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कोरोना संक्रमण काल में भी नहीं हारे हिम्मत, नौकरी गई तो शुरु किया दूसरा कारोबार
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मऊ। ‘पंख होने से क्या होता है, हौसलों से उड़ान होती है, मंजिलें उनको ही मिलती है, जिनके सपनों में जान होती है’। यह पंक्ति उन लोगों पर सटीक बैठती है, विपरीत परिस्थिति में भी हिम्मत नहीं हारते बल्कि उससे लड़कर मंजिल को पाने का काम करते है। कोरोना संक्रमण काल ने कईयों का जीवन बदल दिया है। इसमें नौकरी जाने के बाद भी हिम्मत न हार नए सिरे से काम शुरु कर खुद को खड़ा करने का कार्य किया।
आज ऐसे कई लोग ऐसे है जो इस संक्रमण काल में खुद ही नहीं खड़ा हुए बल्कि कईयों को रोजगार मुहैया करा रहे है। अमर उजाला द्वारा कोरोना संक्रमण के इस विपरित माहौल में ऐसे ही दो लोगों की कहानी से आपकों रुबरू करा रहा है। ऐसे में पहला नाम आता है रतनपुरा ब्लाक के प्रेमप्रकाश राम 32 पुत्र चंद्रिका का।
प्रेमप्रकाश देहरादून में ब्रांडेड कंपनी रिबोक में नौकरी करते थे। जहां कोरोना संक्रमण की पहली लहर में छंटनी के दौर में उसकी नौकरी चली गई। अचानक नौकरी जाने से प्रेमप्रकाश घबराए नहीं बल्कि हिम्मत से काम लिए। वो देहरादून से वापस अपने गांव पहुंचे और कुछ दिनों तक स्वरोजगार के बारे में मंथन करते रहें। इसके बाद उन्होंने पशु पालन शुरु किया। प्रेम प्रकाश की मानें मो वो रतनपुरा ब्लाक स्थित पिलखी कृषि केंद्र पहुंचकर डॉ. विनय सिंह से मिलकर पोल्ट्री फार्म के संबंध में जानकारी लिए, साथ ही पांच दिनों तक प्रशिक्षण लिए। प्रशिक्षण के बाद प्रेम प्रकाश अपने खेत में पोल्ट्री फार्म खोले, जिसमें, मुर्गा तथा बत्तख पालन शुरू किया।
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आज एक वर्ष में वह इसी रोगजार से वह सालाना एक लाख रुपये से ज्यादा का आय करते है। इतना ही नहीं वह गांव के दो युवक लालजी, रमाकांत को रोजगार दे चुकें है। प्रेमप्रकाश बताते है कि वह मछली पालन के लिए प्रशिक्षण प्राप्त कर चुकें है। अब आगे वो मछली पालन करने के लिए प्रयासरत है।
कोपागंज के कोपाकोहना गांव निवासी मुनेश्वर चौरसिया वर्षो से मुंबई में रहकर व्यापार करते थे, पिछले वर्ष कोरोना संक्रमण को लेकर लगे लॉकडाउन में उनका कारोबार चौपट हो गया। इस दौरान वो परिवार के साथ घर कोपकोहना आ गए और घर पर रहकर सेल्स मैन के रूप में घूमकर घूमकर गांवों में सामान बेचकर जीवन यापन करते है।
बात करने पर मुनेश्वर ने बताया कि वो मुंबई के अंधेरी में अपना पुस्तैनी धंधा पान का जमाए थे। लेकिन कोरोना संक्रमण ने उनके बीस वर्षो की बसे बसाए व्यापार को तहस नहस कर दिया। वर्ष 2020 में लॉक डाउन में जब काम धंधा बंद हो गया, तो वो परिवार पत्नी और दो बच्चों के साथ अपने घर कोपागंज आ गए। यहां पर कुछ दिनों तक बेकार इधर उधर घूमते रहे। लेकिन बाद में वो साइकिल पर झोले में सामान लेकर बतौर सेल्समैन का काम शुरु किए है। एक वर्ष की मेहनत का परिणाम है कि काम बढ़ गया। आराम से जीवन गुजार रहे है।
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आज ऐसे कई लोग ऐसे है जो इस संक्रमण काल में खुद ही नहीं खड़ा हुए बल्कि कईयों को रोजगार मुहैया करा रहे है। अमर उजाला द्वारा कोरोना संक्रमण के इस विपरित माहौल में ऐसे ही दो लोगों की कहानी से आपकों रुबरू करा रहा है। ऐसे में पहला नाम आता है रतनपुरा ब्लाक के प्रेमप्रकाश राम 32 पुत्र चंद्रिका का।
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प्रेमप्रकाश देहरादून में ब्रांडेड कंपनी रिबोक में नौकरी करते थे। जहां कोरोना संक्रमण की पहली लहर में छंटनी के दौर में उसकी नौकरी चली गई। अचानक नौकरी जाने से प्रेमप्रकाश घबराए नहीं बल्कि हिम्मत से काम लिए। वो देहरादून से वापस अपने गांव पहुंचे और कुछ दिनों तक स्वरोजगार के बारे में मंथन करते रहें। इसके बाद उन्होंने पशु पालन शुरु किया। प्रेम प्रकाश की मानें मो वो रतनपुरा ब्लाक स्थित पिलखी कृषि केंद्र पहुंचकर डॉ. विनय सिंह से मिलकर पोल्ट्री फार्म के संबंध में जानकारी लिए, साथ ही पांच दिनों तक प्रशिक्षण लिए। प्रशिक्षण के बाद प्रेम प्रकाश अपने खेत में पोल्ट्री फार्म खोले, जिसमें, मुर्गा तथा बत्तख पालन शुरू किया।
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आज एक वर्ष में वह इसी रोगजार से वह सालाना एक लाख रुपये से ज्यादा का आय करते है। इतना ही नहीं वह गांव के दो युवक लालजी, रमाकांत को रोजगार दे चुकें है। प्रेमप्रकाश बताते है कि वह मछली पालन के लिए प्रशिक्षण प्राप्त कर चुकें है। अब आगे वो मछली पालन करने के लिए प्रयासरत है।
कोपागंज के कोपाकोहना गांव निवासी मुनेश्वर चौरसिया वर्षो से मुंबई में रहकर व्यापार करते थे, पिछले वर्ष कोरोना संक्रमण को लेकर लगे लॉकडाउन में उनका कारोबार चौपट हो गया। इस दौरान वो परिवार के साथ घर कोपकोहना आ गए और घर पर रहकर सेल्स मैन के रूप में घूमकर घूमकर गांवों में सामान बेचकर जीवन यापन करते है।
बात करने पर मुनेश्वर ने बताया कि वो मुंबई के अंधेरी में अपना पुस्तैनी धंधा पान का जमाए थे। लेकिन कोरोना संक्रमण ने उनके बीस वर्षो की बसे बसाए व्यापार को तहस नहस कर दिया। वर्ष 2020 में लॉक डाउन में जब काम धंधा बंद हो गया, तो वो परिवार पत्नी और दो बच्चों के साथ अपने घर कोपागंज आ गए। यहां पर कुछ दिनों तक बेकार इधर उधर घूमते रहे। लेकिन बाद में वो साइकिल पर झोले में सामान लेकर बतौर सेल्समैन का काम शुरु किए है। एक वर्ष की मेहनत का परिणाम है कि काम बढ़ गया। आराम से जीवन गुजार रहे है।