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प्रधानों के हस्तक्षेप से ग्राम पंचायत सदस्य बन जाते हैं रबर स्टैंप
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मऊ। गांवों के विकास में ग्राम पंचायत सदस्यों की अहम भूमिका होती है। गांव के विकास के लिए बनने वाली समितियों में ग्राम पंचायत सदस्य शामिल होते हैं। चार समितियों के अध्यक्ष भी ग्राम पंचायत सदस्य ही होते हैं। लेकिन प्रधानों के हस्तक्षेप के चलते इन ग्राम पंचायत सदस्यों की भूमिका महज रबर स्टैंप की रह जाती है।
ग्राम पंचायत के गठन के लिए प्रधान के पास ग्राम पंचायत सदस्यों का दो तिहाई बहुमत होना जरूरी है। इसीलिए ग्राम प्रधान अपने करीबी और भरोसेमंद लोगों को ग्राम पंचायत सदस्य का उम्मीदवार बनाते हैं। जिससे गांव के विकास के लिए बनने वाली योजनाओं को प्रधान अपने मनमाफिक लागू करा सकें। ग्राम पंचायत सदस्य चाहें तो वे ग्राम पंचायत के प्रस्ताव से असहमति जता सकते हैं। इससे प्रस्ताव पारित होने मेें दिक्कत आ सकती है। नियमत: प्रस्ताव पारित न होने पर कोई भी विकास कार्य नहीं हो सकता है। लेकिन वास्तविकता कुछ और ही होती है। सारी प्रक्रिया कागज पर ही पूरी कर ली जाती है। पंचायत सदस्य भी यह जानते हैं कि प्रस्ताव पर उनकी असहमति का कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला है इसलिए वे भी विरोध नहीं करते हैं। हालांकि व्यवहारिक रूप में कोई भी ग्राम पंचायत सदस्य प्रधान के प्रस्ताव का विरोध करने की जहमत नहीं उठाते क्योंकि वे प्रधान के करीबी होते हैं। प्रधान तो ग्राम पंचायत की फर्जी बैठकें केवल कागज में ही दिखाकर सदस्यों के फर्जी हस्ताक्षर भी बना देते हैं। पंचायत सदस्यों को इन प्रस्तावों की जानकारी तक नहीं हो पाती है।
असलपुर में डीएम के हस्तक्षेप से हुआ ग्राम पंचायत का गठन
रानीपुर ब्लाक के असलपुर ग्राम पंचायत के पिछले चुनाव में मुन्ना राव बागी प्रधान निर्वाचित हुए थे। लेकिन गांव के कुछ दबंगों के प्रभाव के चलते अधिकांश ग्राम पंचायत सदस्यों ने शपथ ही नहीं ली और प्रधान को दो तिहाई सदस्यों का बहुमत नहीं मिल सका था। तब राष्ट्रीय पंचायत राज संगठन के हस्तक्षेप पर तत्कालीन जिलाधिकारी प्रकाश बिंदु ने पहल किया। तब जाकर असलपुर ग्राम पंचायत का गठन हो सका था।
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ग्राम पंचायत के गठन के लिए प्रधान के पास ग्राम पंचायत सदस्यों का दो तिहाई बहुमत होना जरूरी है। इसीलिए ग्राम प्रधान अपने करीबी और भरोसेमंद लोगों को ग्राम पंचायत सदस्य का उम्मीदवार बनाते हैं। जिससे गांव के विकास के लिए बनने वाली योजनाओं को प्रधान अपने मनमाफिक लागू करा सकें। ग्राम पंचायत सदस्य चाहें तो वे ग्राम पंचायत के प्रस्ताव से असहमति जता सकते हैं। इससे प्रस्ताव पारित होने मेें दिक्कत आ सकती है। नियमत: प्रस्ताव पारित न होने पर कोई भी विकास कार्य नहीं हो सकता है। लेकिन वास्तविकता कुछ और ही होती है। सारी प्रक्रिया कागज पर ही पूरी कर ली जाती है। पंचायत सदस्य भी यह जानते हैं कि प्रस्ताव पर उनकी असहमति का कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला है इसलिए वे भी विरोध नहीं करते हैं। हालांकि व्यवहारिक रूप में कोई भी ग्राम पंचायत सदस्य प्रधान के प्रस्ताव का विरोध करने की जहमत नहीं उठाते क्योंकि वे प्रधान के करीबी होते हैं। प्रधान तो ग्राम पंचायत की फर्जी बैठकें केवल कागज में ही दिखाकर सदस्यों के फर्जी हस्ताक्षर भी बना देते हैं। पंचायत सदस्यों को इन प्रस्तावों की जानकारी तक नहीं हो पाती है।
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असलपुर में डीएम के हस्तक्षेप से हुआ ग्राम पंचायत का गठन
रानीपुर ब्लाक के असलपुर ग्राम पंचायत के पिछले चुनाव में मुन्ना राव बागी प्रधान निर्वाचित हुए थे। लेकिन गांव के कुछ दबंगों के प्रभाव के चलते अधिकांश ग्राम पंचायत सदस्यों ने शपथ ही नहीं ली और प्रधान को दो तिहाई सदस्यों का बहुमत नहीं मिल सका था। तब राष्ट्रीय पंचायत राज संगठन के हस्तक्षेप पर तत्कालीन जिलाधिकारी प्रकाश बिंदु ने पहल किया। तब जाकर असलपुर ग्राम पंचायत का गठन हो सका था।
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