Exclusive: एक थप्पड़ बना रहा महिलाओं को अवसाद का शिकार, शोध में चौंकाने वाला खुलासा
- 536 महिलाओं पर एक साल के शोध से सामने आए घरेलू हिंसा के दुष्प्रभाव
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मेरठ जिले में घरेलू हिंसा की शिकार महिलाएं लगातार अवसाद रोगी बनती जा रही हैं। एलएलआरएम कॉलेज के कम्युनिटी मेडिसिन विभाग में एमडी की छात्रा डॉ. वर्तिका अग्रवाल के शोध में इसका खुलासा हुआ है। कोरोना काल में ऐसे मामले ज्यादा बढ़े हैं।
डॉ. अग्रवाल एक साल से महिलाओं में घरेलू हिंसा के परिणाम पर शोध कर रही हैं। उन्होंने 536 महिलाओं पर शोध किया। इसमें ग्रामीण क्षेत्र की 267 ग्रामीण और शहरी क्षेत्र की 269 महिलाएं शामिल की गईं।
शोध में नौकरीपेशा, घरेलू, कामगार, उम्रदराज, नवविवाहिता और गर्भवती माताओं सहित अन्य महिलाओं से सवाल-जवाब किए गए। इनकी स्वास्थ्य जांच भी की गई, जिससे स्पष्ट पता चला कि सिर्फ एक बार की सामान्य घरेलू हिंसा भी महिलाओं को अवसाद में ले जाने के लिए काफी है।
शोध में स्पष्ट हुआ कि 40 साल से अधिक आयु की महिलाओं में घरेलू हिंसा से अधिक तनाव है। जब पति बच्चों के सामने पत्नी से दुर्व्यवहार करते हैं तो उन पर अधिक दुष्प्रभाव पड़ता है। महिलाएं बच्चों को अपने मन की बात बताती हैं तो तकलीफ बढ़ने लगती हैं। इस समय महिलाओं में मेनोपॉज भी शुरू होते हैं जिसके कारण हार्मोन का सीकेशन बढ़ता है, बदलाव होते हैं इसकी वजह से भी महिलाओं को पुरानी बातें याद आने लगती हैं और वे अवसाद में चली जाती हैं।
अकेली महिलाओं में अधिक पीड़ा
पति से अलग रहने वाली महिलाएं, तलाकशुदा, परित्यक्ता व विधवा महिलाओं में घरेलू हिंसा का असर अधिक होता है। घरेलू हिंसा के कारण जो महिलाएं अलग भी हो जाती हैं तब भी उनके मन से उस प्रताड़ना की पीड़ा नहीं जाती। शोध में 20 प्रतिशत महिलाओं में यह सामने आया। एकल परिवारों, बिखरे परिवारों में भी महिलाएं अधिक तनावग्रस्त मिलीं।
दहेज आज भी हिंसा का कारण
ग्रामीण महिलाओं में घरेलू हिंसा का बड़ा कारण दहेज है। 176 (35.5 प्रतिशत) ग्रामीण महिलाओ ंने पति की मारपीट का कारण दहेज न मिलना बताया। यह इससे जाहिर है कि मेरठ जिले में 2019 में दहेज हत्या के 32 और प्रताड़ना के 599 मामले आए। 2020 में अगस्त तक दहेज हत्या के 26 और दहेज उत्पीड़न के 186 मामले दर्ज किए गए।
35 फीसदी नौकरीपेशा महिलाएं शिकार
वर्तिका की शोध निर्देशक प्रो. डॉ सीमा जैन बताती हैं कि शोध में यह भी पाया गया कि घरेलू महिलाओं की अपेक्षा नौकरीपेशा महिलाएं घरेलू हिंसा से ज्यादा अवसाद में हैं। 35 फीसदी नौकरीपेशा महिलाओं ने खुद माना कि उनके तनाव का प्रमुख कारण घरेलू हिंसा है। 15 फीसद महिलाओं में शारीरिक बदलाव व अन्य कारणो ंसे तनाव मिला। मगर अधिकांश महिलाएं पति की प्रताड़ना से दुखी मिलीं।
60 दिन में न्याय का प्रावधान
एडवोकेट अंकुर शर्मा के अनुसार 26 अक्तूबर, 2006 से लागू घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम के तहत पीड़ित महिला धारा 12 के तहत अपने थाना क्षेत्र के न्यायिक मजिस्ट्रेट या विशेष अदालत के समक्ष आवेदन कर सकती है। ऐसे प्रार्थनापत्र पर 60 दिन में मुकदमे का निस्तारण किए जाने का भी प्रावधान है।
जागरूकता के कारण पीड़ा अधिक
ग्रामीण महिलाएं आज भी पति के मारने-पीटने, अत्याचार को नियति मानती हैं। दूसरी ओर शहरी महिलाएं शिक्षित, सशक्त और जागरूक होने के कारण इसका विरोध करती हैं। वे अपने अधिकार जानती हैं इसलिए उनकी पीड़ा भी अधिक होती है। - प्रो. डॉ. अंजुला राजवंशी, शिक्षक समाजशास्त्र, आरजी पीजी कॉलेज