बागपत: उत्खनन में मिले नर कंकाल, तांबे की तलवार और मृदभांड
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भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग उत्खनन शाखा द्वितीय और भारतीय पुरातत्व संस्थान लाल किला की संयुक्त टीम को सिनौली में चल रहे उत्खनन में मृदभांड, तांबे की तलवार, तांबे के अवशेष के अलावा नर कंकाल भी मिले हैं। संभावना है कि हड़प्पा संस्कृति में शव को लकड़ी के ताबूत में रख कर ही दफनाने की परंपरा थी। खास बात इन ताबूतों पर तांबे से की जाने वाले नक्काशी थी। सिनौली की खुदाई में कब्रिस्तान तो दोनों बार मिले हैं, लेकिन यह सवाल अभी अनसुलझा है कि इस दौर की आबादी कहां थी।
पुरातत्व विभाग की टीम बरनावा में खुदाई करने पहुंची थी, लेकिन 13 साल बाद उत्खनन का केंद्र दोबारा से सिनौली बन गया है। करीब 4500 साल पहले के इतिहास की परतों को जोड़ने के लिए किए जा रहे उत्खनन में कई महत्वपूर्ण प्रमाण मिले हैं। पहले चरण की खुदाई में हड़प्पा कालीन शव दान गृह मिला था, अब दूसरे चरण की खुदाई में तीन नर कंकाल मिल चुके हैं। कब्र में लकड़ी और तांबे के टुकड़े मिले हैं, इससे यह भी अंदाजा लगाया जा रहा है कि इस काल में शव को लकड़ी के ताबूत में रखकर दफनाते थे और इस ताबूत पर तांबे की नक्काशी होती थी। यह नक्काशी उस दौर की संस्कृति को बताती है। सिनौली में मिले अवशेषों का गहनता से अध्ययन किया जा रहा है।
शहजाद राय शोध संस्थान बड़ौत के निदेशक अमित राय जैन कहते हैं कि सिंधु सभ्यता में तांबे और सोने का महत्वपूर्ण काम हुआ है। सिनौली क्षेत्र के लोग तांबे के जानकार थे और संभावना यह है कि लकड़ी के ताबूतों का इस्तेमाल किया जाता रहा होगा।
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सिनौली पर टिकी पुरातत्वविदों की निगाह
सिनौली में 2005-06 में उत्खनन कार्य डॉ. डीवी शर्मा के निर्देशन में किया था। पिछले दिनों डॉ. शर्मा ने भी सिनौली पहुंचकर साइट का निरीक्षण किया और यहां से बरामद हुए मृदभांड एवं अन्य चीजों की जानकारी जुटाई।
डेक्कन कॉलेज की टीम पहुंची बरनावा
बरनावा में चल रहे उत्खनन कार्य में सहयोग के लिए डेक्कन कॉलेज, पुणे की टीम भी पहुंच गई है। पिछले दिनों संस्थान के निदेशक डॉ. बसंत ने भी बरनावा और सिनौली का निरीक्षण किया था। छह शोधार्थी और एक प्रोफेसर बरनावा और सिनौली में सहयोग कर रहे हैं।
लाक्षागृह की नहीं खुल सकी परतें
महाभारत कालीन बताए जाने वाले लाखा मंडप टीले के निकट हिंडन नदी के किनारे पुरातत्व विभाग की टीम उत्खनन धीरे-धीरे कर रही है। पुरातत्व संस्थान के निदेशक डॉ. एसके मंजुल के नेतृत्व में उत्खनन चल रहा है, लेकिन यहां पर कंकाल और पुरानी ईंटों की दीवारों के अलावा किसी तरह की महाभारत कालीन चीजें नहीं मिली हैं। चित्रित धूसर मृदभांड मिलने से यह जाहिर है कि हिंडन नदी के किनारे प्राचीन संस्कृति मौजूद थी।
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