{"_id":"52-78860","slug":"Meerut-78860-52","type":"story","status":"publish","title_hn":"सूर्य की उपासना का महापर्व छठ पूजा ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
सूर्य की उपासना का महापर्व छठ पूजा
Meerut
Updated Tue, 28 Oct 2014 05:32 AM IST
विज्ञापन
मेरठ। चार दिवसीय सूर्य षष्ठी पर्व सोमवार से प्रारंभ हो गया। नहाय खाय के साथ प्रथम दिवसीय पूजा प्रारंभ हुई। व्रती नहाने के बाद अरवा चावल के भात, चने की दाल, कद्दू की सब्जी का भोजन किया। शहर में जागृति विहार, सूरजकुंड, रोहटा रोड और मोदीपुरम सहित गंगानगर आदि स्थानों पर धार्मिक अनुष्ठान हुए।
इस पर्व में मंगलवार को पंचमी के दिन खरना होता है। इसमें व्रती दिन भर उपवास कर शाम को चंद्रमा डूबने से पूर्व स्नान करेगी। लकड़ी के चूल्हे पर गुड़ की खीर और रोटी बनाकर पूजा कर प्रसाद ग्रहण किया जाता है। षष्ठी व्रती सारे दिन अन्न जल का त्याग कर करने के बाद प्रसाद आदि बनाती है। इसमें विशेष ठेकुआ होता है और शाम को जल स्त्रोत में ध्यान मग्न खड़े होकर सूर्य को अर्ध्य दिया जाता है। प्रसाद रूपी ठेकुआ, फल, गन्ना, डंठल युक्त हल्दी, मूली मिठाई आदि अर्पित की जाती है। मान्यता अनुसार मिट्टी का हाथी और कुर्वा लेकर सूर्य की तरफ हाथ उठाया जाता है। रात में घाट पर दीप जलाया जाता है। अगले दिन सप्तमी पर उदयाचल सूर्य को अर्ध्य देकर व्रत समाप्त किया जाता है।
सूर्य और षष्ठी की होती है पूजा
कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी तिथि पूरे वर्ष का ऐसा परम पवित्र दिन है, जिसमें डूबते सूर्य की पूजा की जाती है। वेदों के अनुसार सूर्य ब्रह्म स्वरूप है तथा सूर्य की उत्पत्ति परमात्मा की आंखों से मानी गयी है। छठे अंश से उत्पन्न, मूल प्रकृति ग्रहराज सूर्य की बहन है और उन्हें षष्ठी देवी कहा जाता है। दोनों भाई बहनों की पूजा से तेजस्वी एवं मेधावी संतान की प्राप्ति होती है।
विज्ञापन
डूबते सूर्य को दिया जाता है अर्ध्य
- सूर्य षष्ठी पर जिस समय सूर्य अस्त हो रहे होते है उस समय बुद्ध ग्रह उदित होते है। ज्योतिष वैज्ञानिक भारत ज्ञान भूषण के अनुसार इस प्रकार पश्चिम दिशा में सूर्य और बुध का मिलन होता है और बुधादित्य योग बनता है। ऐसे में पूजा करने से यशमान, कीर्ति के साथ बुद्धि, विवेक, निर्णय और कार्य व्यवसाय की स्थिति को सबलता मिलती है।
इस पर्व से मिलता है संतान सुख
- ग्रह राज सूर्य की उपासना स्वास्थ्य, संतान और मनोकामना पूर्ति के लिए की जाती है। मान्यता है कि भगवान कृष्ण के एक लाख साठ हजार पुत्रों में से शांब नामक पुत्र को पूर्व जन्म के दोषों के कारण कुष्ठ रोग हुआ। निवारण के लिए बारह माह के प्रतीत बारह सूर्य सरोवर का निर्माण कराया गया और रोग मुक्ती हुई। वहीं भागवत में वर्णन है कि कार्तिकेय की पत्नी और ब्रह्मा जी की पुत्री देवसेना ने राजा प्रियव्रत के मृत पुत्र को सूर्य षष्ठी वाले दिन ही जीवित किया था। वहीं मां गंगा ने स्कंधाकार बालक को ऐसे सरकंडे के वन में जन्म दिया जहां पर छह कार्तिकाओं ने उस शिशु का लालन-पालन किया। इसलिए कार्तिकेय की षष्ठ माताएं कहलाई। इसलिए इस व्रत को स्कंध षष्ठी भी कहा जाता है।
विज्ञापन
इस पर्व में मंगलवार को पंचमी के दिन खरना होता है। इसमें व्रती दिन भर उपवास कर शाम को चंद्रमा डूबने से पूर्व स्नान करेगी। लकड़ी के चूल्हे पर गुड़ की खीर और रोटी बनाकर पूजा कर प्रसाद ग्रहण किया जाता है। षष्ठी व्रती सारे दिन अन्न जल का त्याग कर करने के बाद प्रसाद आदि बनाती है। इसमें विशेष ठेकुआ होता है और शाम को जल स्त्रोत में ध्यान मग्न खड़े होकर सूर्य को अर्ध्य दिया जाता है। प्रसाद रूपी ठेकुआ, फल, गन्ना, डंठल युक्त हल्दी, मूली मिठाई आदि अर्पित की जाती है। मान्यता अनुसार मिट्टी का हाथी और कुर्वा लेकर सूर्य की तरफ हाथ उठाया जाता है। रात में घाट पर दीप जलाया जाता है। अगले दिन सप्तमी पर उदयाचल सूर्य को अर्ध्य देकर व्रत समाप्त किया जाता है।
विज्ञापन
सूर्य और षष्ठी की होती है पूजा
कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी तिथि पूरे वर्ष का ऐसा परम पवित्र दिन है, जिसमें डूबते सूर्य की पूजा की जाती है। वेदों के अनुसार सूर्य ब्रह्म स्वरूप है तथा सूर्य की उत्पत्ति परमात्मा की आंखों से मानी गयी है। छठे अंश से उत्पन्न, मूल प्रकृति ग्रहराज सूर्य की बहन है और उन्हें षष्ठी देवी कहा जाता है। दोनों भाई बहनों की पूजा से तेजस्वी एवं मेधावी संतान की प्राप्ति होती है।
विज्ञापन
डूबते सूर्य को दिया जाता है अर्ध्य
- सूर्य षष्ठी पर जिस समय सूर्य अस्त हो रहे होते है उस समय बुद्ध ग्रह उदित होते है। ज्योतिष वैज्ञानिक भारत ज्ञान भूषण के अनुसार इस प्रकार पश्चिम दिशा में सूर्य और बुध का मिलन होता है और बुधादित्य योग बनता है। ऐसे में पूजा करने से यशमान, कीर्ति के साथ बुद्धि, विवेक, निर्णय और कार्य व्यवसाय की स्थिति को सबलता मिलती है।
इस पर्व से मिलता है संतान सुख
- ग्रह राज सूर्य की उपासना स्वास्थ्य, संतान और मनोकामना पूर्ति के लिए की जाती है। मान्यता है कि भगवान कृष्ण के एक लाख साठ हजार पुत्रों में से शांब नामक पुत्र को पूर्व जन्म के दोषों के कारण कुष्ठ रोग हुआ। निवारण के लिए बारह माह के प्रतीत बारह सूर्य सरोवर का निर्माण कराया गया और रोग मुक्ती हुई। वहीं भागवत में वर्णन है कि कार्तिकेय की पत्नी और ब्रह्मा जी की पुत्री देवसेना ने राजा प्रियव्रत के मृत पुत्र को सूर्य षष्ठी वाले दिन ही जीवित किया था। वहीं मां गंगा ने स्कंधाकार बालक को ऐसे सरकंडे के वन में जन्म दिया जहां पर छह कार्तिकाओं ने उस शिशु का लालन-पालन किया। इसलिए कार्तिकेय की षष्ठ माताएं कहलाई। इसलिए इस व्रत को स्कंध षष्ठी भी कहा जाता है।