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6000 मजदूरों की रोजी-रोटी छिनी
ब्यूरो, अमर उजाला, मऊ
Updated Mon, 27 Jun 2016 12:11 AM IST
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जनपद में रोजगार सृजन के लिए स्थापित स्वदेशी काटन मिल और स्पिनिंग मिल बंद होने से साढ़े छह हजार मजदूर प्रत्यक्ष रूप से बेरोजगार हो गए। जबकि अप्रत्यक्ष रूप से लगभग 25 हजार लोग प्रभावित हुए हैं। वर्ष 1974 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने मऊ के परदहा में स्पिनिंग मिल और आजमगढ़ जनपद के सठियांव में चीनी मिल की आधारशिला रखी थी। इस मिल का संचालन वर्ष 1976 से शुरू हुआ।
स्पिनिंग मिल की स्थापना के पीछे लक्ष्य था कि मऊ के बुनकरों को कच्चा सूत स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कराना। यह बुनकर हैंडलूम अथवा पावरलूम से साड़ियां, लुंगी अथवा अन्य कपड़े बुनते हैं। इसके लिए उन्हें धागे बाहर से मंगाना पड़ता था। चूंकि जिले में धागा तैयार होगा तो बुनकरों को काफी सहूलियत होगी। काफी क्षमता वाली इस मिल में 50 हजार तकुओं वाली इस धागा मिल में पांच हजार मजदूर काम करते थे। वर्ष 2000 तक यह मिल बहुत अच्छी तरह चलती रही।
लेकिन इसके बाद इस मिल में मजदूरों की हड़ताल , बंदी सहित आंदोलन चलने लगे। प्रबंध तंत्र और मिल मजदूर नेताओं केेे बीच हुई वार्ता का सार्थक हल नहीं निकला और जैसे तैसे पांच साल और यानी 2005 तक चलती रही लेकिन इसके बाद मिल को बंद कर दिया गया। अब हाल यह है कि मिल की सारी मशीने बेकार हो गई हैं। मिल परिसर में पीछे की ओर इस समय बड़े बड़े झाड़ उग आए हैं। कर्मचारियों के आवास बिलकुल खंडहर हो चुके हैं। यहां बिजली और पानी सब कुछ बंद हैं फिर भी कुछ परिवार कहीं ठौर न होने के चलते उन्हीं खंडहरों में रह रहे हैं।
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इधर शहर के दक्षिणी छोर पर स्थित सहादतपुरा में स्थित स्वदेशी काटन मिल कभी राजस्थान घराने की जयपुरिया ग्रुप की थी। सरकार ने 1962 में इसका अधिग्रहण किया तब से यह सरकार के नियंत्रण में चल रही थी। इसमें 1300 मजदूर काम करते थे। इसमें सूती वस्त्र तैयार होता था।
इस मिल में तैयार कपड़े प्रदेश के वाराणसी , कानपुर , लखनऊ , गोरखपुर , मेरठ के अलावा मुंबई, बेंगलोर , हैदराबाद और कोलकाता सरीखे महानगरों को भेजे जाते थे। लेकिन लगातार घाटे में चलने के चलते प्रबंधन ने इस मिल के और आगे चला पाने में असमर्थता जताते हुए मिल बंद कर दिया। मिल की बंदी ने मजदूरों को बेरोजगारी के गहरे अंधकार में ढकेल दिया है। वर्तमान में इस मिल में महज पांच सुरक्षाकर्मी और एकसुपरवाइजर हैं।
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स्पिनिंग मिल की स्थापना के पीछे लक्ष्य था कि मऊ के बुनकरों को कच्चा सूत स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कराना। यह बुनकर हैंडलूम अथवा पावरलूम से साड़ियां, लुंगी अथवा अन्य कपड़े बुनते हैं। इसके लिए उन्हें धागे बाहर से मंगाना पड़ता था। चूंकि जिले में धागा तैयार होगा तो बुनकरों को काफी सहूलियत होगी। काफी क्षमता वाली इस मिल में 50 हजार तकुओं वाली इस धागा मिल में पांच हजार मजदूर काम करते थे। वर्ष 2000 तक यह मिल बहुत अच्छी तरह चलती रही।
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लेकिन इसके बाद इस मिल में मजदूरों की हड़ताल , बंदी सहित आंदोलन चलने लगे। प्रबंध तंत्र और मिल मजदूर नेताओं केेे बीच हुई वार्ता का सार्थक हल नहीं निकला और जैसे तैसे पांच साल और यानी 2005 तक चलती रही लेकिन इसके बाद मिल को बंद कर दिया गया। अब हाल यह है कि मिल की सारी मशीने बेकार हो गई हैं। मिल परिसर में पीछे की ओर इस समय बड़े बड़े झाड़ उग आए हैं। कर्मचारियों के आवास बिलकुल खंडहर हो चुके हैं। यहां बिजली और पानी सब कुछ बंद हैं फिर भी कुछ परिवार कहीं ठौर न होने के चलते उन्हीं खंडहरों में रह रहे हैं।
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इधर शहर के दक्षिणी छोर पर स्थित सहादतपुरा में स्थित स्वदेशी काटन मिल कभी राजस्थान घराने की जयपुरिया ग्रुप की थी। सरकार ने 1962 में इसका अधिग्रहण किया तब से यह सरकार के नियंत्रण में चल रही थी। इसमें 1300 मजदूर काम करते थे। इसमें सूती वस्त्र तैयार होता था।
इस मिल में तैयार कपड़े प्रदेश के वाराणसी , कानपुर , लखनऊ , गोरखपुर , मेरठ के अलावा मुंबई, बेंगलोर , हैदराबाद और कोलकाता सरीखे महानगरों को भेजे जाते थे। लेकिन लगातार घाटे में चलने के चलते प्रबंधन ने इस मिल के और आगे चला पाने में असमर्थता जताते हुए मिल बंद कर दिया। मिल की बंदी ने मजदूरों को बेरोजगारी के गहरे अंधकार में ढकेल दिया है। वर्तमान में इस मिल में महज पांच सुरक्षाकर्मी और एकसुपरवाइजर हैं।