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Meerut News: नई प्रयोगशाला में आधुनिक मशीन से होगी हेपेटाइटिस की जांच
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मेरठ। एलएलआरएम मेडिकल कॉलेज में वायरलॉजी लैब की शुरुआत होने जा रही है। यहां हेपेटाइटिस सी और बी की जांच करने के लिए करीब दो करोड़ की लागत की नई मशीन कोबास 5800 आ गई है। यह अत्याधुनिक मशीन है, इससे हर रोज करीब 300 सैंपलों की जांच की जा सकेगी। इस मशीन का उद्घाटन सोमवार को राज्यसभा सदस्य डॉ. लक्ष्मीकांत बाजपेयी करेंगे।
मेडिकल कॉलेज की माइक्रोबायोलॉजी लैब के प्रभारी डॉ. अमित गर्ग ने बताया कि नई लैब में इस मशीन से नमूनों की जांच की जाएगी। इस तरह मशीन सरकारी में सिर्फ संजय गंधी पीजीआई लखनऊ होती है। इसके बाद अब मेरठ में शुरू होगी। अभी तक जिस मशीन से हेपेटाइटिस की जांच की जा रही थी, उससे और भी कई जांच होंती हैं, जैसे एचआईवी आदि। लिहाजा दबाव ज्यादा रहता था। हेपेटाइटिस के 100 नमूनों की ही जांच कर पा रहे थे। कोबास 5800 के आने से अब उस पर दबाव नहीं रहेगा। साथ ही इस मशीन से रिपोर्ट ज्यादा सही और जल्दी आती है। हेपेटाइिटस सी (काला पीलिया) की जांच निजी लैब में चार से पांच हजार रुपये में और इलाज में 25 से 30 हजार रुपये का खर्च आता है, जबकि जांच और दवाइयां निशुल्क हैं। यहां मेरठ के अलावा बिजनौर, रामपुर, अमरोहा, बुलंदशहर, गाजियाबाद, गौतमबुद्धनगर, बागपत, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर और शामली आदि जिलों के लोगों के सैंपल आते हैं।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 15 हजार से ज्यादा मरीजों का चल रहा इलाज
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के युवा काला पीलिया ( हेपेटाइटिस सी) की चपेट में आ रहे हैं। एलएलआरएम मेडिकल कॉलेज में 15 हजार से ज्यादा मरीज़ों का इलाज चल रहा है। इनमें 25 से 55 साल उम्र वालों की संख्या सबसे ज़्यादा है। मेडिकल में मरीज़ को 18 नंबर में लिवर ओपीडी में दिखाना होता है, यहां से उसका सैंपल जांच के लिए माइक्रोबायोलॉजी लैब भेजा जाता है, जांच में हेपेटाइटिस सी की पुष्टि होने पर इलाज शुरू किया जाता है। तीन माह दवाइयां खानी पड़ती हैं, फिर जांच होती है, सही होने पर दवाइयां बंद कर दी जाती हैं।
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यह है हेपेटाइटिस-सी
हेपेटाइटिस सी (यकृतशोथ ग) इसे काला पीलिया भी कहते हैं। यह एक संक्रामक रोग है, जो हेपेटाइटिस सी वायरस एचसीवी की वजह से होता है और यकृत को प्रभावित करता है।
इलाज से हो जाता है ठीक काला पीलिया
प्राचार्य डॉ. आरसी गुप्ता ने बताया कि हेपेटाइटिस इलाज और देखभाल से यह ठीक हो जाता है। इस बीमारी का पता शुरू में नहीं लग पाता। इस कारण यह जानलेवा हो जाती है। मेडिकल में इसका इलाज निशुल्क किया जा रहा है।
इन कारणों से होती है बीमारी
- दूषित सिरिंज का उपयोग करना।
- दूषित रेजर या टूथब्रश का इस्तेमाल।
- दूषित रक्तदान, अंगदान या लंबे समय तक डायलिसिस द्वारा।
- दूषित सुईं से टैटू बनवाना या एक्यूपंचर करवाना।
- असुरक्षित यौन संबंध।
एेसे करें रोकथाम
- साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखें।
- टैटू के लिए स्टरलाइज नीडल का इस्तेमाल करें।
- अपने टूथब्रश और रेजर किसी के साथ साझा न करें।
- शराब का सेवन न करें या अत्यंत कम मात्रा में करें।
- विशेषकर टॉयलेट से आने के बाद सफाई का ध्यान रखें।
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लक्षण...
- डायरिया
- थकान
- भूख न लगना
- उल्टी होना
- पेट में दर्द होना
- दिल घबराना
- मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द होना
- वजन कम होना
- सिर दर्द
- चक्कर आना
- यूरिन का रंग गहरा होना
- मल का रंग पीला हो जाना
- खुजली रहना
- त्वचा, आंखों के सफेद भाग, जीभ का रंग पीला पड़ जाना (ये लक्षण पीलिया में दिखाई देते हैं)
- महिलाओं में मासिक धर्म का गड़बड़ा जाना
- लिवर का आकार बढ़ जाना
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मेडिकल कॉलेज की माइक्रोबायोलॉजी लैब के प्रभारी डॉ. अमित गर्ग ने बताया कि नई लैब में इस मशीन से नमूनों की जांच की जाएगी। इस तरह मशीन सरकारी में सिर्फ संजय गंधी पीजीआई लखनऊ होती है। इसके बाद अब मेरठ में शुरू होगी। अभी तक जिस मशीन से हेपेटाइटिस की जांच की जा रही थी, उससे और भी कई जांच होंती हैं, जैसे एचआईवी आदि। लिहाजा दबाव ज्यादा रहता था। हेपेटाइटिस के 100 नमूनों की ही जांच कर पा रहे थे। कोबास 5800 के आने से अब उस पर दबाव नहीं रहेगा। साथ ही इस मशीन से रिपोर्ट ज्यादा सही और जल्दी आती है। हेपेटाइिटस सी (काला पीलिया) की जांच निजी लैब में चार से पांच हजार रुपये में और इलाज में 25 से 30 हजार रुपये का खर्च आता है, जबकि जांच और दवाइयां निशुल्क हैं। यहां मेरठ के अलावा बिजनौर, रामपुर, अमरोहा, बुलंदशहर, गाजियाबाद, गौतमबुद्धनगर, बागपत, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर और शामली आदि जिलों के लोगों के सैंपल आते हैं।
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पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 15 हजार से ज्यादा मरीजों का चल रहा इलाज
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के युवा काला पीलिया ( हेपेटाइटिस सी) की चपेट में आ रहे हैं। एलएलआरएम मेडिकल कॉलेज में 15 हजार से ज्यादा मरीज़ों का इलाज चल रहा है। इनमें 25 से 55 साल उम्र वालों की संख्या सबसे ज़्यादा है। मेडिकल में मरीज़ को 18 नंबर में लिवर ओपीडी में दिखाना होता है, यहां से उसका सैंपल जांच के लिए माइक्रोबायोलॉजी लैब भेजा जाता है, जांच में हेपेटाइटिस सी की पुष्टि होने पर इलाज शुरू किया जाता है। तीन माह दवाइयां खानी पड़ती हैं, फिर जांच होती है, सही होने पर दवाइयां बंद कर दी जाती हैं।
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यह है हेपेटाइटिस-सी
हेपेटाइटिस सी (यकृतशोथ ग) इसे काला पीलिया भी कहते हैं। यह एक संक्रामक रोग है, जो हेपेटाइटिस सी वायरस एचसीवी की वजह से होता है और यकृत को प्रभावित करता है।
इलाज से हो जाता है ठीक काला पीलिया
प्राचार्य डॉ. आरसी गुप्ता ने बताया कि हेपेटाइटिस इलाज और देखभाल से यह ठीक हो जाता है। इस बीमारी का पता शुरू में नहीं लग पाता। इस कारण यह जानलेवा हो जाती है। मेडिकल में इसका इलाज निशुल्क किया जा रहा है।
इन कारणों से होती है बीमारी
- दूषित सिरिंज का उपयोग करना।
- दूषित रेजर या टूथब्रश का इस्तेमाल।
- दूषित रक्तदान, अंगदान या लंबे समय तक डायलिसिस द्वारा।
- दूषित सुईं से टैटू बनवाना या एक्यूपंचर करवाना।
- असुरक्षित यौन संबंध।
एेसे करें रोकथाम
- साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखें।
- टैटू के लिए स्टरलाइज नीडल का इस्तेमाल करें।
- अपने टूथब्रश और रेजर किसी के साथ साझा न करें।
- शराब का सेवन न करें या अत्यंत कम मात्रा में करें।
- विशेषकर टॉयलेट से आने के बाद सफाई का ध्यान रखें।
लक्षण...
- डायरिया
- थकान
- भूख न लगना
- उल्टी होना
- पेट में दर्द होना
- दिल घबराना
- मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द होना
- वजन कम होना
- सिर दर्द
- चक्कर आना
- यूरिन का रंग गहरा होना
- मल का रंग पीला हो जाना
- खुजली रहना
- त्वचा, आंखों के सफेद भाग, जीभ का रंग पीला पड़ जाना (ये लक्षण पीलिया में दिखाई देते हैं)
- महिलाओं में मासिक धर्म का गड़बड़ा जाना
- लिवर का आकार बढ़ जाना