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चीनी से भरपूर 0238 गन्ने का घटा उत्पादन
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Tue, 16 May 2017 02:28 AM IST
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फाइल फोटो
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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सीओजे-1148 और सीओजे-64 के बाद गन्ने की फसल में नई क्रांति लाकर किसानों व मिलों को मालामाल करने वाली प्रजाति सीओ-0238 परंपरागत बुआई प्रणाली से कमजोर होने लगी है। बुआई में लाइनों की उचित दूरी नहीं रखने से गन्ने का साइज जहां कम हो रहा है वहीं चीनी की रिकवरी भी औसत से कम निकल रही है। अपेक्षा से कम उत्पादन भी किसानों पर ही भारी पड़ रहा है। उत्पादन और चीनी रिकवरी बढ़ाने के लिए किसानों को इसकी खेती वैज्ञानिक तरीके से ही करनी होगी। गन्ना विभाग और मिल प्रबंधन ने इसके लिए किसानों को जागरूक करना शुरू कर दिया है।
वेस्ट यूपी को में मुख्य फसल गन्ना होेने के चलते यहां के किसानों को इसमें पारंगत माना जाता है। लेकिन यहां के अधिकतर किसान जहां आज भी ग्रीष्मकालीन गन्ना बुआई कर रहे वहीं बुआई का तरीका भी परंपरागत (लाइन से लाइन की दूरी दो फीट) चला आ रहा है। परंपरागत तरीके की बुआई से किसान उत्पादन और चीनी रिकवरी से मालामाल प्रजाति 0238 का भी पूरा फायदा नहीं उठा पा रहे हैं। पिछले कुछ सालों से देखने में आ रहा है कि लाइनों की उचित दूरी न होने से इस प्रजाति का गन्ना वास्तविक मोटाई से कम होता जा रहा है। साथ ही उसमें चीनी की रिकवरी भी प्रभावित हो रही है।
गन्ना विभाग और शुगर इंडस्ट्री गंभीर
गिरते उत्पादन और चीनी रिकवरी के बाद गन्ना विभाग और शुगर इंडस्ट्री गंभीर हो गई हैं। गन्ना विभाग के अधिकारी व कर्मचारी जहां किसानों को गोष्ठियों के माध्यम से लाइनों की दूरी बढ़ाकर 3 फीट तक करने की सलाह दे रहे हैं वहीं शुगर मिलें भी ट्रैंच ओपनर तक मुहैया करा रही हैं। लेकिन किसान मानने को तैयार नहीं है। लाइनों को 2 फीट से बढ़ाकर 2.5 फीट ही किया है।
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वैज्ञानिक तकनीक अपनाकर पाएं अधिक लाभ
गन्ना विशेषज्ञ व त्रिवेणी शुगर मिल देवबंद के जीएम डॉ. भोपाल सिंह तोमर ने बताया कि सीओ-0238 के जनक डॉ. बक्शी राम ने इस प्रजाति का विकास कर गन्ना किसानों व चीनी उद्योग को पुनर्जीवित किया है। लेकिन किसान पूरी क्षमता अनुसार इसकी पैदावार नहीं ले पा रहे हैं। इसकी उत्पादन क्षमता 200 कुंतल प्रति बीघा है जो बिजनौर जनपद के किसानों ने सिद्ध कर दिया है। बुआई में लाइन से लाइन की दूरी 4 से 5 फीट आवश्यक है। ऐसा करने से कल्ले सूखने की समस्या खत्म हो जाती है। गन्ने की मोटाई डेढ़ से दो गुणा तक बढ़ जाती है और जंगली जानवरों से नुकसान न्यूनतम हो जाता है। जबकि लाइन से लाइन की कम दूरियां बेहद हानिकारक है। अधिक कल्ले होने से गन्ने की मोटाई कम हो जाती है।
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वेस्ट यूपी को में मुख्य फसल गन्ना होेने के चलते यहां के किसानों को इसमें पारंगत माना जाता है। लेकिन यहां के अधिकतर किसान जहां आज भी ग्रीष्मकालीन गन्ना बुआई कर रहे वहीं बुआई का तरीका भी परंपरागत (लाइन से लाइन की दूरी दो फीट) चला आ रहा है। परंपरागत तरीके की बुआई से किसान उत्पादन और चीनी रिकवरी से मालामाल प्रजाति 0238 का भी पूरा फायदा नहीं उठा पा रहे हैं। पिछले कुछ सालों से देखने में आ रहा है कि लाइनों की उचित दूरी न होने से इस प्रजाति का गन्ना वास्तविक मोटाई से कम होता जा रहा है। साथ ही उसमें चीनी की रिकवरी भी प्रभावित हो रही है।
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गिरते उत्पादन और चीनी रिकवरी के बाद गन्ना विभाग और शुगर इंडस्ट्री गंभीर हो गई हैं। गन्ना विभाग के अधिकारी व कर्मचारी जहां किसानों को गोष्ठियों के माध्यम से लाइनों की दूरी बढ़ाकर 3 फीट तक करने की सलाह दे रहे हैं वहीं शुगर मिलें भी ट्रैंच ओपनर तक मुहैया करा रही हैं। लेकिन किसान मानने को तैयार नहीं है। लाइनों को 2 फीट से बढ़ाकर 2.5 फीट ही किया है।
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गन्ना विशेषज्ञ व त्रिवेणी शुगर मिल देवबंद के जीएम डॉ. भोपाल सिंह तोमर ने बताया कि सीओ-0238 के जनक डॉ. बक्शी राम ने इस प्रजाति का विकास कर गन्ना किसानों व चीनी उद्योग को पुनर्जीवित किया है। लेकिन किसान पूरी क्षमता अनुसार इसकी पैदावार नहीं ले पा रहे हैं। इसकी उत्पादन क्षमता 200 कुंतल प्रति बीघा है जो बिजनौर जनपद के किसानों ने सिद्ध कर दिया है। बुआई में लाइन से लाइन की दूरी 4 से 5 फीट आवश्यक है। ऐसा करने से कल्ले सूखने की समस्या खत्म हो जाती है। गन्ने की मोटाई डेढ़ से दो गुणा तक बढ़ जाती है और जंगली जानवरों से नुकसान न्यूनतम हो जाता है। जबकि लाइन से लाइन की कम दूरियां बेहद हानिकारक है। अधिक कल्ले होने से गन्ने की मोटाई कम हो जाती है।