पश्चिमी यूपी के हालात: गन्ना हुआ कम, कोल्हू संचालकों की नहीं निकल रही लागत, पढ़िए पूरी रिपोर्ट
Meerut News : पश्चिमी यूपी में इस बार गन्ने की पैदावार में बड़ी गिरावट देखने को मिल रही है। चीनी मिलें भले ही पूरी क्षमता के साथ चालू हो चुकी हैं, लेकिन गन्ना पर्याप्त मात्रा में नहीं पहुंच पा रहा है।
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गन्ने की पैदावार में इस बार पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बड़ी गिरावट देखने को मिल रही है। चीनी मिलें भले ही पूरी क्षमता के साथ चालू हो चुकी हैं, लेकिन गन्ना पर्याप्त मात्रा में नहीं पहुंच पा रहा है। क्रेशर व कोल्हू संचालकों को लागत निकालना मुश्किल हो रहा है। यह तथ्य कृषि वैज्ञानिकों द्वारा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में किए गए सर्वे में सामने आया है।
सर्वे के अनुसार, मेरठ समेत आसपास के जिलों में इस वर्ष गन्ने की पैदावार में पांच से 20 प्रतिशत तक की गिरावट देखने को मिली है। इसकी वजह से काफी संख्या में कोल्हू संचालित नहीं हो पाए हैं। हालत यह है कि जो क्रेशर व कोल्हू चल रहे हैं, वहां आधे या इससे भी कम मात्रा में गन्ना पहुंच रहा है। गन्ने की पैदावार में गिरावट का मुख्य कारण बारिश बताया जा रहा है।
इसके अलावा साल के शुरुआत में फरवरी से लेकर मई के दौरान पायरिल्ला कीट, मई से लेकर सितंबर के दौरान पोखा बोइंग बीमारी और चोटी वेधक कीट के आक्रमण के कारण भी पेड़ी गन्ने की उपज में गिरावट दर्ज की गई है। गन्ना क्रेशर व कोल्हुओं पर ज्यादातर गन्ना खादर क्षेत्र से आता है। खादर क्षेत्र में इस बार बारिश काफी हुई, जिससे काफी फसल नष्ट हो गई।
नहीं निकल पा रही लागत, आधा रह गया गन्ना
मवाना रोड पर इंचौली में चार क्रेशर संचालित हैं। क्रेशर संचालक जमशेद ने बताया कि पिछले वर्ष एक दिन में 600 से 800 क्विंटल गन्ना आता था, लेकिन इस बार 250 से 300 क्विंटल गन्ना ही आ रहा है। पिछले दो दिनों में एक बुग्गी गन्ना ही क्रेशर पर आया। एक बुग्गी में 25 से 30 क्विंटल तक गन्ना आता है। जमशेद ने बताया कि क्रेशर पर आने वाले गन्ने के बदले वह 330 से 340 रुपये प्रति क्विंटल नगद दे रहे हैं। गन्ने की कमी के चलते इस साल खरदौनी गांव में चार कोल्हू संचालित नहीं हो पाए। गन्ना कम आने के कारण लागत भी नहीं निकल पा रही है।
कहां कितनी घटी गन्ने की पैदावार
मेरठ - 10 से 20 प्रतिशत
मुजफ्फरनगर -15 प्रतिशत
शामली- 5 से 10 प्रतिशत
बागपत- 5 से 10 प्रतिशत
सहारनपुर-10 प्रतिशत
पांच प्रजातियों का गन्ना लगाना जरूरी
85 प्रतिशत से अधिक भू-भाग में लगाई जाने वाली गन्ने की को-0238 प्रजाति बीमारियों और कीड़ों के चलते अत्यधिक रोगग्रहित हो गई हैं। बदलती हुई जलवायु परिस्थितियों में गन्ने में पोखा बोईंग जैसी कम महत्व वाली बीमारियां भी गन्ने को काफी नुकसान पहुंचा रही हैं। किसी भी क्षेत्र विशेष में गन्ने के टिकाऊ उत्पादन के लिए कम से कम पांच प्रजातियों का होना जरूरी है। - डॉ. चंद्रभानु, प्रधान वैज्ञानिक, भारतीय कृषि प्रणाली अनुसंधान संस्थान, मोदीपुरम
कोसा 13235 व को-118 प्रजाति को देना होगा बढ़ावा
क्षेत्र के किसानों को पांच से छह प्रजातियों की फसल लगानी चाहिए। इससे उन्हें कम से कम नुकसान हो सकता है। क्षेत्र के किसानों के प्रक्षेत्र पर कोसा 13235 और को-118 प्रजातियों में कीट और बीमारियों का प्रकोप कम पाया जा रहा है। उनकी परफॉर्मेंस को-0238 के मुकाबले काफी बेहतर है। किसानों को इस तरह की अच्छी प्रजातियों का क्षेत्रफल बढ़ाना चाहिए। - डॉ. सुनील कुमार, निदेशक, भारतीय कृषि प्रणाली अनुसंधान संस्थान, मोदीपुरम
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पिछले साल के मुकाबले इस साल वर्तमान माह तक अधिक पेराई हुई है। पिछले साल जहां 2.25 करोड़ क्विंटल गन्ने की पेराई दिसंबर तक हुई थी, वहीं इस बार दिसंबर माह तक 2.30 करोड़ क्विंटल गन्ने की पेराई हो चुकी है। किसानों को मुनाफा भी हो रहा है। - दुष्यंत कुमार, जिला गन्ना अधिकारी
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