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प्रसिद्ध है हस्तिनापुर का यह गुरुद्वारा, यहां देश-विदेश से आते हैं श्रद्धालु, देखिए तस्वीरें

Fri, 22 Jan 2021 01:46 PM IST
Dimple Sirohi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ Published by: Dimple Sirohi Updated Fri, 22 Jan 2021 01:46 PM IST
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Hastinapur saga: Guru Govind Singh's Panj was beloved Dharam Singh of Saifpur Karmchandpur
हस्तिनापुर के एक गांव में प्रसिद्ध गुरुद्वारा - फोटो : अमर उजाला

महाभारतकालीन एतिहासिक नगरी हस्तिनापुर में सर्वधर्म के लोग समाहित हैं। हस्तिनापुर से तीन किलोमीटर दूर सैफपुर कर्मचंदपुर गांव में प्रसिद्ध गुरुद्वारा है। यहां देश-विदेश से सैकड़ों श्रद्धालु आते हैं। पंज प्यारे भाई धर्म सिंह गुरुद्वारा में 24 घंटे लंगर चलता है।



पंजप्यारों से सिखों के अंतिम और दसवें गुरु गोविंद सिंह ने बलिदान स्वरूप उनका शीश मांगा था। वह वीर योद्धा हिंदू धर्म की रक्षा करने के लिए गुरु की एक आवाज पर शीश भेंट करने को तैयार हो गए थे। इनमें से एक सैफपुर कर्मचंदपुर निवासी भाई धर्म सिंह भी थे।

Hastinapur saga: Guru Govind Singh's Panj was beloved Dharam Singh of Saifpur Karmchandpur
गुरुद्वारा के बाहर लगा बोर्ड - फोटो : अमर उजाला

गुरु गोविंद सिंह ने सिखों को धर्म की रक्षा और देश की आजादी के लिए प्रेरणा प्रदान की थी। उनके द्वारा जनभावना को परखने के लिए 14 अप्रैल, 1699 को बैसाखी पर आनंदपुर साहिब के विशाल मैदान में सिख समुदाय के लोगों को आमंत्रित किया गया। उनके आह्वान पर हजार सिख इकट्ठे हो गए थे। फिर उन्होंने समस्त लोगों के सामने शीश की मांग की। जिन पांच लोगों ने उनके लिए अपने शीश का बलिदान किया वे पंजप्यारे के नाम से विख्यात हुए।

Hastinapur saga: Guru Govind Singh's Panj was beloved Dharam Singh of Saifpur Karmchandpur
गुरुद्वारा के प्रबंधक जोगिंदर सिंह - फोटो : अमर उजाला

इनमें से एक हस्तिनापुर के सैफपुर फिरोजपुर निवासी भाई धर्म सिंह भी थे। भाई संतराम और माई साभो के इस वीर पुत्र का जन्म 1666 में हुआ था। इनका वास्तविक नाम धर्मदास था। ऐतिहासिक बैसाखी मंडली में पहुंचने के बाद वह गुरु गोविंद सिंह के लिए शहीद होने के लिए तैयार हो गए थे।

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Hastinapur saga: Guru Govind Singh's Panj was beloved Dharam Singh of Saifpur Karmchandpur
सैफपुर फिरोजपुर गुरुद्वारा परिसर स्थित तालाब। संवाद - फोटो : अमर उजाला

इस प्रकार उन्होंने भरी सभा में त्याग और बलिदान का उदाहरण पेश किया और गुरुजी के प्यारे बन गए। गुरु गोविंद सिंह के साथ उन्होंने आनंदपुर साहिब की लड़ाई में हिस्सा लिया था। सन 1708 में उनका देहांत हो गया था। इसके बाद उनके पुश्तैनी घर पर गुरुद्वारा स्थापित कर दिया गया। सैफपुर कर्मचंद गांव स्थित यह गुरुद्वारा सिख धर्म के लोगों के लिए धार्मिक स्थल है।

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Hastinapur saga: Guru Govind Singh's Panj was beloved Dharam Singh of Saifpur Karmchandpur
गुरुद्वारा और प्रबंधक जोगिंदर सिंह - फोटो : अमर उजाला

सरकार ने नहीं दिया ध्यान 
देश धर्म की रक्षा करने के लिए पंज प्यारे भाई धर्म सिंह ने प्राण न्यौछावर कर दिए। उनके जन्मस्थल पर भव्य गुरुद्वारा बनाया गया। यहां साल में कई बड़े धार्मिक कार्यक्रम भी होते हैं। इसके बाद भी सरकार ने इस स्थल को उपेक्षित रखा। यहां मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। गांव की सड़कों से लेकर पीने के पानी तक की व्यवस्था नहीं है। गुरुद्वारा कमेटी स्वयं ही श्रद्धालुओं के लिए व्यवस्था करती है।

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