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कृष्णभक्त राधा का मौन ‘तप’
कुशल प्रताप सिंह
Updated Wed, 09 Sep 2015 11:45 PM IST
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भगवान श्रीकृष्ण की लीलास्थलियों में से एक बेलवन के निकट का गांव जहांगीरपुर में इन दिनों आसपास के लोगों का तांता लगा हुआ है। इसका कारण गांव से 200 मीटर दूर खेतों (स्थानीय बोली में जंगल) के पास निर्जन स्थान में फूस से बनी कुटिया है जिसमें अन्न त्याग चुकी एक महिला ‘तपस्यारत’ है। लोग उन्हीं के दर्शन करने आ रहे हैं। श्रद्धा तब और बढ़ गई जब चर्चा फैली कि वह आगामी तीन नवंबर को शरीर त्याग देंगी।
‘तपस्यारत’ महिला का नाम राधा (45) है। मूलरूप से तमिलनाडु की राधा का परिवार काफी समय से वृंदावन में ही रहता है। उनकी मां कौशल्या राम वहां एक आश्रम की प्रबंधक हैं। यहां रहते हुए भी परिवार के लोगों का तमिलनाडु आना-जाना रहता है। विवाहित राधा की शुरू से कृष्ण में अनन्य आस्था रही है। पहले भी वह कई स्थानों पर एकांत में छह-छह महीने साधनारत रह चुकी हैं। इस बार वह करीब एक महीने पहले वृंदावन से जहांगीरपुर के जंगल में कुटिया बनाकर रहने लगीं। चारो ओर से बंद कुटिया से वह बाहर भी नहीं आतीं। भीतर रखी कृष्ण-बलराम की प्रतिमा के समक्ष आसन लगा पूजारत रहती हैं। बीच-बीच में आने वाली मां कौशल्याराम ही एक झरोखे से उन्हें जल आदि पेय दे जाती हैं। आने वाले भी इसी झरोखे से उनके दर्शन करते हैं।
इसी बीच गांव में चर्चा फैली कि राधा ने मौन लेने से पहले बताया था कि वह 3 नवंबर को प्राण त्याग देंगी। यह पता लगते ही दो-तीन दिन पहले उनकी मां यहां आईं। वह इशारे से उन्हें तपस्या उठने के लिए समझाती रहती हैं। इसी कोशिश को बल देने उनके पति और परिवार के अन्य लोगों को बुलाया गया है। इधर जैसे-जैसे चर्चा फैल रही है, राधा के दर्शन करने वालों की संख्या भी बढ़ती जा रही है।
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बेलवन का महत्व
कथाओं के मुताबिक, बेलवन में भगवान श्री कृष्ण और गोपिकाओं के महारास में शामिल होने के लिए एक बार स्वयं लक्ष्मी जी लालायित हुईं। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें बताया कि यह गोपियों की तपस्या है जो वे महारास में शामिल हैं। उन्होंने लक्ष्मी जी को रास में शामिल होने के लिए उन्हीं के समान तप करने को कहा था।
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‘तपस्यारत’ महिला का नाम राधा (45) है। मूलरूप से तमिलनाडु की राधा का परिवार काफी समय से वृंदावन में ही रहता है। उनकी मां कौशल्या राम वहां एक आश्रम की प्रबंधक हैं। यहां रहते हुए भी परिवार के लोगों का तमिलनाडु आना-जाना रहता है। विवाहित राधा की शुरू से कृष्ण में अनन्य आस्था रही है। पहले भी वह कई स्थानों पर एकांत में छह-छह महीने साधनारत रह चुकी हैं। इस बार वह करीब एक महीने पहले वृंदावन से जहांगीरपुर के जंगल में कुटिया बनाकर रहने लगीं। चारो ओर से बंद कुटिया से वह बाहर भी नहीं आतीं। भीतर रखी कृष्ण-बलराम की प्रतिमा के समक्ष आसन लगा पूजारत रहती हैं। बीच-बीच में आने वाली मां कौशल्याराम ही एक झरोखे से उन्हें जल आदि पेय दे जाती हैं। आने वाले भी इसी झरोखे से उनके दर्शन करते हैं।
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इसी बीच गांव में चर्चा फैली कि राधा ने मौन लेने से पहले बताया था कि वह 3 नवंबर को प्राण त्याग देंगी। यह पता लगते ही दो-तीन दिन पहले उनकी मां यहां आईं। वह इशारे से उन्हें तपस्या उठने के लिए समझाती रहती हैं। इसी कोशिश को बल देने उनके पति और परिवार के अन्य लोगों को बुलाया गया है। इधर जैसे-जैसे चर्चा फैल रही है, राधा के दर्शन करने वालों की संख्या भी बढ़ती जा रही है।
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बेलवन का महत्व
कथाओं के मुताबिक, बेलवन में भगवान श्री कृष्ण और गोपिकाओं के महारास में शामिल होने के लिए एक बार स्वयं लक्ष्मी जी लालायित हुईं। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें बताया कि यह गोपियों की तपस्या है जो वे महारास में शामिल हैं। उन्होंने लक्ष्मी जी को रास में शामिल होने के लिए उन्हीं के समान तप करने को कहा था।