रहें सावधान : कोरोना संक्रमण के साथ पहले नौ दिन काला फंगस तो जान का खतरा, हर उम्र के लोगों पर कर सकता है हमला
मेरठ में तीन मरीजों में ब्लैक फंगस की पुष्टि हुई है, इनमें दो मरीज बिजनौर और एक मुजफ्फरनगर का रहने वाला है। दो का उपचार न्यूटिमा अस्पताल में चल रहाए जबकि तीसरे को परिजन कहीं और ले गए
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ब्लैक फंगस संक्रमण महाराष्ट्र-गुजरात के कुछ जिलों के बाद मेरठ में भी देखने को मिला है। न्यूटिमा अस्पताल में तीन ऐसे मरीज भर्ती हैं जिन्हें ब्लैक फंगस की बीमारी हो गई है। बिजनौर का एक और मरीज ब्लैक फंगस (म्यूकॉरमायकोसिस) की चपेट में आया है। उसका इलाज भी न्यूटिमा अस्पताल में शुरू किया गया था, लेकिन परिजन उसे कहीं और ले गए हैं। फिलहाल यहां दो मरीजों का इलाज चल रहा है। दोनों की हालत गंभीर बनी हुई है।
अस्पताल एमडी डॉ. संदीप गर्ग ने इसकी पुष्टि की है। वहीं विशेषज्ञों को कहना है कि संक्रमण के बाद पहले नौ दिन बेहद महत्वपूर्ण हैं। कोरोना संक्रमण के बाद अगर काले फंगस की शिकायत हुई तो जान को खतरा बढ़ जाता है। यह फंगस त्वचा के साथ नाक, फेफड़ों और मस्तिष्क तक को नुकसान पहुंचा सकता है। महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, ओडिशा और दिल्ली में मरीज मिल चुके हैं। अब बिजनौर और मुजफ्फरनगर में भी मरीज मिले हैं।
सांस एवं छाती रोग विशेषज्ञ डॉ. वीरोत्तम तोमर ने बताया कि काला फंगस पहले से ही हवा और जमीन में मौजूद है। जैसे ही कोई कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता वाला व्यक्ति इसके संपर्क में आता है, तो उसके चपेट में आने की आशंका अधिक रहती है। जो मरीज जितने लंबे समय तक अस्पताल में रहेगा और जितनी अधिक उसे स्टेरॉयड, एंटीबायोटिक और एंटीफंगल दवाएं चलती रहेंगी, उसे इससे खतरा बढ़ता जाएगा।
वरिष्ठ फिजिशियन डॉ. तनुराज सिरोही बताते हैं कि हवा में फंगस की मौजूदगी के कारण यह सबसे पहले नाक में घुसता है। फेफड़ों के बाद रक्त से मस्तिष्क तक पहुंच सकता है। ब्लैक फंगस का संक्रमण जितना गंभीर होगा, लक्षण भी उतने ही गंभीर होंगे।
नाक पर जहाँ चश्मा अटकता है, वो काली दिखने लगेगी जिसे नेजल ब्रिज कहते हैं। काला फंगस जब मस्तिष्क तक पहुंचेगा, तो व्यक्ति बेहोशी की हालत में रहेगा। जबड़े और दांतों में संक्रमण का स्तर गंभीर होने पर ऑपरेशन की भी जरूरत पड़ सकती है।
एक्स-रे या सीटी स्कैन में दिखता है कालापन
मेडिकल के कोविड प्रभारी डॉ. सुधीर राठी ने बताया कि काले फंगस का लक्षण दिखने के बाद जब रोगी के सीने या सिर का एक्स-रे किया जाता है, तो उसमें स्पष्ट तौर पर कालापन दिखता है। संक्रमण की चपेट में आकर मौत की दर 50 फीसदी है। सबसे अधिक खतरा मधुमेह रोगी, गुर्दा प्रत्यारोपण करा चुके व्यक्ति या जिनका शुगर लेवल 300 से 500 तक है, उन लोगों में समय के साथ मौत की आशंका बढ़ जाती है।
अस्पताल में हर दिन खतरनाक
फंगल संक्रमण का खतरा उन कोरोना संक्रमितों को अधिक है जो लंबे समय तक अस्पताल में रहते हैं। आईसीयू और वेंटिलेटर यूनिट में भर्ती मरीजों को कई तरह की दवाएं दी जाती हैं। दवाएं शरीर को कमजोर करती हैं। इससे हवा में मौजूद काला फंगस आसानी से शरीर में प्रवेश कर रोगी की जान का दुश्मन बन रहा है।
सभी आयु वर्गों में कर सकता हमला
ये संक्रमण सभी आयु वर्गों में पाया जा सकता है। कभी-कभी ऊपरी या नीचे जबड़े के लिए तो कभी आंख के पीछे इस म्यूकरमायकोसिस के लक्षण दिखते हैं। ये बीमारी कम इम्यूनिटी की वजह से होती है। इसमें नियमित ब्लड टेस्ट होते हैं। शुगर लेवल भी तीन बार चेक किया जाता है। चार बार इंसुलिन की डोज दी जाती है। रिकवरी के बाद पूरी तरह ठीक होने की लंबी प्रक्रिया है।