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Mathura News: घर और जमीन छोड़ी थी, पर ईमानदारी और साहस नहीं
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मथुरा। अपना घर, अपनी ज़मीन और अपनों को पीछे छोड़ सिर्फ़ जान बचाने की जद्दोजहद में जुटे दुनिया भर के करोड़ों विस्थापितों के अदम्य साहस को सलाम करने का दिन है...विश्व शरणार्थी दिवस। यह दिन महज़ एक तारीख नहीं, बल्कि उनके संघर्ष, दर्द और उनके भीतर बची उम्मीद की एक मार्मिक दास्तान है। यह दिन पूरी मानवता को याद दिलाता है कि युद्ध, हिंसा और उत्पीड़न के साए से भाग रहे इन बेघर इंसानों को सिर्फ एक सुरक्षित छत ही नहीं, बल्कि सम्मान और सहानुभूति की भी दरकार है।
लगातार आती हिंसा की खबरें और चारों तरफ मौत का मंजर देख खौफनाक साए से भाग रहे लोगों के पास आज सिर छिपाने को मजबूर इन पिंजरों जैसी बस्तियों में बुनियादी सुविधाओं का अकाल है, लेकिन आंखों में अपनी माटी पर लौटने की उम्मीद आज भी जिंदा है। यह दिन पूरी मानवता को झकझोरते हुए याद दिलाता है कि इन बेघरों को सिर्फ एक सुरक्षित छत ही नहीं, बल्कि हमारे सम्मान और सहानुभूति की भी उतनी ही दरकार है।
विश्व शरणार्थी दिवस के अवसर पर सिंधी समाज के प्रतिनिधियों ने विभाजन की पीड़ा और उससे जुड़े सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों को उठाते हुए कहा कि सिंधी समाज ने देश के बंटवारे का दंश झेला है, लेकिन अपनी मेहनत, ईमानदारी और संघर्ष के बल पर हर क्षेत्र में पहचान बनाई है। इस अवसर पर सिंधी जनरल पंचायत अध्यक्ष नारायण दास लखवानी, वरिष्ठ उपाध्यक्ष रामचंद्र खत्री, महामंत्री बसंत मंगलानी और वरिष्ठ मंत्री गुरूमुखदास गंगवानी ने केंद्र सरकार से मांग की कि सिंधी समाज पर लगे शरणार्थी की छाप समाप्त की जाए।
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देश विभाजन ने सिंधी समाज को अपनी जन्मभूमि सिंध से दूर कर दिया। उन्होंने कहा कि सिंधी हिंदू किसी विदेशी देश से नहीं आए थे, बल्कि अखंड भारत के एक हिस्से सिंध से भारत पहुंचे थे, इसके बावजूद उन्हें अपने ही देश में शरणार्थी कहलाने का दर्द झेलना पड़ा।
किशोर इसरानी, संस्थापक, सिंधी जागरूक मंच
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लगातार आती हिंसा की खबरें और चारों तरफ मौत का मंजर देख खौफनाक साए से भाग रहे लोगों के पास आज सिर छिपाने को मजबूर इन पिंजरों जैसी बस्तियों में बुनियादी सुविधाओं का अकाल है, लेकिन आंखों में अपनी माटी पर लौटने की उम्मीद आज भी जिंदा है। यह दिन पूरी मानवता को झकझोरते हुए याद दिलाता है कि इन बेघरों को सिर्फ एक सुरक्षित छत ही नहीं, बल्कि हमारे सम्मान और सहानुभूति की भी उतनी ही दरकार है।
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विश्व शरणार्थी दिवस के अवसर पर सिंधी समाज के प्रतिनिधियों ने विभाजन की पीड़ा और उससे जुड़े सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों को उठाते हुए कहा कि सिंधी समाज ने देश के बंटवारे का दंश झेला है, लेकिन अपनी मेहनत, ईमानदारी और संघर्ष के बल पर हर क्षेत्र में पहचान बनाई है। इस अवसर पर सिंधी जनरल पंचायत अध्यक्ष नारायण दास लखवानी, वरिष्ठ उपाध्यक्ष रामचंद्र खत्री, महामंत्री बसंत मंगलानी और वरिष्ठ मंत्री गुरूमुखदास गंगवानी ने केंद्र सरकार से मांग की कि सिंधी समाज पर लगे शरणार्थी की छाप समाप्त की जाए।
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देश विभाजन ने सिंधी समाज को अपनी जन्मभूमि सिंध से दूर कर दिया। उन्होंने कहा कि सिंधी हिंदू किसी विदेशी देश से नहीं आए थे, बल्कि अखंड भारत के एक हिस्से सिंध से भारत पहुंचे थे, इसके बावजूद उन्हें अपने ही देश में शरणार्थी कहलाने का दर्द झेलना पड़ा।
किशोर इसरानी, संस्थापक, सिंधी जागरूक मंच