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वायु प्रदूषण के कारण बढ़ रहे सांस के रोगी
अमर उजाला ब्यूरो/ मेरठ
Updated Wed, 15 Nov 2017 10:53 AM IST
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फाइल फोटो
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
वायु प्रदूषण के कारण सांस के रोगी बढ़ रहे हैं। हालत यह है कि धूम्रपान नहीं करने वाले भी इसकी चपेट में आ रहे हैं। इस बीमारी के प्रति जागरूक करने के उद्देश्य से 15 नवंबर को वर्ल्ड क्रॉनिक ऑब्स्ट्रक्टिव पल्मोनरी डिसीज (सीओपीडी) डे मनाया जा रहा है। यह हर साल नवंबर के तीसरे बुधवार को मनाया जाता है। इसे आम भाषा में सांस और फेफड़ों की बीमारी कहते हैं। इसमें सांस की नलियां सिकुड़ जाती हैं और उनमें सूजन आ जाती है।
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सीओपीडी दुनियाभर में 5वां सबसे घातक रोग बन चुका है। पहले यह धूम्रपान करने वालों का रोग माना जाता रहा है, लेकिन अब ऐसा नहीं है। छाती और सांस रोग विशेषज्ञ डॉ. वीरोत्तम तोमर ने बताया कि शहरी भारत में 32 प्रतिशत घरों में अब भी बायोमास स्टोव का उपयोग होता है, 22 प्रतिशत लकड़ी का और 8 प्रतिशत केरोसिन का, बाकी लिक्विड पेट्रोलियम गैस या नेचुरल गैस का। विकासशील देशों में सीओपीडी से होने वाली करीब 50 प्रतिशत मौत बायोमास के धुएं के कारण होती हैं, जिसमें से 75 प्रतिशत महिलाएं होती हैं। बायोमास ईंधन जैसे लकड़ी, पशुओं का गोबर और फसल के अवशेष धूम्रपान करने जितना ही सक्रिय जोखिम पैदा करती हैं। विशेषकर ग्रामीण इलाकों में महिलाएं और लड़कियां रसोइघर में अधिक समय बिताती हैं। उन्होंने बताया कि ग्रामीण इलाकों में श्वसन संबंधी रोगों से ग्रस्त 300 से अधिक मरीजों के विश्लेषण से पता चला कि 75 प्रतिशत दमा ग्रस्त मरीजों में सीओपीडी जैसे लक्षण उभरे थे।
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सीओपीडी के प्रमुख लक्षण
लंबे समय तक बलगम वाली खांसी।
सांस की कमी महसूस होना।
सीने में घरघराहट और जकड़न।
ये करना होगा
धूम्रपान न करें। घरों में चूल्हे, अंगीठी और स्टोव का प्रयोग न कर गैस चूल्हे का प्रयोग करना चाहिए। वायु प्रदूषण रोकने के प्रयास करने होंगे। कूड़े को जलाने की आदत को बदलें, पुराने डीजल और खटारा वाहनों पर सख्ती से रोक लगनी चाहिए।
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आज लगेगा निशुल्क शिविर
मेरठ। डॉ. वीरोत्तम तोमर ने प्रेस कांफ्रेंस में बताया कि बृहस्पतिवार को सुबह नौ से दोपहर 12 बजे तक डॉ. शिवराज मेमोरियल चेस्ट एंड एलर्जी सेंटर पर एक निशुल्क परामर्श शिविर का आयोजन किया जाएगा।