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देवबंदी उलमा को मंजूर नहीं बरेलवी फतवा
Updated Wed, 24 Jan 2018 12:33 AM IST
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देवबंदी उलमा को मंजूर नहीं बरेलवी फतवा
देवबंद (सहारनपुर)। बरेली के आला हजरत दरगाह द्वारा टीवी डिबेट में मौलानाओं की भागीदारी न करने को लेकर जारी किए गए फतवे को देवबंदी उलमा ने सिरे से खारिज कर दिया है। उलमा का कहना है कि लोगों तक अपनी जायज बात पहुंचाने के लिए डिबेट में बैठने में कोई हर्ज नहीं है।
मंगलवार को आला हजरत दरगाह की और से जारी फतवे में मौलानाओं के टीवी चैनलों की डिबेट में शामिल होने को नाजायज और शरीयत के खिलाफ बताया है। बरेली से जारी इस फतवे पर फतवा ऑनलाइन के चेयरमैन मौलाना मुफ्ती अरशद फारूकी का कहना है कि अपनी जायज बात लोगों तक पहुंचने के लिए कोई भी जरिया अपनाया जा सकता है। आजकल मीडिया पर तमाम तरह के मुद्दों पर डिबेट होती है। अगर चैनल निष्पक्ष हों और एंकर सही हो और मुद्दा अच्छा हो और अच्छी बात को पहुंचाना मकसद हो तो ऐसी डिबेट में शामिल होने में कोई हर्ज नहीं है। मदरसा अदीबुल उलूम के मोहतमिम मौलाना कारी रिहान का कहना है कि अगर मजहब इस्लाम या शरीयत को कहीं गलत ढंग से पेश किया जा रहा हो तो ऐसे में लोगों तक सही बात पहुंचाने की गरज से मीडिया का सहारा लेने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन फिजूल के मामलों में डिबेट पर बैठना सही नहीं है। उन्होंने कहा कि मजहब और शरीयत की हिफाजत करना हर मुसलमान पर फर्ज है। कुछ टीवी चैनलों पर इस तरह के कार्यक्त्रस्म प्रस्तुत किए जा रहे हैं । जिनमें मजहब-ए-इस्लाम और उसकी शिक्षाओं को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है । ऐसे में उलमा-ए-दीन की जिम्मेदारी बन जाती है कि वो डिबेट में शामिल होकर दुनिया को सच्चाई से रूबरू कराएं।
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देवबंद (सहारनपुर)। बरेली के आला हजरत दरगाह द्वारा टीवी डिबेट में मौलानाओं की भागीदारी न करने को लेकर जारी किए गए फतवे को देवबंदी उलमा ने सिरे से खारिज कर दिया है। उलमा का कहना है कि लोगों तक अपनी जायज बात पहुंचाने के लिए डिबेट में बैठने में कोई हर्ज नहीं है।
मंगलवार को आला हजरत दरगाह की और से जारी फतवे में मौलानाओं के टीवी चैनलों की डिबेट में शामिल होने को नाजायज और शरीयत के खिलाफ बताया है। बरेली से जारी इस फतवे पर फतवा ऑनलाइन के चेयरमैन मौलाना मुफ्ती अरशद फारूकी का कहना है कि अपनी जायज बात लोगों तक पहुंचने के लिए कोई भी जरिया अपनाया जा सकता है। आजकल मीडिया पर तमाम तरह के मुद्दों पर डिबेट होती है। अगर चैनल निष्पक्ष हों और एंकर सही हो और मुद्दा अच्छा हो और अच्छी बात को पहुंचाना मकसद हो तो ऐसी डिबेट में शामिल होने में कोई हर्ज नहीं है। मदरसा अदीबुल उलूम के मोहतमिम मौलाना कारी रिहान का कहना है कि अगर मजहब इस्लाम या शरीयत को कहीं गलत ढंग से पेश किया जा रहा हो तो ऐसे में लोगों तक सही बात पहुंचाने की गरज से मीडिया का सहारा लेने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन फिजूल के मामलों में डिबेट पर बैठना सही नहीं है। उन्होंने कहा कि मजहब और शरीयत की हिफाजत करना हर मुसलमान पर फर्ज है। कुछ टीवी चैनलों पर इस तरह के कार्यक्त्रस्म प्रस्तुत किए जा रहे हैं । जिनमें मजहब-ए-इस्लाम और उसकी शिक्षाओं को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है । ऐसे में उलमा-ए-दीन की जिम्मेदारी बन जाती है कि वो डिबेट में शामिल होकर दुनिया को सच्चाई से रूबरू कराएं।
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