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मथुरा: मंगलवार से प्रारंभ होगा मंदिरों में सांझी महोत्सव
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वृंदावन (मथुरा)। श्राद्ध पक्ष प्रारंभ होने के साथ ही धर्म नगरी के प्राचीन मंदिरों में राधा कृष्ण की लीलाओं का साक्षात और परंपरागत रूप सांझी बनाने का क्रम भी प्रारंभ हो जाएगा। 21 सितंबर से शुरु हो रहे धार्मिक कार्यक्रम के अंतर्गत नगर के राधा वल्लभ मंदिर, यशोदानंदन, राधिका प्रिया वल्लभ और शहाजहांपुर वाले मंदिर सहित अनेक मंदिरों में प्रतिदिन सांझी का आयोजन होगा।
ब्रज संस्कृति में सांझी को उपासना का मुख्य अंग माना गया है। सांझी मनोरथ के अंतर्गत पुष्पों की पंखुडिय़ों से तैयार सांझी के दर्शन सायंकाल यहां के विभिन्न देवालयों में किए जा सकते हैं। वृंदावन शोध संस्थान के निदेशक सतीशचंद्र दीक्षित ने बताया कि पुष्पों से बनने वाली सांझी का स्वरूप कृष्ण कालीन है। उन्होंने बताया कि सांझी के विषय में मान्यता है कि सांझी साक्षात राधाकृष्ण का स्वरुप होती हैं, जिसमें राधाकृष्ण की निकुंज लीलाओं का भाव सूखे रंगों के माध्यम से प्रकट किया जाता है। सांझी को विभिन्न फूलों से मंदिर के प्रांगण में कलाकारों द्वारा बनाया जाता है। क्वार मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी से ब्रज के मंदिरों में मिट्टी के रंगों की सांझी प्रारंभ हो जाएगी।
साहित्यकार डॉ. गोपाल चतुर्वेदी ने कहा कि सांझी को ब्रज की लोक देवी माना गया है। यह ब्रज संस्कृति की उपासना का प्रमुख अंग है। ब्रज के अनेक देवालयों में इसे आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से आश्विन कृष्ण अमावस्या तक अंकित किया जाता है। इसके मध्य में भगवान श्रीकृष्ण से संबंधित विभिन्न लीलाओं का भी अंकन किया जाता है। यह ब्रज की लोक चित्रांकन कला है। इसमें सूखे रंगों, फूलों व गोबर आदि के प्रयोग से अष्टकोणीय रूप में ज्यामितीय आकार की विभिन्न दृश्यावलियां फर्श, दीवार व कागज आदि पर बनाई जाती हैं।
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ब्रज संस्कृति में सांझी को उपासना का मुख्य अंग माना गया है। सांझी मनोरथ के अंतर्गत पुष्पों की पंखुडिय़ों से तैयार सांझी के दर्शन सायंकाल यहां के विभिन्न देवालयों में किए जा सकते हैं। वृंदावन शोध संस्थान के निदेशक सतीशचंद्र दीक्षित ने बताया कि पुष्पों से बनने वाली सांझी का स्वरूप कृष्ण कालीन है। उन्होंने बताया कि सांझी के विषय में मान्यता है कि सांझी साक्षात राधाकृष्ण का स्वरुप होती हैं, जिसमें राधाकृष्ण की निकुंज लीलाओं का भाव सूखे रंगों के माध्यम से प्रकट किया जाता है। सांझी को विभिन्न फूलों से मंदिर के प्रांगण में कलाकारों द्वारा बनाया जाता है। क्वार मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी से ब्रज के मंदिरों में मिट्टी के रंगों की सांझी प्रारंभ हो जाएगी।
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साहित्यकार डॉ. गोपाल चतुर्वेदी ने कहा कि सांझी को ब्रज की लोक देवी माना गया है। यह ब्रज संस्कृति की उपासना का प्रमुख अंग है। ब्रज के अनेक देवालयों में इसे आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से आश्विन कृष्ण अमावस्या तक अंकित किया जाता है। इसके मध्य में भगवान श्रीकृष्ण से संबंधित विभिन्न लीलाओं का भी अंकन किया जाता है। यह ब्रज की लोक चित्रांकन कला है। इसमें सूखे रंगों, फूलों व गोबर आदि के प्रयोग से अष्टकोणीय रूप में ज्यामितीय आकार की विभिन्न दृश्यावलियां फर्श, दीवार व कागज आदि पर बनाई जाती हैं।
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