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मरते दम तक भारत से रहा अफगानी का प्यार

Tue, 17 Apr 2018 02:56 AM IST
Updated Tue, 17 Apr 2018 02:56 AM IST
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मरते दम तक भारत से रहा अफगानी का प्यार
मरते दम तक भारत से रहा अफगानी का प्यार
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मेरठ। इसे भारत की धरती से प्यार कहें या यहां की संस्कृति से लगाव। 30 साल पहले अफगानिस्तान से परिवार छोड़कर आए शाहबाज ने फिर कभी मुड़कर नहीं देखा। परिजन कई बार लेने आए। लेकिन शाहबाज कहते रहे कि मरते दम तक मैं भारत नहीं छोडू़ंगा। अब 80 साल की उम्र में शाहबाज का देहांत हुआ तो परिवार वाले शव को अफगानिस्तान ले गए।
मूल रूप से काबुल (अफगानिस्तान) निवासी शाहबाज करीब 30 साल से देहली गेट थानाक्षेत्र अंतर्गत अहमद रोड पर बुशरा के घर में किराए पर रह रहे थे। शाहबाज आयुर्वेदिक दवाईयों से लोगों का इलाज करते थे। शुक्रवार को शाहबाज ने बीमारी के चलते अंतिम सांस ली तो बुशरा ने इसकी सूचना शाहबाज के बेटे जावेद को दी। जावेद समेत तीन लोग सोमवार को काबुल से मेरठ पहुंचे। जावेद ने डीएम और एसएसपी से संपर्क कर शव अफगानिस्तान ले जाने की अनुमति मांगी।
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प्रशासनिक आदेश पर एसओ देहली गेट विजय कुमार गुप्ता बुशरा के घर पहुंचे। शाहबाज के शव की वीडियोग्राफी कराकर रिपोर्ट डीएम को भेजी। पुलिस के मुताबिक जावेद ने बताया कि उसके पिता को भारत देश से काफी लगाव था। कई बार वह मेरठ उनसे मिलने आए और साथ चलने को कहा। लेकिन वह हर बार मना कर देते थे। उन्होंने साफ कहा था कि जब तक वह जिंदा हैं, वह इस देश को नहीं छोड़ेंगे।
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हर साल पूरी करते थे कानूनी प्रक्रिया
पुलिस के मुताबिक शाहबाज हर साल कानूनी प्रक्रिया पूरी करते थे। एलआईयू के पास भी उनके पूरे दस्तावेज हैं। उनकी मौत की खबर लगते ही एलआईयू टीम बुशरा के घर पहुंची। बुशरा से शव को सुपुर्द-ए-खाक कराने को कहा। लेकिन बुशरा ने शाहबाज के बेटे के आने की बात एलआईयू अफसरों को बताई।
दो दिन से रखा रहा शव
बुशरा ने दो दिन से शाहबाज के शव को बर्फ पर रखा। दरअसल जावेद ने बुशरा से कहा था कि वह अफगानिस्तान से चल दिया है। उसके पिता के शव को सुरक्षित रखवा दो। सोमवार सुबह जावेद पहुंचा और सारी प्रक्रिया पूरी कराकर पिता के शव को अफगानिस्तान लेकर रवाना हो गया। पुलिस ने सारे कागज करीब आठ घंटे में पूरे करा दिए।

बहुत अच्छे थे शाहबाज
बुशरा और आसपास के लोगों ने बताया कि शाहबाज अच्छे इंसान थे। उनको भारत देश से बहुत लगाव था। उनके मोबाइल फोन पर भी भारत का झंडा लगा था। लोगों को हमेशा एक ही बात बताते थे कि सबका एक ही मजहब होता है। धर्म से ऊपर उठकर काम करना चाहिए। गरीब लोगों से शहबाज कभी पैसा नहीं लेते थे।
खास बातें
- 30 साल पहले अफगानिस्तान से भारत आए थे शाहबाज
- कई बार परिजन लेने आए लेकिन नहीं गए देश छोड़कर
- 80 साल में हुआ देहांत, अब जाकर परिजन ले गए शव
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