मेरठ में हस्तिनापुर विकासखंड की ग्राम पंचायत सैफपुर करमचंदपुर ग्रामीणों ने इस पंचायत चुनाव में 32 वर्षीय मोनिका भाटी को प्रधान पद की कमान सौंपी हैं। हालांकि उनका राजनीति से दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं है। इसके बाद भी उन्होंने गांव का विकास कराने के उद्देश्य से चुनाव लड़ा। लोगों ने भी गांव की एक उच्च शिक्षित महिला पर अपना भरोसा जताया।
क्षेत्र के ऐतिहासिक गांव सैफपुर करमचंदपुर में प्रधान पद के सात उम्मीदवार थे, लेकिन ग्रामीणों ने मोनिका भाटी को प्रधान चुना। उन्हें गांव में विकास कार्य कराने का मौका दिया। मोनिका के पति और परिवार के लोग खेती किसानी के साथ व्यापार और सरकारी नौकरियों से जुड़े हैं। उन्होंने बताया कि उनका पहला उद्देश्य गांव में फैल रहे कोरोना संक्रमण को रोकना है। इसके लिए उन्होंने ग्रामीणों को जागरूक करना भी शुरू कर दिया है। इसके बाद वह गांव के गरीब परिवारों के लिए पक्की छत का इंतजाम करेंगी। गांव में करीब 50 परिवार ऐसे हैं, जो कच्चे और टूटे मकानों में रहते हैं। उन्हें प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना के तहत मकानों का इंतजार है। इसके बाद गांव के टूटे रास्तों को दुरुस्त कराना और पथ प्रकाश की व्यवस्था करना भी प्राथमिकता में है। इसके साथ गांव के सभी बच्चों को शिक्षा के प्रति जागरूक करना है। ताकि वह गांव और देश का नाम रोशन कर सकें।
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ग्राम प्रधान मोनिका भाटी।
- फोटो : amar ujala
परिचय
नाम - मोनिका भाटी
उम्र करीब - 32 वर्ष
शैक्षिक योग्यता- एमए, एमएड, कंप्यूटर बेसिक
राजनीति जीवन - पहली बार चुनाव लड़ा
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सैफपुर करमचंदपुर गांव।
- फोटो : amar ujala
ग्राम पंचायत पर एक नजर
ग्राम पंचायत की आबादी - 5000
ग्राम पंचायत में मतदाता - 2861
कुल मत मिले - 1096
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प्रसिद्ध गुरुद्वारा।
- फोटो : amar ujala
प्रधान की प्राथमिकताएं
- गरीब परिवारों के लिए पक्की छत का इंतजाम
- टूटे रास्ते को दुरुस्त कराना और पथ प्रकाश की व्यवस्था करना
- सभी बच्चों को शिक्षा के प्रति जागरूक करना
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हस्तिनापुर के एक गांव में प्रसिद्ध गुरुद्वारा
- फोटो : अमर उजाला
सैफपुर करमचंदपुर का इतिहास
गांव में एक प्राचीन धार्मिक स्थल गुरुद्वारा साहिब स्थित है। इसे सिख समुदाय के सबसे पवित्र केंद्रों में से एक माना जाता है। यह गुरुद्वारा कभी भाई धरम सिंह का पुस्तैनी घर हुआ करता था। उनका जन्म सैफपुर करमचंद, हस्तिनापुर में 1666 में हुआ था। वह बहुत धार्मिक व्यक्ति थे। वह गुरु गोविंद सिंह के आह्वान पर आगे बढ़े और एक सभा में साहस दिखाकर उनके प्यारे बन गए। भाई धरम सिंह की तरह ही एक-एक कर पांच अनुयायी साथ आए और फिर यही पंज प्यारे कहलाए।