, पद्मसिंह पद्म, मुल्कीराम विचार मंच के तत्वावधान में साहित्यिक आयोजन होते और बच्चों को हिंदी से जोड़कर सम्मानित किया जाता। 

कई मंच किए साझा
चौ. मुल्कीराम के साथ लंबा वक्त गुजरा। इनका परिवार बाहर रहता है। हमने कई मंच साथ साझा किए। कई यात्राओं के साथी बने। हिंदी को लेकर उनमे प्रेम और उबाल दोनों थे। वो कहते थे हिंद में रहकर हिंदी की इज्जत न करेंगे तो क्या करेंगे। हिंदी को नहीं छोड़ सकता। - कवि पद्म सिंह पद्म, शास्त्रीनगर 

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