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नमाज की छूट किसी भी हालत में नहीं

Wed, 15 May 2019 02:07 AM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Wed, 15 May 2019 02:07 AM IST
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नमाज की छूट किसी भी हालत में नहीं
नमाज की छूट किसी भी हालत में नहीं
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परीक्षितगढ़। जो इंसानियत की वजह से और सबाब के लिए रमजान की रातों का कयाम करेगा। उसके अगले पिछले गुनाह बख्श दिए जाएंगे।
रसूल्लाह फरमाते हैं कि इस माह आदमी के हर नेक काम का बदला दस से सात सौ गुना तक दिया जाता है। हाजी अली हसन सैफी ने बताया कि अल्लाह तआला ने फरमाया कि रोजा मेरे लिए है। रोजेदार के लिए दो खुशियां हैं एक इफ्तार के वक्त और दूसरी अल्लाह से मिलने के वक्त। जब किसी के रोजे का दिन हो तो बेहूदा बात न करें और न चीखें। यदि उससे कोई गालीगलौज करे या लड़ने पर आमादा हो तो कह दें मैं रोजेदार हूूं। इस्लाम की बुनियाद पांच अरकानों पर टिकी है। ये कलमा पढ़ऩा, नमाज अदा करना, रोजा रखना, जकात अदा करना और हज करना हैं। इन पांचों को मानते हुए जो इंसान इस्लाम में दाखिल होता है। वह इस्लाम की तालीम पर अमल करने वाला इंसान हमेशा कामयाब होता है। इनमें हर अरकान की अपनी फजीलत है। पांचों को करना हर मुसलमान के लिए फर्ज है।
तौहिद कलमा पढ़ऩा- अल्लाह को एक मानना उसकी जात में किसी दूसरे को शरीक न करना। साथ ही अल्लाह के नवी को आखिर पैगम्बर मानना। आखिरी किताब कुराने पाक है। इसमें पूरा दीन मुकम्मल कर दिया है। तौहिद कुबूल करने के बाद ही इंसान इस्लाम में दाखिल होता है।
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नमाज : हर मुसलमान मर्द और औरत पर पांच वक्त की नमाज का फर्ज है। नमाज की छूट किसी भी हालत में नहीं है। जब तक आदमी होश में है, तब उस पर नमाज माफ नहीं है। अगर आदमी सफर में हैं तो भी उस पर नमाज की छूट नहीं है। हां आधी नमाज पढ़ सकता है। औरत के लिए कुछ दिनों में नमाज की छूट है।
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रोजा- रमजान माह में एक माह के रोजे फर्ज है। अल्लाह ताआला हमें फरमाता है कि कौन कितना परहेजगार है। रोजे के बारे में अल्लाह ने फरमाया है कि इसका अजर में खुद ही दूंगा।
जकात: जकात हर उस मुस्लिम पर फर्ज है जिसके पास साढ़े सात तोला सोना या साढ़े बावन तोले चांदी या फिर इसके बराबर रकम हो उसे भी पूरा एक साल हो चुका हो तो हर आदमी पर जकात फर्ज हो जाती है।

हज: मुसलमान पर जिंदगी में सिर्फ एक बार हज करना फर्ज है। हज भी उसी सकल में फर्ज है जब हज जाने वाले के पास इतना पैसा हो कि वह हज के दौरान रहन सहन आने जाने का खर्च उठा सके। इसके अतिरिक्त जितने दिन के लिए हज की जियारत पर है। उतने दिन उसके परिवार को खाने-पीने आदि की दिक्कत न हो परिवार के पास इतना पैसा हो कि वह अपने घर का खर्चा आसानी से चला सके। कुल मिलाकर कहा जाए तो इस्लाम के ये पांच अरकान फर्ज है। अगर कोई भी इन अरकान को मानने से इनकार करता है तो वह इस्लाम से खारिज माना जाता है। हर मुस्लिम को रमजान मुबारक का अहतराम और इबादत करनी चाहिए।
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