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अंधेरे घरों में रोशन हैं परंपराएं
Updated Mon, 09 Jul 2018 09:44 PM IST
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राजकुमार चौहान
बहसूमा। महाराणा प्रताप के साथी और मुगलों के बागी आज के बागड़िय़े हैं। इनके दादा-परदादा ने इतिहास रचा और उनकी पीढ़ियां अपनी विरासत के साथ तन्हा रह गईं। इनके अंधेरे घरों में बस परंपराए रोशन हैं। वे रात को दीपक नहीं जलाते, एक वक्त भोजन करते हैं और किसी की निगाहों में आए बिना यूं ही जिंदगी चलती रहती है।
खानाबदोशी के इस जीवन में सड़कों पर ही सुबह होती है और ऐसे ही शाम। न उन्हें समाज ने अपनाया और न समाज को उन्होंने। फिर भी बागड़िय़े खुश हैं कि छ: सदी से उन्होंने पूर्वजों को आन, बान और शान से समझौता नहीं किया। इतिहास पर नाज करने वाले ये वंशज बाहरी समाज को अपनी जिंदगी में झांकने की इजाजत नहीं देते हैं।
बहसूमा में एक बुजुर्ग बागड़िया धर्मपाल बमुश्किल बात करने को तैयार हुए। अतीत को याद करते हुए उनकी आखें नम हो जाती है। ओजस्वी आवाज में वे बताते हैं कि मेवाड़ के महाराणा प्रताप ने मातृभूमि की रक्षा के लिए राजपाठ त्याग दिया और परिवार समेत जंगलों में चले गए। उस समय भील और पठारों ने उनका साथ दिया। वे दोनों जातियां उनकी रक्षा में तैनात रहीं। इन्हें मुगलों ने बागी करार दिया। वे बाद में बागड़िए कहलाए। उन्होंने बताया कि उनके पूर्वज महाराणा के लिए औजार बनाते थे। उस दौर में मुगल फौज उनकी तलाश में रहती थी। ऐसे में पूरे दिन में एक वक्त ही भोजन करते थे। रात को आग जलाने की मनाही थी। यही परंपरा आज भी कायम है। बुजुर्ग धर्मपाल ने बताया कि महाराणा प्रताप की मृत्यु के बाद उनके पूर्वज खेती के औजार बनाने लगे। आज भी ये ही उनके रोजगार का जरिया हैं। बागड़ियों को समाज की मुख्यधारा में वापस लाने के लिए संघर्ष कर रहे सद्भावना संस्था के श्रीनिवास अग्रवाल का कहना है कि इन्होंने मृातभूमि की रक्षा के लिए सब कुछ न्योछावर कर दिया। अब वक्त आ गया है कि हम इनके लिए कुछ करें।
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मुख्य बातें
पूर्वज महाराणा प्रताप के लिए औजार बनाते थे, मुगल शासक ने दिया था बागी करार
मातृभूमि की रक्षा के लिए सब कुछ त्यागने वाले बागड़ियों को मुख्यधारा से जोड़ने की जरूरत
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बहसूमा। महाराणा प्रताप के साथी और मुगलों के बागी आज के बागड़िय़े हैं। इनके दादा-परदादा ने इतिहास रचा और उनकी पीढ़ियां अपनी विरासत के साथ तन्हा रह गईं। इनके अंधेरे घरों में बस परंपराए रोशन हैं। वे रात को दीपक नहीं जलाते, एक वक्त भोजन करते हैं और किसी की निगाहों में आए बिना यूं ही जिंदगी चलती रहती है।
खानाबदोशी के इस जीवन में सड़कों पर ही सुबह होती है और ऐसे ही शाम। न उन्हें समाज ने अपनाया और न समाज को उन्होंने। फिर भी बागड़िय़े खुश हैं कि छ: सदी से उन्होंने पूर्वजों को आन, बान और शान से समझौता नहीं किया। इतिहास पर नाज करने वाले ये वंशज बाहरी समाज को अपनी जिंदगी में झांकने की इजाजत नहीं देते हैं।
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बहसूमा में एक बुजुर्ग बागड़िया धर्मपाल बमुश्किल बात करने को तैयार हुए। अतीत को याद करते हुए उनकी आखें नम हो जाती है। ओजस्वी आवाज में वे बताते हैं कि मेवाड़ के महाराणा प्रताप ने मातृभूमि की रक्षा के लिए राजपाठ त्याग दिया और परिवार समेत जंगलों में चले गए। उस समय भील और पठारों ने उनका साथ दिया। वे दोनों जातियां उनकी रक्षा में तैनात रहीं। इन्हें मुगलों ने बागी करार दिया। वे बाद में बागड़िए कहलाए। उन्होंने बताया कि उनके पूर्वज महाराणा के लिए औजार बनाते थे। उस दौर में मुगल फौज उनकी तलाश में रहती थी। ऐसे में पूरे दिन में एक वक्त ही भोजन करते थे। रात को आग जलाने की मनाही थी। यही परंपरा आज भी कायम है। बुजुर्ग धर्मपाल ने बताया कि महाराणा प्रताप की मृत्यु के बाद उनके पूर्वज खेती के औजार बनाने लगे। आज भी ये ही उनके रोजगार का जरिया हैं। बागड़ियों को समाज की मुख्यधारा में वापस लाने के लिए संघर्ष कर रहे सद्भावना संस्था के श्रीनिवास अग्रवाल का कहना है कि इन्होंने मृातभूमि की रक्षा के लिए सब कुछ न्योछावर कर दिया। अब वक्त आ गया है कि हम इनके लिए कुछ करें।
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मुख्य बातें
पूर्वज महाराणा प्रताप के लिए औजार बनाते थे, मुगल शासक ने दिया था बागी करार
मातृभूमि की रक्षा के लिए सब कुछ त्यागने वाले बागड़ियों को मुख्यधारा से जोड़ने की जरूरत