यमुना किनारे बसे बागपत को यहां के खरबूजे ने खास पहचान बख्शी थी। बागपत के खरबूजे को कई राज्यों में सप्लाई किया जाता था, लोग चाव से खाते थे, लेकिन बदलते दौर में बागपत को पहचान देने वाला खरबूजा खेतों और बाजार से गायब हो गया।
अनोखी खुशबू, उम्दा मिठास.., निराला था देसी 'बट्टी' का स्वाद, गायब हुई बागपत के खरबूजे की खास प्रजाति
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यमुना में आए साल पानी की कमी के कारण किसानों ने भी गंगा किनारे के क्षेत्र का रुख करना शुरू कर दिया है। बागपत के पालेज लगाने वाले किसान मुजफ्फरनगर से लेकर गढ़ मुक्तेश्वर तक खरबूजे की पालेज लगा रहे हैं, लेकिन यहां अब बागपत के खरबूजे की देसी वैरायटी की जगह हाइब्रिड बीजों ने ले ली है।
नए दौर में मधु राजा नाम की वैरायटी की बाजार में खूब मांग है। किसान बताते हैं कि बागपत के देसी खरबूजे के बाद मधु राजा की मांग सबसे अधिक हुई है। इसकी मिठास के चलते दिल्ली से एडवांस बुकिंग चल रही है। बागपत के देसी खरबूजे की किस्म पानी की कमी और फसल में बीमारी की अधिकता के चलते करीब एक दशक पहले ही दम तोड़ चुकी है। अब यहां मधु राजा की धूम है।
गढ़मुक्तेश्वर की ओर किसानों ने किया रुख
यमुना में पानी की कमी के चलते किसानों ने अब गंगा क्षेत्र की ओर रुख किया हुआ है। अहमद, जम्मे, यामीन, अरबू, रूम्मी, काला सहित दर्जनों क्षेत्रीय किसान गढ़मुक्तेश्वर में हर वर्ष जाते हैं। वहां जमीन उगाही पर लेकर खरबूजे और तरबूज की पैदावार करते हैं। कारण गंगा में हर समय पानी रहता है। इसके चलते लोग वहीं पालेज लगाकर अपना और परिवार का गुजर बस कर रहे हैं।
हाईब्रिड के फेर में फंस गए किसान
किसान नूर हसन, यूसुफ, बिट्टू, नूरद्दीन बताते है कि यमुना में पानी न आना फसलों को नुकसान होता है। यही वजह है कि बागपत का खरबूजे ने अपनी पहचान को खो दिया है। वहीं हाईब्रीड बीज का भी चलन बढ़ा है, जिस कारण किसान पुरानी प्रजाति को भूल गए है। हाईब्रिड से किसानों को कम समय में बेहतर फसल मिल रही है।