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यमुना की जल यात्राओं ने बसाए गांव, बनाए मंदिर
ब्यूरो, अमर उजाला मथुरा
Updated Mon, 22 Aug 2016 12:09 AM IST
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नगर से गुजरने वाले यमुना के जलमार्ग ने यहां बहुत कुछ दिया है। 16वीं शताब्दी में इस क्षेत्र के जलमार्ग का राजा नरवाहन हो या इससे यात्रा करने वाले बादशाह जहांगीर और इसी के साथ यहां से गुजरने वाले व्यापारी अथवा पर्यटक सभी ने वृंदावन को बहुत कुछ दिया। इसके प्रतीक यहां आज भी मौजूद हैं।
जहांगीर की यात्रा के प्रतीक जहांगीरपुर और बेगमपुर गांव
बादशाह जहांगीर अपने 14 और 15वें जलूसी वर्ष 1619 ईसवी से 1620 के मध्य तीन बार यमुना के जलमार्ग से वृंदावन होकर आगरा तक गुजरा। अपनी इन तीन यात्राओं के दौरान उसने एक बार यहां दलबल के साथ पड़ाव भी डाला और वृंदावन के तत्कालीन मंदिर देखे। इस जलयात्रा के दौरान उसने यमुना किनारे मैदानों में खेमे लगवाए।
उस समय बादशाह जहांगीर के साथ सुरक्षा की दृष्टि से पूरा लाव-लश्कर था और बेगमें, दासियां भी साथ थीं। पड़ाव में बेगमों के खेमे थोड़ी दूरी पर लगवाए गए। उस जमाने की यात्रा के प्रतीक रूप में वृंदावन के यमुना पार ठीक सामने जहांगीरपुर और बेगमपुर गांव आज भी मौजूद हैं।
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कभी नरवाहन के अधीन था यमुना का जलमार्ग
16वीं शताब्दी में यमुना का स्थानीय जलमार्ग नरवाहन के अधीन था और वह बलपूर्वक यात्रियों से चुंगी (टैक्स) वसूलता था। यह तथ्य बताता है कि इस मार्ग से व्यापारिक जहाजों की आवाजाही अधिक थी। उस जमाने के संत भगवतमुदित की रचना रसिक अनन्यमाल में उल्लेख है कि एक बार जैन व्यापारी अपने 700 सशस्त्र रक्षकों की अभिरक्षा में इस जलमार्ग से गुजर रहा था।
नरवाहन के साथियों के चुंगी मांगे जाने पर उसने युद्ध छेड़ दिया। आखिर में जैन व्यापारी पराजित हुआ और उसे बंदी बना लिया गया और मृत्युदंड की सजा सुनाई गई। कारागार में बंदी बने इस व्यापारी पर दया खाकर वहां कार्यरत एक दासी ने व्यापारी को समझाया तू राधावल्लभ श्रीहरिवंश नाम ध्वनि का जप कर इससे तेरे संकट टलेंगे। व्यापारी के इस आचरण को देख नरवाहन प्रभावित हुआ और उसने व्यापारी को मुक्त कर दिया।
विश्वकोष में संरक्षित किया दुर्लभ चित्र
ब्रज संस्कृति विश्वकोश के सह-संपादक डा. राजेश शर्मा बताते हैं कि गोस्वामी हित हरिवंश महाप्रभु के शरणागत होने पर नरवाहन का हृदय परिवर्तित हुआ और इन्होंने वृंदावन में कोइलिया घाट पर राधावल्लभ का मंदिर बनाया, जो आज क्षतिग्रस्त हो चुका है।
इसके कुछ समय बाद बादशाह अकबर के सेनापति रहीम खानखाना के दीवान सुंदरलाल कायस्थ ने राधावल्लभ मंदिर बनवाया। ब्रज संस्कृति विश्वकोष में संरक्षित का एक चित्र है जिसमें यमुना किनारे गोस्वामी हित हरिवंश महाप्रभु के समीप बैठे नरवाहन तत्कालीन संत समुदाय के साथ चित्रित की गई है।
पाण्डुलिपि में है उल्लेख
(भगवतमुदित द्वारा रचित 16वीं शताब्दी में रसिक अनन्यमाल पांडुलिपि में नरवाहन के संदर्भ में ब्रजभाषा काव्य में भी उल्लिखित है।)
जाकी आज्ञा कोउ न टारै। जो टारै तिहि चढ़ि कै मारै।।
बसि करि लियौ सकल ब्रजदेस। तासौं डरपैं बड़े नरेस।।
आयौ एक बड़ौ व्यापारी। लादैं नाव सौंज बहु भारी।।
देहि जगात न सबसौं अरै। तुपक जमूरन सौं बहुलरै।।
तुपक सात सै वाके संग। दुहुं दिसि लागे लरन अभंग।।
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जहांगीर की यात्रा के प्रतीक जहांगीरपुर और बेगमपुर गांव
बादशाह जहांगीर अपने 14 और 15वें जलूसी वर्ष 1619 ईसवी से 1620 के मध्य तीन बार यमुना के जलमार्ग से वृंदावन होकर आगरा तक गुजरा। अपनी इन तीन यात्राओं के दौरान उसने एक बार यहां दलबल के साथ पड़ाव भी डाला और वृंदावन के तत्कालीन मंदिर देखे। इस जलयात्रा के दौरान उसने यमुना किनारे मैदानों में खेमे लगवाए।
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उस समय बादशाह जहांगीर के साथ सुरक्षा की दृष्टि से पूरा लाव-लश्कर था और बेगमें, दासियां भी साथ थीं। पड़ाव में बेगमों के खेमे थोड़ी दूरी पर लगवाए गए। उस जमाने की यात्रा के प्रतीक रूप में वृंदावन के यमुना पार ठीक सामने जहांगीरपुर और बेगमपुर गांव आज भी मौजूद हैं।
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कभी नरवाहन के अधीन था यमुना का जलमार्ग
16वीं शताब्दी में यमुना का स्थानीय जलमार्ग नरवाहन के अधीन था और वह बलपूर्वक यात्रियों से चुंगी (टैक्स) वसूलता था। यह तथ्य बताता है कि इस मार्ग से व्यापारिक जहाजों की आवाजाही अधिक थी। उस जमाने के संत भगवतमुदित की रचना रसिक अनन्यमाल में उल्लेख है कि एक बार जैन व्यापारी अपने 700 सशस्त्र रक्षकों की अभिरक्षा में इस जलमार्ग से गुजर रहा था।
नरवाहन के साथियों के चुंगी मांगे जाने पर उसने युद्ध छेड़ दिया। आखिर में जैन व्यापारी पराजित हुआ और उसे बंदी बना लिया गया और मृत्युदंड की सजा सुनाई गई। कारागार में बंदी बने इस व्यापारी पर दया खाकर वहां कार्यरत एक दासी ने व्यापारी को समझाया तू राधावल्लभ श्रीहरिवंश नाम ध्वनि का जप कर इससे तेरे संकट टलेंगे। व्यापारी के इस आचरण को देख नरवाहन प्रभावित हुआ और उसने व्यापारी को मुक्त कर दिया।
विश्वकोष में संरक्षित किया दुर्लभ चित्र
ब्रज संस्कृति विश्वकोश के सह-संपादक डा. राजेश शर्मा बताते हैं कि गोस्वामी हित हरिवंश महाप्रभु के शरणागत होने पर नरवाहन का हृदय परिवर्तित हुआ और इन्होंने वृंदावन में कोइलिया घाट पर राधावल्लभ का मंदिर बनाया, जो आज क्षतिग्रस्त हो चुका है।
इसके कुछ समय बाद बादशाह अकबर के सेनापति रहीम खानखाना के दीवान सुंदरलाल कायस्थ ने राधावल्लभ मंदिर बनवाया। ब्रज संस्कृति विश्वकोष में संरक्षित का एक चित्र है जिसमें यमुना किनारे गोस्वामी हित हरिवंश महाप्रभु के समीप बैठे नरवाहन तत्कालीन संत समुदाय के साथ चित्रित की गई है।
पाण्डुलिपि में है उल्लेख
(भगवतमुदित द्वारा रचित 16वीं शताब्दी में रसिक अनन्यमाल पांडुलिपि में नरवाहन के संदर्भ में ब्रजभाषा काव्य में भी उल्लिखित है।)
जाकी आज्ञा कोउ न टारै। जो टारै तिहि चढ़ि कै मारै।।
बसि करि लियौ सकल ब्रजदेस। तासौं डरपैं बड़े नरेस।।
आयौ एक बड़ौ व्यापारी। लादैं नाव सौंज बहु भारी।।
देहि जगात न सबसौं अरै। तुपक जमूरन सौं बहुलरै।।
तुपक सात सै वाके संग। दुहुं दिसि लागे लरन अभंग।।