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बिजली कटौती से प्रभावित हो रहा साड़ी उद्योग

Thu, 01 Sep 2016 11:58 PM IST
ब्यूरो, अमर उजाला, मऊ
ब्यूरो, अमर उजाला, मऊ Updated Thu, 01 Sep 2016 11:58 PM IST
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sari industry disturbed due to unsufficient electricity supply
नगर क्षेत्र के छित्तनपुरा मोहल्ले में बिजली कटौती के कारण बंद पड़ा लूम।
 देश के साथ विदेशों में भी मशहूर जिले का चर्चित जिले का प्रसिद्ध साड़ी उद्योग इन दिनों बिजली कटौती और प्रशासनिक उदासीनता के चलते काफी हद तक प्रभावित है। बिजली आपूर्ति ठप रहने से पावरलूम, जरी, कढ़ाई का काम तो प्रभावित होता ही है, साथ ही राइस मिल, आटा मिल सहित विभिन्न लघु उद्योगों बिजली कटौती की मार से प्रभावित हैं। 20 घंटे के सापेक्ष लगातार सिर्फ 10 घंटे ही बिजली मिल पा रही है। आलम है कि अब औद्योगिक क्षेत्र की यूनिटों के बंद होने का भी खतरा मंडराने लगा है। लूम बंद होने से बुनकर बेकार होकर घुम रहें हैं। कभी कभी तो उनके घर का चुल्हा जलने की दुश्वारी खड़ी हो जा रही। इस सब के बाद भी प्रशासन की तंद्रा टूटने का नाम नहीं ले रही।  
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 जिले  की आबादी लगभग 22 लाख है। ऐसे में जिला का प्रमुख व्यवसाय साड़ी का है। अकेले नगर क्षेत्र में करीब एक लाख बुनकर साड़ी बुनाई का काम कर परिवार का भरण-पोषण करते हैं। लेकिन बिजली की अघोषित कटौती बुनकरों का काम प्रभावित कर दे रहा। बिजली न रहने पर लूम बंद हो जा रहे। जबकि एक साड़ी तैयार करने में बुनकरों को पांच से सात घंटा लगता है और एक साड़ी तैयार होने पर उन्हें मजदूरी 50 से 70 रुपये मिलती है। ऐसे में बिजली कटने पर यह काम पूरा नहीं हो पाता।
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 बताते चलें नगर क्षेत्र के सहादतपुरा मुहल्ले में मौजूद औद्योगिक क्षेत्र में बरवक्त 26 लघुउद्योग स्थापित है। यहां 24 घंटे बिजली देने के लिए वर्ष 2012 में  विद्युत उपकेंद्र बना। लेकिन विभागीय लापरवाही के चलते अभी तक औद्योगिक क्षेत्र का स्वतंत्र फीडर नहीं बनाया जा सका है। कम बिजली मिलने से यूनिटों के बंद होने का खतरा बढ़ गया है। यही हाल बुनाई सहित अन्य कारोबार का है। जिले में लगभग 30 हजार से अधिक पावरलूम लगे हैं।   नगर सहित जिले में कई माह से विद्युत आपूर्ति व्यवस्था चरमरा गई है। मांग के अनुरूप बिजली न मिलने से प्रतिदिन लगभग एक करोड़ का  नुकसान हो रहा है। आपातकालीन  कटौती, नियमित रोस्टिंग से लेकर, शट डाउन, ब्रेक डाउन, ट्रिपिंग ने साड़ी सहित अन्य उद्योग धंधों की कमर ही तोड़ दी है। बुनकरों तथा कारीगरों को परिवार का खर्च चलाना तो दूर अपना खर्च चलाना भारी पड़ रहा है।
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