चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति पर FIR दर्ज, लगा ये आरोप
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चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ. एसपी ओझा भी भ्रष्टाचार के मामले में फंस गए हैं। एसपी ओझा के खिलाफ मेडिकल थाने में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज कराई गई है। विजिलेंस की तरफ से दर्ज कराए इस मामले में विश्वविद्यालय के कई ओर कर्मचारी भी जांच के घेरे में आ गए हैं। ये एफआईआर दिसंबर 2017 में दर्ज हुई थी। इंस्पेक्टर प्रवीण कुमार को इस मामले की जांच सौंपी गयी है।
उत्तर प्रदेश सतर्कता अधिष्ठान मेरठ सेक्टर की तरफ से दर्ज एफआईआर के मुताबिक साल 2009 में राज्यपाल के प्रमुख सचिव की तरफ से चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति डॉ. संत कुमार ओझा (एसपी ओझा) के खिलाफ खुली जांच के आदेश दिए गए थे। विजिलेंस की जांच में सामने आया कि डॉ. एसपी ओझा ने पद का दुरुपयोग कर निजी लाभ के लिए कई मामलों में भ्रष्टाचार किया। पहले मामले में डॉ. एसपी ओझा और तत्कालीन कुलसचिव संजीव कुमार शर्मा ने आईएमआर संस्थान दुहाई गाजियाबाद के प्रकरण में नियमों की अनदेखी करके संस्थान को पांच वर्षीय एमटेक पाठ्यक्रम की संस्तुति कर दी।
विजिलेंस ने एसपी ओझा को इस मामले में धारा 13 (1) डी सपठित धारा 13 (2) भ्रष्टाचार अधिनियम 1988 के तहत दोषी माना है। दूसरे मामले में एसपी ओझा ने उत्तर प्रदेश विश्वविद्यालय अधिनियम 1973 की धारा-13 (6) में शक्तियों का दुरुपयोग करते हुए विश्वविद्यालय के राजनीतिक विज्ञान विभाग में तैनात उप प्राचार्य डॉ. संजीव शर्मा को निजी लाभ के लिए कुलसचिव नियुक्त कर दिया। इस मामले में राज्यपाल के सचिव के पत्र के आधार पर माना गया कि कुलपति को इस तरह की कोई शक्ति ही प्राप्त नहीं है।
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एसपी ओझा को माना दोषी
इस मामले में भी विजिलेंस ने एसपी ओझा का दोषी माना है। तीसरे मामले में उन्हें राजनीतिक विज्ञान विभाग के डॉ. संजीव शर्मा को रीडर के पद पर आठ वर्ष की सेवा पूर्ण नहीं होने के बावजूद प्रोफेसर पद नाम हेतु पदोन्नति देने में दोषी पाया गया है। चौथे मामले में विजिलेंस ने एसपी ओझा को रिटायर कुलसचिव एएन सेठ को विशेष कार्याधिकारी के पद पर नियुक्त करने के मामले में पद का दुरुपयोग कर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 के तहत दोषी मानते हुए एफआईआर दर्ज कराई है। बता दें कि डॉ. एसपी ओझा के खिलाफ सच संस्था के अध्यक्ष एडवोकेट संदीप पहल द्वारा राज्यपाल से शिकायत किए जाने पर संज्ञान लिया गया था।
मूल्यांकन घोटाले के बाद सुर्खियों में आए थे ओझा
डॉ. एसपी ओझा ने साल 2005 में चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के कुलपति के तौर पर कार्यभार ग्रहण किया। साल 2006 में विश्वविद्यालय की कापियां आगरा में कूड़े के ढेर में मिलने के बाद हंगामा खड़ा हो गया था। प्रोेफेशनल कोर्सों की इन कॉपियों को आठवीं तक के बच्चों द्वारा जांचा जा रहा था। सच्चाई सामने आने के बाद मेरठ विश्वविद्यालय में हंगामा खड़ा हो गया था। छात्रों ने कुलपति के इस्तीफे की मांग करते हुए आंदोलन किया लेकिन कुलपति को पूरे मामले में क्लीन चिट मिल गई थी। साल 2008 में सच संस्था के अध्यक्ष एडवोकेट संदीप पहल ने एसपी ओझा पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाते हुए राज्यपाल से शिकायत की थी। 3 सितंबर 2008 को संदीप पहल ने राज्यपाल से मिलकर उन्हें एक सीडी सौंपी थी। इसमें संदीप पहल ने मीडिया को बताया था कि सीडी में एसपी ओझा रिश्वत लेते नजर आ रहे थे। सीडी राजभवन पहुंचने के बाद 4 सितंबर 2008 को एसपी ओझा से राज्यपाल ने इस्तीफा मांग लिया था। पूरे प्रकरण में शिकायतकर्ता डॉ. संदीप पहल का कहना है कि विजिलेंस को जल्द से जल्द विवेचना पूरी करके एसपी ओेझा को गिरफ्तार करना चाहिए। इसके साथ ही जो भ्रष्टाचार किया गया है, उसकी रिकवरी की जानी चाहिए। कुलपति के पद पर रहते हुए एसपी ओझा ने जिन कर्मचारियों और प्रोफेसर को लाभ दिया, वे भी कार्रवाई की जद में आ सकते हैं।
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