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महामंडल विधान
Updated Sun, 03 Sep 2017 09:27 PM IST
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महामंडल विधान की मांगलिक क्रियाए भगवान जिनेंद्र के अभिषेक एवं शांतिधारा से हुईं
हस्तिनापुर।
श्री दिगम्बर जैन प्राचीन बड़ा मंदिर में तीन लोक महामंडल विधान की विधिवत मांगलिक क्रियाएं नित्य की भांति प्रात: मुख्य वेदी पर भगवान जिनेंद्र के अभिषेक एवं शांतिधारा से प्रारंभ हुई।
इसके बाद समवशरण जिनालय में मंगलाष्टक के साथ विधानाचार्य पं. आशीष जैन शास्त्री ने विधान की क्रियाएं प्रारंभ कराईं। भगवान मल्लिनाथ को वेदिका से सौधर्म इंद्र मुकेश जैन भोगल को यज्ञनायक रमेश चंद ने अन्य इन्द्रों के साथ संगीत की स्वरलहरियों पर जयघोष करते हुए समवशरण जिनालय की तीन प्रदक्षिणा करके पांडुक शिला पर विराजमान किया। महेश चंद, ममता, अभिषेक, मनीष, प्रशांत, विपिन जैन को शांतिधारा करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। मुनिश्री 108 भावभूषण जी महाराज ने पर्यूषण महापर्व के आठवें दिन उत्तम त्याग पर प्रचवन करते हुए कहा कि त्याग की शिक्षा हमें प्रकृति से लेनी चाहिए। वृक्ष कार्बन-डाई ऑक्साइड ग्रहण कर हमें ऑक्सीजन प्रदान करते हैं। गाय घास आदि खाकर दूध प्रदान करती है। वृक्ष अपने पत्तों को एक समय स्वयं छोड़ देता है। हम भी आहार करते हैं तो निहार होता है तभी मनुष्य स्वस्थ रहता है। यदि हम ग्रहण करते रहे और उसे छोड़े नहीं तो अस्वस्थ हो जाएंगे। इसी प्रकार से धन के अर्जन करने में और वस्तुओं के संग्रह के मूल में राग हैं। हालांकि त्याग हमें परिग्रह से मुक्ति दिलाता है। जीवन में त्याग की महिमा सृष्टि के आरम्भ से रही है। जैन धर्म और जैन समाज दान शीलता का आदर्श उदाहरण है। सच्चा धनपति जोड़ने में नहीं छोड़ने में स्वयं को भाग्यशाली समझता है। धन की सार्थकता छोड़ने में है जोड़ने में नहीं। समुद्र पानी को एकत्रित करता है इसलिए उसका जल खारा होता है और नदी निरंतर प्रवाहित होती है इसलिए उसका जल मीठा होता है। इसलिए प्राणी उसका सदुपयोग करते हैं। संचयवृत्ति, परिग्रह पाप है। जोड़कर रख लो चाहे लाख हीरे, मोती मगर याद रखना कफन में जेब नहीं होती है। इसलिए हे भव्य आत्माओं त्याग की प्रवृत्ति में आगे बढंो और अपने धन का धर्म के लिए, राष्ट्र के लिए, समाजहित के लिए सदुपयोग करो। अन्यथा कहा भी है कि धन की तीन गति होती हैं। ये दान, भोग और नाश हैं। उत्तम त्याग समस्त संसार में श्रेष्ठ है ये औषधि दान, शास्त्र दान, अभयदान एवं आहार दान के रूप में व्यवहार में लाया जाता है।
दस दिवसीय इस महोत्सव में रात्रि में सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। आज भक्ति नृत्य आयोजित किए गए। जिसके पुरस्कार विनोद जैन मंजू जैन, एवं सुमत प्रसाद गुरुकुल द्वारा प्रदत्त किये गये। कार्यक्रम में उपाध्यक्ष हेमचन्द जैन, महामंत्री मुकेश जैन आदि उपस्थित रहे। कार्यक्रम सफल बनाने में मुकेश जैन महाप्रबंधक, अशोक जैन, उमेश, कमल, अतुल, मणिचन्द जैन आदि का सहयोग प्राप्त हुआ।
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जादू से बच्चों का मन मोहा
हस्तिनापुर। श्री दिगम्बर जैन उत्तर प्रांतीय गुरुकुल में तरुण मित्र परिषद श्रद्धा सदन के तत्वावधान में जादू शो का प्रदर्शन किया गया। परिषद के महासचिव अशोक जैन ने बताया कि जादू शो में प्रसिद्ध जादूगर राजकुमार के शिष्य शाहरूख जादूगर ने विभिन्न प्रकार का जादू प्रदर्शित कर बच्चों का मनोरंजन किया। श्रद्धा सदन समिति संयोजक सुभाष जैन ने बताया कि यह कार्यक्रम विशेष रूप से गुरुकुल के छात्रों के मनोरंजन के लिए आयोजित किया। कार्यक्रम में लोगों ने भरपूर आनंद लिया।
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हस्तिनापुर।
श्री दिगम्बर जैन प्राचीन बड़ा मंदिर में तीन लोक महामंडल विधान की विधिवत मांगलिक क्रियाएं नित्य की भांति प्रात: मुख्य वेदी पर भगवान जिनेंद्र के अभिषेक एवं शांतिधारा से प्रारंभ हुई।
इसके बाद समवशरण जिनालय में मंगलाष्टक के साथ विधानाचार्य पं. आशीष जैन शास्त्री ने विधान की क्रियाएं प्रारंभ कराईं। भगवान मल्लिनाथ को वेदिका से सौधर्म इंद्र मुकेश जैन भोगल को यज्ञनायक रमेश चंद ने अन्य इन्द्रों के साथ संगीत की स्वरलहरियों पर जयघोष करते हुए समवशरण जिनालय की तीन प्रदक्षिणा करके पांडुक शिला पर विराजमान किया। महेश चंद, ममता, अभिषेक, मनीष, प्रशांत, विपिन जैन को शांतिधारा करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। मुनिश्री 108 भावभूषण जी महाराज ने पर्यूषण महापर्व के आठवें दिन उत्तम त्याग पर प्रचवन करते हुए कहा कि त्याग की शिक्षा हमें प्रकृति से लेनी चाहिए। वृक्ष कार्बन-डाई ऑक्साइड ग्रहण कर हमें ऑक्सीजन प्रदान करते हैं। गाय घास आदि खाकर दूध प्रदान करती है। वृक्ष अपने पत्तों को एक समय स्वयं छोड़ देता है। हम भी आहार करते हैं तो निहार होता है तभी मनुष्य स्वस्थ रहता है। यदि हम ग्रहण करते रहे और उसे छोड़े नहीं तो अस्वस्थ हो जाएंगे। इसी प्रकार से धन के अर्जन करने में और वस्तुओं के संग्रह के मूल में राग हैं। हालांकि त्याग हमें परिग्रह से मुक्ति दिलाता है। जीवन में त्याग की महिमा सृष्टि के आरम्भ से रही है। जैन धर्म और जैन समाज दान शीलता का आदर्श उदाहरण है। सच्चा धनपति जोड़ने में नहीं छोड़ने में स्वयं को भाग्यशाली समझता है। धन की सार्थकता छोड़ने में है जोड़ने में नहीं। समुद्र पानी को एकत्रित करता है इसलिए उसका जल खारा होता है और नदी निरंतर प्रवाहित होती है इसलिए उसका जल मीठा होता है। इसलिए प्राणी उसका सदुपयोग करते हैं। संचयवृत्ति, परिग्रह पाप है। जोड़कर रख लो चाहे लाख हीरे, मोती मगर याद रखना कफन में जेब नहीं होती है। इसलिए हे भव्य आत्माओं त्याग की प्रवृत्ति में आगे बढंो और अपने धन का धर्म के लिए, राष्ट्र के लिए, समाजहित के लिए सदुपयोग करो। अन्यथा कहा भी है कि धन की तीन गति होती हैं। ये दान, भोग और नाश हैं। उत्तम त्याग समस्त संसार में श्रेष्ठ है ये औषधि दान, शास्त्र दान, अभयदान एवं आहार दान के रूप में व्यवहार में लाया जाता है।
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दस दिवसीय इस महोत्सव में रात्रि में सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। आज भक्ति नृत्य आयोजित किए गए। जिसके पुरस्कार विनोद जैन मंजू जैन, एवं सुमत प्रसाद गुरुकुल द्वारा प्रदत्त किये गये। कार्यक्रम में उपाध्यक्ष हेमचन्द जैन, महामंत्री मुकेश जैन आदि उपस्थित रहे। कार्यक्रम सफल बनाने में मुकेश जैन महाप्रबंधक, अशोक जैन, उमेश, कमल, अतुल, मणिचन्द जैन आदि का सहयोग प्राप्त हुआ।
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जादू से बच्चों का मन मोहा
हस्तिनापुर। श्री दिगम्बर जैन उत्तर प्रांतीय गुरुकुल में तरुण मित्र परिषद श्रद्धा सदन के तत्वावधान में जादू शो का प्रदर्शन किया गया। परिषद के महासचिव अशोक जैन ने बताया कि जादू शो में प्रसिद्ध जादूगर राजकुमार के शिष्य शाहरूख जादूगर ने विभिन्न प्रकार का जादू प्रदर्शित कर बच्चों का मनोरंजन किया। श्रद्धा सदन समिति संयोजक सुभाष जैन ने बताया कि यह कार्यक्रम विशेष रूप से गुरुकुल के छात्रों के मनोरंजन के लिए आयोजित किया। कार्यक्रम में लोगों ने भरपूर आनंद लिया।