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Mathura News: नियमों के फेर में फंस गई बंदर सफारी
Thu, 24 Aug 2023 01:11 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, मथुरा
संवाद न्यूज एजेंसी, मथुरा
Updated Thu, 24 Aug 2023 01:11 AM IST
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मथुरा। मथुरा-वृंदावन के लोगों को बंदरों की समस्या से राहत दिलाने के लिए चुरमुरा हाथी केंद्र में मंकी सफारी स्थापित करने का प्रोजेक्ट नियमों के फेर में फंस गया है। बंदरों को वन्य जीवों की सूची से बाहर किए जाने के कारण वन विभाग ने 103 करोड़ रुपये के इस प्रोजेक्ट से हाथ खींच लिए हैं। वन विभाग का कहना है कि नई गाइडलाइन के अनुसार नगर निगम को ही अब बंदरों के रेस्क्यू, उनको छोड़ने, उनके लिए उचित स्थान-माहौल तैयार करने पर काम करना है।
सांसद हेमामालिनी द्वारा 2020 में बंदरों की समस्या को संसद में उछाला गया था। उन्होंने ही मंकी सफारी का प्रस्ताव रखा था। इसके बाद जिला स्तर पर काम शुरू हुआ। शासन के निर्देश पर चुरमुरा हाथी केंद्र में 30 एकड़ जमीन पर मंकी सफारी बनाने को डीपीआर तैयार की गई।
103 करोड़ रुपये का पूरा प्रोजेक्ट आगामी दस साल के लिए तैयार कर 2021 में फाइल शासन को भेजी गई थी। अब 2023 में जनवरी में वन विभाग को निर्देश मिला है कि बंदरों को वन्य जीव की सूची से बाहर किया जा चुका है। ऐसे में उनसे संबंधित सभी काम देहात में पंचायती राज विभाग और शहर में नगर निगम द्वारा करने हैं।
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मथुरा-वृंदावन के बंदरों को नहीं पसंद पानी-फल
मथुरा-वृंदावन के बंदरों को पानी और फल नहीं भाते, उनको चने भी पसंद नहीं हैं। यहां के बंदरों को समोसे और फ्रूटी अच्छी लगती है। इस बात को सांसद हेमा मालिनी संसद में भी रख चुकी हैं। उन्होंने कहा था कि मंकी सफारी बनाई जाए ताकि बंदरों को खाने के लिए प्राकृतिक फल मिल सके। उन्होंने बताया कि यहां के बंदर समोसा खाना और फ्रूटी पीना सीख गए हैं, उन्हें अब फल पसंद नहीं आ रहे हैं, जो अच्छी बात नहीं है।
मथुरा में बंदरों के हमले से वृंदावन और उसके आसपास के इलाके में अब तक कई लोगों की मौत हो चुकी है। बंदरों के प्राकृतिक आवास खत्म हो गए हैं और वे भोजन की तलाश में आवासीय इलाकों में आ रहे हैं। वृंदावन में लोग उनके साथ सख्ती से निपटने के लिए मजबूर हैं। तीर्थयात्री बंदरों को कचौरी और समोसा जैसे तले खाद्य पदार्थ देते हैं, जिसके कारण वे बीमार पड़ रहे हैं।
-- -- बंदरों को वन्य जीवों की सूची से बाहर किया जा चुका है। ऐसे में इनसे संबंधित मंकी सफारी प्रोजेक्ट पर अब वन विभाग काम नहीं कर सकता। नगर निगम चाहे तो इसे विकसित कर सकता है।
- रजनीकांत मित्तल, डीएफओ
प्रोजेक्ट पर एक नजर
- 77 करोड़ रुपये मंकी सफारी स्थापित करने और बंदरों को रेस्क्यू करने के लिए प्रस्तावित थे
- 3.12 करोड़ रुपये से संसाधन और इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करना था
01 करोड़ रुपये से लैब और ऑपरेशन थियेटर बनना था
30 लाख रुपये मानव क्षमता पर खर्च करना था
2.71 करोड़ रुपये जागरूकता के लिए वर्कशॉप, ट्रेनिंग पर खर्च करना प्रस्तावित था
45.60 लाख रुपये सालाना परामर्श पर खर्च करने थे
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सांसद हेमामालिनी द्वारा 2020 में बंदरों की समस्या को संसद में उछाला गया था। उन्होंने ही मंकी सफारी का प्रस्ताव रखा था। इसके बाद जिला स्तर पर काम शुरू हुआ। शासन के निर्देश पर चुरमुरा हाथी केंद्र में 30 एकड़ जमीन पर मंकी सफारी बनाने को डीपीआर तैयार की गई।
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103 करोड़ रुपये का पूरा प्रोजेक्ट आगामी दस साल के लिए तैयार कर 2021 में फाइल शासन को भेजी गई थी। अब 2023 में जनवरी में वन विभाग को निर्देश मिला है कि बंदरों को वन्य जीव की सूची से बाहर किया जा चुका है। ऐसे में उनसे संबंधित सभी काम देहात में पंचायती राज विभाग और शहर में नगर निगम द्वारा करने हैं।
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मथुरा-वृंदावन के बंदरों को नहीं पसंद पानी-फल
मथुरा-वृंदावन के बंदरों को पानी और फल नहीं भाते, उनको चने भी पसंद नहीं हैं। यहां के बंदरों को समोसे और फ्रूटी अच्छी लगती है। इस बात को सांसद हेमा मालिनी संसद में भी रख चुकी हैं। उन्होंने कहा था कि मंकी सफारी बनाई जाए ताकि बंदरों को खाने के लिए प्राकृतिक फल मिल सके। उन्होंने बताया कि यहां के बंदर समोसा खाना और फ्रूटी पीना सीख गए हैं, उन्हें अब फल पसंद नहीं आ रहे हैं, जो अच्छी बात नहीं है।
मथुरा में बंदरों के हमले से वृंदावन और उसके आसपास के इलाके में अब तक कई लोगों की मौत हो चुकी है। बंदरों के प्राकृतिक आवास खत्म हो गए हैं और वे भोजन की तलाश में आवासीय इलाकों में आ रहे हैं। वृंदावन में लोग उनके साथ सख्ती से निपटने के लिए मजबूर हैं। तीर्थयात्री बंदरों को कचौरी और समोसा जैसे तले खाद्य पदार्थ देते हैं, जिसके कारण वे बीमार पड़ रहे हैं।
- रजनीकांत मित्तल, डीएफओ
प्रोजेक्ट पर एक नजर
- 77 करोड़ रुपये मंकी सफारी स्थापित करने और बंदरों को रेस्क्यू करने के लिए प्रस्तावित थे
- 3.12 करोड़ रुपये से संसाधन और इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करना था
01 करोड़ रुपये से लैब और ऑपरेशन थियेटर बनना था
30 लाख रुपये मानव क्षमता पर खर्च करना था
2.71 करोड़ रुपये जागरूकता के लिए वर्कशॉप, ट्रेनिंग पर खर्च करना प्रस्तावित था
45.60 लाख रुपये सालाना परामर्श पर खर्च करने थे