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ऑक्सीजन सिलेंडर की साफ सफाई न होने से ब्लैक फंगस का बढ़ा खतरा
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ऑक्सीजन सिलिंडर की सफाई न होने से ब्लैक फंगस का खतरा
जिला अस्पताल में फंगस के संक्रमितों के लिए छह बेड का वार्ड संरक्षित
दो मरीजों का वाराणसी में ब्लैक व व्हाइट फंगस से संक्रमित होने की पुष्टि
फोटो
संवाद न्यूज एजेंसी
मऊ। संक्रमण की दूसरी लहर का ग्राफ अभी पूरी तरह से कम नहीं हुआ है। ऐसे में अब म्यूकरमाइकोसिस (ब्लैक फंगस) से जुड़े मामले बढ़ने से एक ओर महामारी का खतरा बढ़ने लगा है। जिले में ब्लैक फंगस तथा व्हाइट फंगस से ग्रस्त दो मरीजों के वाराणसी में मिलने की पुष्टि हो चुकी है। विभाग ने ब्लैक फंगस से निपटने के लिए जिला अस्पताल में छह बेड का वार्ड भी संरिक्षत कर लिया है। इस दूसरी महामारी के बढ़ने को लेकर चिकित्सक बताते हैं कि स्टेरायड के अलावा ओरल हाइजीन का मेटेनें नहीं रखना है। जो संक्रमित मरीज ऑक्सीजन सपोर्ट पर होता है उसके मुंह की कई दिन तक सफाई नहीं हो पाती। ऐसे में ब्लैक फंगस होने की संभावना होती है।
अमर उजाला ने इस बीमारी की रोकथाम के लिए जिला अस्पताल को जांचा। अमर उजाला की टीम बुधवार की दोपहर करीब एक बजे जिला अस्पताल पहुंची। टीम यहां इमरजेंसी कक्ष के दूसरे हिस्से में दूसरे तल पर जाने के लिए बन सीढ़ी के पास बनाए गए ऑक्सीजन प्लांट के पास पहुंची। यहां टीम को सात बड़े आक्सीजन सिलिंडर रखे मिले। टीम को यह सिलिंडर साफ सुथरे नजर आए। इसी क्रम में टीम वार्ड में पहुंची, यहां साफ सफाई व्यवस्था नदारद मिली। इमरजेंसी वार्ड में भर्ती मरीजों के लिए लगे बेड पर कोई चादर नहीं बिछा दिखाई दिया। इतना ही नहीं मजबूरी में बिना चादर बिछे बेड पर मरीज लेटे नजर आए।
वहीं सीएमएस डॉ. बृजकुमार से ऑक्सीजन दिए जाने के दौरान ओरल हाइजीन का मेंटेन रखने की व्यवस्था के बारे में जानकारी ली गई। जिस पर उन्होंने बताया कि संक्रमित व्यक्ति को अगर ऑक्सीजन की जरूरत पड़ती है तो उसे कम से कम पांच से सात दिन तक ऑक्सीजन लगानी पड़ती है। इस दौरान उनके परिजन उनसे दूर होते हैं और मेडिकल स्टाफ मरीज की साफ सफाई या ओरल हाइजीन का ध्यान रखा जाता है। बताया कि ब्लैक फंगस के मामलों को देखते हुए उनके यहां सफाई कर्मचारियों द्वारा आक्सीजन के समय सिलिंडर आदि की सफाई की जा रही है।
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इनसेट
मिडीफाइड ऑक्सीजन में जल्दी बढ़ता है फंगस
मऊ। सीएमओ डॉ. सतीशचंद्र सिंह ने बताया कि फंसग वातावरण में पहले से ही होता है। लेकिन सामान्य व्यक्ति के रोग प्रतिरोधक क्षमता अच्छा होने से वह इसके जद में नहीं आते है। इसके अलावा हम जब नार्मल तरह से ऑक्सीजन लेते है तो उसमें नाइट्रोजन की मात्रा ज्यादा होती है। लेकिन जब मरीज में पाइप लाइन या सिलिंडर के जरिए ऑक्सीजन दी जाती है तो वह ह्यूमिडीफाइड (वाष्पीकृत) ऑक्सीजन होती है। जिसमें नाइट्रोजन न के बराबर होती है। इसमें फंगस ज्यादा जल्दी पनपते हैं और तेजी से काम करते हैं।
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जिला अस्पताल में फंगस के संक्रमितों के लिए छह बेड का वार्ड संरक्षित
दो मरीजों का वाराणसी में ब्लैक व व्हाइट फंगस से संक्रमित होने की पुष्टि
फोटो
संवाद न्यूज एजेंसी
मऊ। संक्रमण की दूसरी लहर का ग्राफ अभी पूरी तरह से कम नहीं हुआ है। ऐसे में अब म्यूकरमाइकोसिस (ब्लैक फंगस) से जुड़े मामले बढ़ने से एक ओर महामारी का खतरा बढ़ने लगा है। जिले में ब्लैक फंगस तथा व्हाइट फंगस से ग्रस्त दो मरीजों के वाराणसी में मिलने की पुष्टि हो चुकी है। विभाग ने ब्लैक फंगस से निपटने के लिए जिला अस्पताल में छह बेड का वार्ड भी संरिक्षत कर लिया है। इस दूसरी महामारी के बढ़ने को लेकर चिकित्सक बताते हैं कि स्टेरायड के अलावा ओरल हाइजीन का मेटेनें नहीं रखना है। जो संक्रमित मरीज ऑक्सीजन सपोर्ट पर होता है उसके मुंह की कई दिन तक सफाई नहीं हो पाती। ऐसे में ब्लैक फंगस होने की संभावना होती है।
अमर उजाला ने इस बीमारी की रोकथाम के लिए जिला अस्पताल को जांचा। अमर उजाला की टीम बुधवार की दोपहर करीब एक बजे जिला अस्पताल पहुंची। टीम यहां इमरजेंसी कक्ष के दूसरे हिस्से में दूसरे तल पर जाने के लिए बन सीढ़ी के पास बनाए गए ऑक्सीजन प्लांट के पास पहुंची। यहां टीम को सात बड़े आक्सीजन सिलिंडर रखे मिले। टीम को यह सिलिंडर साफ सुथरे नजर आए। इसी क्रम में टीम वार्ड में पहुंची, यहां साफ सफाई व्यवस्था नदारद मिली। इमरजेंसी वार्ड में भर्ती मरीजों के लिए लगे बेड पर कोई चादर नहीं बिछा दिखाई दिया। इतना ही नहीं मजबूरी में बिना चादर बिछे बेड पर मरीज लेटे नजर आए।
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वहीं सीएमएस डॉ. बृजकुमार से ऑक्सीजन दिए जाने के दौरान ओरल हाइजीन का मेंटेन रखने की व्यवस्था के बारे में जानकारी ली गई। जिस पर उन्होंने बताया कि संक्रमित व्यक्ति को अगर ऑक्सीजन की जरूरत पड़ती है तो उसे कम से कम पांच से सात दिन तक ऑक्सीजन लगानी पड़ती है। इस दौरान उनके परिजन उनसे दूर होते हैं और मेडिकल स्टाफ मरीज की साफ सफाई या ओरल हाइजीन का ध्यान रखा जाता है। बताया कि ब्लैक फंगस के मामलों को देखते हुए उनके यहां सफाई कर्मचारियों द्वारा आक्सीजन के समय सिलिंडर आदि की सफाई की जा रही है।
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मिडीफाइड ऑक्सीजन में जल्दी बढ़ता है फंगस
मऊ। सीएमओ डॉ. सतीशचंद्र सिंह ने बताया कि फंसग वातावरण में पहले से ही होता है। लेकिन सामान्य व्यक्ति के रोग प्रतिरोधक क्षमता अच्छा होने से वह इसके जद में नहीं आते है। इसके अलावा हम जब नार्मल तरह से ऑक्सीजन लेते है तो उसमें नाइट्रोजन की मात्रा ज्यादा होती है। लेकिन जब मरीज में पाइप लाइन या सिलिंडर के जरिए ऑक्सीजन दी जाती है तो वह ह्यूमिडीफाइड (वाष्पीकृत) ऑक्सीजन होती है। जिसमें नाइट्रोजन न के बराबर होती है। इसमें फंगस ज्यादा जल्दी पनपते हैं और तेजी से काम करते हैं।