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मस्जिदों में एतेकाफ पर बैठ गए रोजेदार, रौनक
mau
Updated Fri, 08 Jun 2018 12:42 AM IST
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mosques
- फोटो : BASIT ZARGAR
रमजान का तीसरा अशरा ‘जहन्नम से आजादी’ का शुरू हो चुका है। कई रोजेदार इन दस दिनों में मस्जिदों में रहकर इबादत करेंगे। एतेकाफ की जाने वाली इस प्रक्रिया में एतेकाफ पर बैठने वाला चंद दिनों के लिए अपने दुनियावी मामालों को छोड़कर खुदा से लौ लगाता है। अपनी गुनाहों की माफी और जहन्नम से आजादी की दुआएं मांगता है।
मौलवी अरशद ने बताया कि एतेकाफ कि मायने किसी मखसूस मकान में अपने को रोके रखना और इबादत की नियत से अल्लाह के लिए मस्जिद में ठहरना है। एतेकाफ की तीन किस्में हैं। एक एतेेकाफे वाजिब होता है। जिसमें मन्नत मांगने वाला मन्नत पूरी होने पर एक समयबद्घ (एक दिन, दो दिन चार दिन ) तक एतेकाफ में बैठता है। दूसरा एतेकाफे मसनून है। इसके तहत आखिरी अशरे के अंतिम दिनों में रोजेदार मस्जिद में दाखिल हो जाए, तीसवी रमजान को सूरज गुरुब होने के बाद या फिर 29 वी रमजान को चांद नजर आने के बाद मस्जिद से निकले।
तीसरा एतेकाफे मुस्तहब होता है, यह एतेकाफ केफाया है, यानि अगर महल्ले की मस्जिदों में बस्ती का एक शख्स एतेकाफ करता है, तो पूरी बस्ती को इसका सवाब मिलता है। यदि मुहल्ले के मस्जिदों में कोई एतेकाफ में नहीं बैठा तो पूरे बस्ती वालों की अल्लाह के यहां पकड़ होगी। एतेेकाफ के लिए रोजा शर्त है, यानि रोजा रखने वाला ही एतेकाफ में बैठ सकता है। उधर, इलाकों की मस्जिदें एतेकाफ करने वालों से गुलजार हो गई हैं।
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मौलवी अरशद ने बताया कि एतेकाफ कि मायने किसी मखसूस मकान में अपने को रोके रखना और इबादत की नियत से अल्लाह के लिए मस्जिद में ठहरना है। एतेकाफ की तीन किस्में हैं। एक एतेेकाफे वाजिब होता है। जिसमें मन्नत मांगने वाला मन्नत पूरी होने पर एक समयबद्घ (एक दिन, दो दिन चार दिन ) तक एतेकाफ में बैठता है। दूसरा एतेकाफे मसनून है। इसके तहत आखिरी अशरे के अंतिम दिनों में रोजेदार मस्जिद में दाखिल हो जाए, तीसवी रमजान को सूरज गुरुब होने के बाद या फिर 29 वी रमजान को चांद नजर आने के बाद मस्जिद से निकले।
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तीसरा एतेकाफे मुस्तहब होता है, यह एतेकाफ केफाया है, यानि अगर महल्ले की मस्जिदों में बस्ती का एक शख्स एतेकाफ करता है, तो पूरी बस्ती को इसका सवाब मिलता है। यदि मुहल्ले के मस्जिदों में कोई एतेकाफ में नहीं बैठा तो पूरे बस्ती वालों की अल्लाह के यहां पकड़ होगी। एतेेकाफ के लिए रोजा शर्त है, यानि रोजा रखने वाला ही एतेकाफ में बैठ सकता है। उधर, इलाकों की मस्जिदें एतेकाफ करने वालों से गुलजार हो गई हैं।
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