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सपनों में सिमटी महायोजना 2021, मशक्कत 2031 की
Fri, 26 Apr 2019 03:25 AM IST
Gaurav sharma
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
Published by: Gaurav sharma
Updated Fri, 26 Apr 2019 03:25 AM IST
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महायोजना मानचित्र
- फोटो : अमर उजाला
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महानगर के विकास के लिए तैयार किए गए मास्टर प्लान यानी मेरठ महायोजना 2021 को पूरा होने में मात्र दो साल का समय रह गया है। लेकिन विडंबना देखिए कि यहां विकास अभी सपना ही है। बड़े प्रोजेक्टों पर काम ही नहीं हो पाया। उधर, अब नए मास्टर प्लान 2031 पर काम करने के लिए मशक्कत शुरू कर दी गई है।
दूसरा चरण भी पूरा होने को
मेरठ महायोजना 2021 वर्ष 2004 में बनी थी। दरअसल इस पर साल 2004 से ही काम होना शुरू हो गया। लेकिन देरी होने के कारण इसका नोटिफिकेशन वर्ष 2006 में हुआ। दो चरणों में इस योजना के शहर के विकास का मसौदा तैयार किया गया। पहला चरण वर्ष 2004 से 2011 तक तथा दूसरा चरण वर्ष 2012 से 2021 तक तक है।
इन प्रस्तावों पर होना था काम --
आउटर रिंग रोड : मास्टर प्लान के ले आउट में गहरे रंग में जिस मार्ग को प्रतिबिंबित किया गया है वह आउटर रिंग रोड है। योजना थी कि शहर की तरफ प्रवेश करने वाले सभी मुख्य मार्गों को शहर के बाहर ही जोड़ने के लिए मेरठ में 70 किमी की आउटर रिंग रोड बनेगी। यह दिल्ली रोड से हापुड़ रोड, वहां से मवाना रोड, रुड़की रोड तथा वहां से घूमते हुए फिर दिल्ली रोड पर आकर मिलेगी। रोड को दो लेन बनाने का प्रस्ताव था। एनएच-58 पर एक तरफ यह मोहिउद्दीनपुर के पास तो दूसरी तरफ दौराला के पास क्रॉस कराने का प्लान था। लेकिन यह योजना केवल कागजों में ही रह गई। एमडीए ने तो शासन तक में लिखकर दे दिया कि एमडीए इसे नहीं बना सकता है।
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इनर रिंग रोड: शहर के भीतर 34 किमी लंबी इनर रिंग रोड को भविष्य में शहर की लाइफ लाइन कहा जा रहा था। लेकिन इस पर काम ही नहीं हुआ। योजनाओं में जरूर कुछ हिस्सों में यह सड़क बन गई। लेकिन यह प्रस्ताव पूरा ही नहीं हो पाया। विभागों के बीच ही प्रस्ताव पिसकर रह गया।
डेयरियां: मेरठ महायोजना में उद्योगों के लिए भी अलग से प्लान बना था। कहा यह गया था कि शहर से डेयरियाें को बाहर कर अलग से विकसित किया जाएगा। शहर की डेयरियों को लेकर तो हाईकोर्ट भी सख्ती दिखा चुका है। लेकिन डेयरी बाहर हो ही नहीं पाई। कई बार इसके लिए आवाज उठी। डेयरी संचालकों ने सस्ती दर पर जमीन मांगी। लेकिन न जमीन दी गई और न ही डेयरियां शिफ्ट हो पाईं। अब कैटल कालोनी विकसित करने के लिए एमडीए सीलिंग की जमीन ढूंढ रहा है। चूंकि हाईकोर्ट ने फिर इस पर जवाब देने को कहा है।
बस अड्डे: महायोजना का अहम प्रस्ताव था नए बस अड्डे बनाना और पुराने बस अड्डों को शिफ्ट करना। यह हो ही नहीं पाया। हैरत तो यह है कि बस अड्डों की वजह से शहर में यातायात व्यवस्था बुरी तरह से प्रभावित है। पूरा शहर जाम की चपेट में इनके कारण रहता है। सेटेलाइट बस अड्डे का प्रस्ताव भी गिर गया और उसके लिए सुरक्षित जमीन पर अब आवासीय कालोनी के लिए भूखंड आवंटन कर दिया गया।
हवा में पुल: इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि पिछले आठ साल से जुर्रानपुर रेलवे फाटक के पास फ्लाईओवर हवा में लटका है और उसे रोड बनाकर जोड़ा नहीं जा सका है। यह प्रोजेक्ट मेरठ महायोजना में शुमार किया गया था।
न्यू टीपी नगर: शहर के बीचों बीच दिल्ली रोड पर ट्रांसपोर्ट नगर है जिसके कारण दिल्ली रोड पर जाम रहता है। मास्टर प्लान में न्यू टीपी नगर का प्रस्ताव था। पांचली में इसके लिए जमीन आरक्षित की गई। लेकिन प्रस्ताव पूरा नहीं हो पाया। यहां तक कि एमडीए ने इसके लिए एडीएम भू अध्याप्ति के यहां जमा दस करोड़ रुपया भी वापस ले लिया।
अधिकारियों की शह पर धड़ाम हुई यह योजना
मेरठ महायोजना अधिकारियों की शहर पर धड़ाम हुई। मनमर्जी से नक्शे पास किए गए। जिन मार्गों को चौड़ा करना था, उन पर कम चौड़ाई में ही नक्शे पास कर दिए गए। शताब्दीनगर से हवाई पट्टी को जोड़ने वाली रोड के बीच में अवैध कालोनी डेवलेप हो गई। ग्रीन बेल्ट पर कब्जे हो गए। केवल एमडीए और आवास विकास ही नहीं बल्कि, सिंचाई, वन, पीडब्लूडी आदि विभागों ने भी शह दी और शहर का अनियोजित विकास होता गया।
देखेंगे कैसे बात बने
इनर रिंग रोड जैसे प्रस्ताव तो शहर के लिए बेहद जरूरी हैं। मैं खुद मास्टर प्लान के ऐसे प्रस्तावों को लेकर गंभीर हूं। अन्य विभागों से भी बात की जा रही है कि इन प्रस्तावों पर कैसे बात बने। -राजेश कुमार पांडेय, वीसी एमडीए
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दूसरा चरण भी पूरा होने को
मेरठ महायोजना 2021 वर्ष 2004 में बनी थी। दरअसल इस पर साल 2004 से ही काम होना शुरू हो गया। लेकिन देरी होने के कारण इसका नोटिफिकेशन वर्ष 2006 में हुआ। दो चरणों में इस योजना के शहर के विकास का मसौदा तैयार किया गया। पहला चरण वर्ष 2004 से 2011 तक तथा दूसरा चरण वर्ष 2012 से 2021 तक तक है।
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इन प्रस्तावों पर होना था काम --
आउटर रिंग रोड : मास्टर प्लान के ले आउट में गहरे रंग में जिस मार्ग को प्रतिबिंबित किया गया है वह आउटर रिंग रोड है। योजना थी कि शहर की तरफ प्रवेश करने वाले सभी मुख्य मार्गों को शहर के बाहर ही जोड़ने के लिए मेरठ में 70 किमी की आउटर रिंग रोड बनेगी। यह दिल्ली रोड से हापुड़ रोड, वहां से मवाना रोड, रुड़की रोड तथा वहां से घूमते हुए फिर दिल्ली रोड पर आकर मिलेगी। रोड को दो लेन बनाने का प्रस्ताव था। एनएच-58 पर एक तरफ यह मोहिउद्दीनपुर के पास तो दूसरी तरफ दौराला के पास क्रॉस कराने का प्लान था। लेकिन यह योजना केवल कागजों में ही रह गई। एमडीए ने तो शासन तक में लिखकर दे दिया कि एमडीए इसे नहीं बना सकता है।
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इनर रिंग रोड: शहर के भीतर 34 किमी लंबी इनर रिंग रोड को भविष्य में शहर की लाइफ लाइन कहा जा रहा था। लेकिन इस पर काम ही नहीं हुआ। योजनाओं में जरूर कुछ हिस्सों में यह सड़क बन गई। लेकिन यह प्रस्ताव पूरा ही नहीं हो पाया। विभागों के बीच ही प्रस्ताव पिसकर रह गया।
डेयरियां: मेरठ महायोजना में उद्योगों के लिए भी अलग से प्लान बना था। कहा यह गया था कि शहर से डेयरियाें को बाहर कर अलग से विकसित किया जाएगा। शहर की डेयरियों को लेकर तो हाईकोर्ट भी सख्ती दिखा चुका है। लेकिन डेयरी बाहर हो ही नहीं पाई। कई बार इसके लिए आवाज उठी। डेयरी संचालकों ने सस्ती दर पर जमीन मांगी। लेकिन न जमीन दी गई और न ही डेयरियां शिफ्ट हो पाईं। अब कैटल कालोनी विकसित करने के लिए एमडीए सीलिंग की जमीन ढूंढ रहा है। चूंकि हाईकोर्ट ने फिर इस पर जवाब देने को कहा है।
बस अड्डे: महायोजना का अहम प्रस्ताव था नए बस अड्डे बनाना और पुराने बस अड्डों को शिफ्ट करना। यह हो ही नहीं पाया। हैरत तो यह है कि बस अड्डों की वजह से शहर में यातायात व्यवस्था बुरी तरह से प्रभावित है। पूरा शहर जाम की चपेट में इनके कारण रहता है। सेटेलाइट बस अड्डे का प्रस्ताव भी गिर गया और उसके लिए सुरक्षित जमीन पर अब आवासीय कालोनी के लिए भूखंड आवंटन कर दिया गया।
हवा में पुल: इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि पिछले आठ साल से जुर्रानपुर रेलवे फाटक के पास फ्लाईओवर हवा में लटका है और उसे रोड बनाकर जोड़ा नहीं जा सका है। यह प्रोजेक्ट मेरठ महायोजना में शुमार किया गया था।
न्यू टीपी नगर: शहर के बीचों बीच दिल्ली रोड पर ट्रांसपोर्ट नगर है जिसके कारण दिल्ली रोड पर जाम रहता है। मास्टर प्लान में न्यू टीपी नगर का प्रस्ताव था। पांचली में इसके लिए जमीन आरक्षित की गई। लेकिन प्रस्ताव पूरा नहीं हो पाया। यहां तक कि एमडीए ने इसके लिए एडीएम भू अध्याप्ति के यहां जमा दस करोड़ रुपया भी वापस ले लिया।
अधिकारियों की शह पर धड़ाम हुई यह योजना
मेरठ महायोजना अधिकारियों की शहर पर धड़ाम हुई। मनमर्जी से नक्शे पास किए गए। जिन मार्गों को चौड़ा करना था, उन पर कम चौड़ाई में ही नक्शे पास कर दिए गए। शताब्दीनगर से हवाई पट्टी को जोड़ने वाली रोड के बीच में अवैध कालोनी डेवलेप हो गई। ग्रीन बेल्ट पर कब्जे हो गए। केवल एमडीए और आवास विकास ही नहीं बल्कि, सिंचाई, वन, पीडब्लूडी आदि विभागों ने भी शह दी और शहर का अनियोजित विकास होता गया।
देखेंगे कैसे बात बने
इनर रिंग रोड जैसे प्रस्ताव तो शहर के लिए बेहद जरूरी हैं। मैं खुद मास्टर प्लान के ऐसे प्रस्तावों को लेकर गंभीर हूं। अन्य विभागों से भी बात की जा रही है कि इन प्रस्तावों पर कैसे बात बने। -राजेश कुमार पांडेय, वीसी एमडीए