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हिंदी हैं हम: सरल शब्दावली के साथ बढ़ाना होगा हिंदी का प्रयोग, हिंदी पाठकों की संख्या घटी

Sun, 29 Aug 2021 04:37 PM IST
Dimple Sirohi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ Published by: Dimple Sirohi Updated Sun, 29 Aug 2021 04:37 PM IST
सार

बदायूं में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत ब्रह्मपुरी निवासी सुधाकर आशावादी ने बताया कि वह हिंदी के प्रचार प्रसार का हर संभव प्रयास कर रहे हैं। अब तक वह हिंदी की 40 पुस्तकें लिख चुके हैं। हिंदी लेखन का शौक है। इसलिए प्रतिदिन हिंदी खिलते हैं।

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Hindi Hain Hum : Use of Hindi has to be increased with simple vocabulary
हिंदी लेखक एवं साहित्यकार सुधाकर आशावादी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हिंदी को पुन: शीर्ष स्थान पर पहुंचाने के लिए हिंदी के प्रति प्रेम को प्रत्येक हिंदुस्तानी के हृदय में जागृत करना होगा। हिंदी काफी सरल भाषा है, मगर इसकी और सरल शब्दावली की जरूरत है। इस दौर में अंग्रेजी के बढ़ते चलन ने हिंदी के प्रति लगाव को कम किया है।
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हिंदी लेखक एवं साहित्यकार सुधाकर आशावादी ने बताया कि हिंदी राजनैतिक पूर्वाग्रह से ग्रसित हुई। पुराने मठाधीशों ने अपने विषय में सोचते हुए अंग्रेजी को ज्यादा महत्व दिया। इसके साथ ही क्षेत्रवाद ने भी हिंदी को काफी हद प्रभावित किया है।
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बदायूं में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत ब्रह्मपुरी निवासी सुधाकर आशावादी ने बताया कि वह हिंदी के प्रचार प्रसार का हर संभव प्रयास कर रहे हैं। 12 पुस्तकें उन्होंने बाल साहित्य पर लिखीं। उनके उपन्यास, कहानी और साहित्य पर कई छात्रों ने एमफिल और पीएचडी की है। अब तक वह हिंदी की 40 पुस्तकें लिख चुके हैं। हिंदी लेखन का शौक है। इसलिए प्रतिदिन हिंदी खिलते हैं।
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पुस्तक अंताक्षरी और कालका मेल कहानी संग्रह काफी पसंद किया गया। उन्होंने कहा कि बॉलीवुड विश्व पटल पर हिंदी का प्रचार कर रहा है। आज के दौर में  सोशल मीडिया हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए बड़ा माध्यम बन सकता है। देश विदेश में हिंदी में रोजगार के बहुत विकल्प हैं। 

हिंदी पाठकों की संख्या घटी
जनसंख्या वृद्धि के साथ हिंदी पाठकों की संख्या में उस स्तर पर नहीं बढ़ी है। आज कविता संग्रह प्रकाशित होते हैं, पर पढ़ने वालों की संख्या घटी है। अधिवक्ता एवं हिंदी लेखक ओमकार गुलशन ने बताया कि एक समय था, जब मेरठ जासूसी उपन्यास का गढ़ हुआ करता था। अब हिंदी के सीमित लेखकों की पुस्तकें प्रकाशित होती हैं। 

कवि, गजलकारों को मंच भी उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं। इस बीच अच्छे कवियों को मंच नहीं मिल पाता है। ऐसे में हिंदी प्रतिभा में भी कमी आई है। हरिनगर निवासी लेखक ओमकार गुलशन ने कहा कि हिंदी संस्थान और भाषा संस्थान हिंदी के संवर्धन के लिए कार्य कर रहा है। 

उनकी पुस्तक ‘अंगड़ाइयों ने खत लिखे’सर्वाधिक पसंद की गई। आज के युग में लेखक की बहुत चर्चित होने के साथ राजनीति में भी अच्छी पकड़ होनी चाहिए। तभी वह किसी उपाधि की उम्मीद कर सकता है। बड़ी संख्या में उपन्यास, कविता, गजलकारों की छिपी प्रतिभा उजागर भी नहीं हो पाती है। सत्ता को अलग रखकर साहित्यकारों का राष्ट्रीय स्तर पर पैनल बनाने की आवश्यकता है। हिंदी में रोजगार के अवसर भी बढ़ाने होंगे तभी युवा पीढ़ी हिंदी की तरफ आकर्षित होगी।

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