पांच सांस्कृतिक कालों का संगम है लाक्षागृह टीला, उत्खनन में मिले शीशे के टुकड़े
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बागपत जनपद के बरनावा में लाक्षागृह टीला प्राचीन पांच संस्कृतियों का संगम है। यहां चल रहे उत्खनन में अब तक जो साक्ष्य मिले हैं उसमें यहां 16 ईसा पूर्व यानि करीब 3600 साल पुरानी संस्कृतियों के अवशेष मिले हैं। सबसे खास बात है कि उस समय यहां रहने वाले शीशे की तकनीक से भी परिचित थे। कुछ हरे रंग के शीशे के टुकड़े मिलने से यह साबित होता है कि यहां के निवासी शीशे का इस्तेमाल करते रहे होंगे। हालांकि यह लंबे शोध का विषय है कि शीशे का वे किस तरह उपयोग करते थे।
वहीं मुख्य टीले के पीछे चित्रित धूसर मृदभांड (पेंटेड ग्रे वेयर-पीजीडब्ल्यू) के अवशेष सबसे प्राचीन संस्कृति के दर्शन कराते हैं। इसके बाद कुषाण काल यानि पहली सदी की ईंट की दीवारें भी मौजूद हैं। इन दोनों संस्कृतियों के बीच की कड़ी में कच्ची मिट्टी की दीवारें भी यहां दिखाई देती है।
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3600 साल पुरानी संस्कृति के अवशेष मिले
यहां पांचवी-छठी शताब्दी गुप्तकाल के अवशेष भी सामने आए हैं। 9 वीं-10वी शताब्दी यानि राजपूत काल और मुगल काल के अवशेष भी मिले हैं। यहां मिले साक्ष्यों के आधार पर इन सांस्कृतिक कालों में रहने वालों का रहन-सहन कैसा था, इस पर विस्तृत अध्ययन होना बाकी है, क्योंकि अभी उत्खनन की प्रक्रिया जारी है। इस दौरान कुछ नए साक्ष्य भी मिल सकते हैं।
विविध कालक्रम में यहां के निवासियों का रहन-सहन ज्यामितीय पैटर्न पर था। पीजीडब्ल्यू के निर्माण के लिए चाक का इस्तेमाल किया गया होगा। इनको पकाने के लिए बनाए गए पिट भी मिले हैं। लकड़ी जलाने से चारकोल के अवशेष भी मिले हैं। पशुओं की हड्डियां इस बात का संकेत हैं कि यहां के लोग पशुपालन भी करते रहे होंगे।
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