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शौचालय मिले न परिवार, 13.60 लाख कर दिए ‘पार’
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13.60 lacks rupees corruption in toilet constrution
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मेरठ। आठ माह पहले शौचालयों को बनवाने में हुआ झोल फिर से सामने आने लगा है। निगम अधिकारी काफी दिनों से 340 शौचालयों के गड्ढों को तलाश रहे हैं, लेकिन मौके पर न तो गड्ढे मिल रहे हैं और न ही परिवार। लखनऊ से आई जांच टीम भी मौके का निरीक्षण कर रही है, ऐसे में निगम अधिकारियों की सांसें अटकी हैं। निगम प्रशासन पर सरकारी खजाने की बंदरबांट के आरोप लग रहे हैं। 13 लाख 60 हजार रुपये से भी अधिक का गोलमाल हो चुका है।
स्वच्छ भारत मिशन के तहत नगर निगम ने 12040 लोगों के घर शौचालय बनवाने के लिए चुना। एक शौचालय के लिए सरकारी खजाने से आठ हजार रुपये दिए जाने थे। नियमानुसार दो बार में चार-चार हजार रुपये की किस्त दी जानी थी। पहली किस्त चयन होते ही और दूसरी गड्ढा बनने के बाद। नगर निगम प्रशासन ने पहले क्रम में चयनित लाभार्थियों के खाते में चार-चार हजार रुपये भेज दिए थे। लेकिन उनका स्थलीय सत्यापन नहीं किया था। जब सत्यापन के लिए अधिकारी शहर में निकले तो बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया। जिसका खुलासा अमर उजाला ने किया था। उसके बाद नगरायुक्त ने 460 परिवारों से रिकवरी की। लेकिन 340 परिवारों का अब तक पता नहीं चल पाया।
सफाई इंस्पेक्टरों ने किया था सत्यापन
निगम प्रशासन ने प्रत्येक वार्ड में शौचालयों के लिए भवन और स्थलीय निरीक्षण की जिम्मेदारी सफाई इंस्पेक्टरों को सौंपी थी। उनको वीडियो और फोटोग्राफी करके पूरी रिपोर्ट निगम में जमा करनी थी। जिसको ऑनलाइन शासन की वेबसाइट पर अपलोड किया जाता था। कुछ सफाई इंस्पेक्टरों ने फोटो में फर्जीवाड़ा करके रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी थी। कुछ पुराने शौचालयों पर भी पैसा जारी किया गया था। वहीं गड़बड़ी सामने आने के बाद भी निगम और जिला प्रशासन ने शासन को झूठी रिपोर्ट दी। उसी रिपोर्ट के आधार पर केंद्र और और राज्य सरकार ने निगम को ओडीएफ का प्रमाण पत्र जारी कर दिया था।
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अब टीम आई तो छूट रहे पसीने
सरकार द्वारा भेजी गई समिति महानगर में शौचालयों की जांच कर रही है। जिसके बाद से निगम अधिकारियों के पसीने छूट रहे हैं। नगर स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. गजेंद्र कुमार पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि 340 शौचालय निगम के रिकॉर्ड में तो दर्ज हैं, लेकिन तलाशने के बाद भी धरातल पर नहीं मिल रहे हैं। जांच टीम की अध्यक्ष रितु मिश्रा का कहना है कि रिपोर्ट शासन में सौंपी जाएगी।
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स्वच्छ भारत मिशन के तहत नगर निगम ने 12040 लोगों के घर शौचालय बनवाने के लिए चुना। एक शौचालय के लिए सरकारी खजाने से आठ हजार रुपये दिए जाने थे। नियमानुसार दो बार में चार-चार हजार रुपये की किस्त दी जानी थी। पहली किस्त चयन होते ही और दूसरी गड्ढा बनने के बाद। नगर निगम प्रशासन ने पहले क्रम में चयनित लाभार्थियों के खाते में चार-चार हजार रुपये भेज दिए थे। लेकिन उनका स्थलीय सत्यापन नहीं किया था। जब सत्यापन के लिए अधिकारी शहर में निकले तो बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया। जिसका खुलासा अमर उजाला ने किया था। उसके बाद नगरायुक्त ने 460 परिवारों से रिकवरी की। लेकिन 340 परिवारों का अब तक पता नहीं चल पाया।
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सफाई इंस्पेक्टरों ने किया था सत्यापन
निगम प्रशासन ने प्रत्येक वार्ड में शौचालयों के लिए भवन और स्थलीय निरीक्षण की जिम्मेदारी सफाई इंस्पेक्टरों को सौंपी थी। उनको वीडियो और फोटोग्राफी करके पूरी रिपोर्ट निगम में जमा करनी थी। जिसको ऑनलाइन शासन की वेबसाइट पर अपलोड किया जाता था। कुछ सफाई इंस्पेक्टरों ने फोटो में फर्जीवाड़ा करके रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी थी। कुछ पुराने शौचालयों पर भी पैसा जारी किया गया था। वहीं गड़बड़ी सामने आने के बाद भी निगम और जिला प्रशासन ने शासन को झूठी रिपोर्ट दी। उसी रिपोर्ट के आधार पर केंद्र और और राज्य सरकार ने निगम को ओडीएफ का प्रमाण पत्र जारी कर दिया था।
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अब टीम आई तो छूट रहे पसीने
सरकार द्वारा भेजी गई समिति महानगर में शौचालयों की जांच कर रही है। जिसके बाद से निगम अधिकारियों के पसीने छूट रहे हैं। नगर स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. गजेंद्र कुमार पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि 340 शौचालय निगम के रिकॉर्ड में तो दर्ज हैं, लेकिन तलाशने के बाद भी धरातल पर नहीं मिल रहे हैं। जांच टीम की अध्यक्ष रितु मिश्रा का कहना है कि रिपोर्ट शासन में सौंपी जाएगी।