हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की मिसाल पेश: अंकुर को अकबर और अली को अनीता के गुर्दे से मिला जीवनदान
मेरठ में हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की मिसाल पेश की गई। अंकुर को अकबर अली और अफसर अली को अनीता मेहरा ने अपना गुर्दा देकर जीवनदान दिया है।
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मेरठ में अंकुर को अकबर अली और अफसर अली को अनीता मेहरा ने अपना गुर्दा देकर जीवनदान दिया है। गुर्दा प्रत्यारोपण के जरिये हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की मिसाल गढ़ रोड स्थित न्यूटीमा अस्पताल में पेश की गई। एक दूसरे की जिंदगी बचाने के लिए दोनों परिवारों के लोग धर्म भूलकर आगे आए और चिकित्सकों की मदद से गुर्दे प्रत्यारोपित किए गए।
गुर्दा रोग विशेषज्ञ डॉ संदीप गर्ग ने बताया कि अंकुर मेहरा (22) मोदीनगर, गाजियाबाद के रहने वाले हैं। इनकी माता अनीता मेहरा हैं। अफसर अली और उनके भाई अकबर अली अमरोहा निवासी हैं। डायबिटीज के कारण अफसर अली के गुर्दे खराब हो गए, जबकि अंकुर के गुर्दे बचपन से ही खराब थे। दोनों का ही उनके यहां लंबे समय से इलाज चल रहा है। पिछले कुछ दिनों से इन दोनों को प्रत्यारोपण के लिण् ब्लड ग्रुप के हिसाब से गुर्दा दाता नहीं मिल रहा था।
अंकुर का ब्लड ग्रुप ए पॉजिटिव और अफसर का ब्लड ग्रुप बी पॉजिटिव है। अंकुर की माता अनीता का ब्लड ग्रुप बी पॉजिटिव और अफसर के भाई अकबर का ब्लड ग्रुप ए पॉजिटिव होने का पता चला। दोनों गुर्दा देने के लिए तैयार हो गए। प्रशासन से अनुमति की प्रक्रिया के बाद स्वैप विधि से इनके गुर्दे प्रत्यारोपित किए गए। अंकुर को अकबर ने और अफसर को अनीता ने गुर्दा दिया। इनका कहना था कि इनके लिए जात-पात और धर्म से इंसानियत बड़ी है, जिंदगी बड़ी है। चारों ठीक हैं। गुर्दा प्रत्यारोपण में डॉ. शालीन शर्मा और डॉ. शरत चंद्र गर्ग का भी सहयोग रहा।
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ऐसे होता है गुर्दा प्रत्यारोपण
जब किसी मरीज के गुर्दे पूरी तरह से काम करना बंद कर देते हैं, तो मरीज के पास सिर्फ दो ही विकल्प बचते हैं। पहला गुर्दा रोगी लगातार डायलिसिस कराए, दूसरा वह गुर्दा प्रत्यारोपण करा सामान्य जीवन व्यतीत करे। अगर मरीज दूसरा विकल्प चुनता है तो उसे परिवार का कोई सदस्य, रिश्तेदार या दोस्त गुर्दा दान कर सकता है।
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सामान्य तौर पर गुर्दा प्राप्तकर्ता और गुर्दा दाता का ब्लड ग्रुप समान होना चाहिए। डॉ. संदीप गर्ग ने बताया कि इसमें करीब सात लाख रुपये का खर्च आता है। हालांकि ब्लड ग्रुप अलग होने पर भी अब प्रत्यारोपण हो जाता है, लेकिन उसमें साढ़े तीन से चार लाख रुपये खर्च ज्यादा आता है। उसमें दवाइयों का इस्तेमाल बढ़ जाता है।