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मथुरा हादसा: टीला ढहने से उजड़े आशियाने... अब इस हाल में पीड़ित, चार दिन से नहीं बदले पकड़े; चाय तक नहीं मिली

Thu, 19 Jun 2025 01:24 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, मथुरा
संवाद न्यूज एजेंसी, मथुरा Published by: अमर उजाला ब्यूरो Updated Thu, 19 Jun 2025 01:24 AM IST
सार

पीड़ित सूरजभान के पुत्र राकेश ने बताया कि वह अपने परिवार के 18 सदस्यों के साथ धर्मशाला में रह रहे हैं। चार दिनों से उन्होंने कपड़े भी नहीं बदले हैं।

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Kshatriya Dharamshala is the new place for the victim families, not DUDA housing
क्षत्रिय धर्मशाला में मायूस बैठे पीड़ित परिवार। - फोटो : mathura

विस्तार

मथुरा के माया टीले पर हुए हादसे में उजड़े मकानों में रहने वाले परिवारों को प्रशासन ने वृंदावन में डूडा आवास दिए थे, लेकिन ये आवास उनका घर नहीं बन पाए। अव्यवस्थाओं और आवासों की बदहाली से परेशान होकर पीड़ित परिवारों ने क्षत्रिय धर्मशाला को अपना ठिकाना बनाया है। पीड़ितों की मांग उन्हें माया टीला या आसपास ही बसाने की है।
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पांच परिवारों को प्रशासन ने दो दिन सोमवार को पहले डूडा आवास वृंदावन में मकान आवंटित किए थे। उसी दिन उनका सामान भी वहां पहुंचाया गया था। लेकिन अगले ही दिन पीड़ित परिवार वहां से लौट आए। अब वे माया टीले के पास ही स्थित क्षत्रिय धर्मशाला में रह रहे हैं। पीड़ित सूरजभान के पुत्र राकेश ने बताया कि वह अपने परिवार के 18 सदस्यों के साथ धर्मशाला में रह रहे हैं। चार दिनों से उन्होंने कपड़े भी नहीं बदले हैं। ढहने के बाद बचे मकान के बाहरी हिस्से में कुछ सामान बचा है, लेकिन उसे पुलिस नहीं निकालने दे रही है।
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उन्होंने बताया कि डूडा के आवास बदहाल हैं और वहां रहना उनके लिए संभव नहीं है। बताया कि सोमवार को जब वह लोग वहां पहुंचे थे तो वहां रहने वाले लोग उन्हें बुरा-भला कह रहे थे। इसके साथ ही उनके लिए मथुरा में काम करना और वृंदावन में रहना संभव नहीं है। कुछ यही स्थिति पीड़ित मानसिंह, प्रमोद शर्मा, विनोद सैनी और हेमंत के परिवार की भी है। हेमंत ने इस हादसे में अपने भाई तोताराम को खो दिया था। उसका पूरा मकान ढह गया और सामान भी मलबे में दबकर नष्ट हो गया। उसकी भी मांग बस एक ही है कि उन्हें मथुरा में ही बसाया जाए।
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पीड़ित प्रमोद शर्मा का दर्द उनके चेहरे पर साफ झलक रहा था। उन्होंने बताया कि उन्होंने कर्ज लेकर मकान बनाया था और किसी तरह परिवार का पेट पाल रहे थे। अब उनके पास न मकान है और न ही परिवार का पेट भरने के लिए भोजन। सभी पीड़ितों का कहना साफ है कि वे जहां रहते थे, उन्हें वहीं बसाया जाए। किसी भी हाल में वे वृंदावन के डूडा आवासों में रहने के लिए तैयार नहीं हैं।

किराया नहीं तो कैसे जाएं वृंदावन
पीड़ित ललिता का कहना है कि उनके पास खाने के लिए भी रुपये नहीं हैं। अधिकांश परिवार मथुरा में ही कोई न कोई काम करते हैं। ऐसे में वे वृंदावन से मथुरा तक का किराया कहां से लाएं। साथ ही यह भी बताया कि डूडा के आवासों में न खिड़कीं हैं न दरवाजे, ऐसे में उनकी सुरक्षा को भी खतरा है। पीड़ितों में अधिकांश परिवार चांदी कारीगर हैं, इसके लिए सुरक्षा बेहद जरूरी है। प्रशासन द्वारा मदद किए जाने के सवाल पर उन्होंने कहा कि दोपहर एक बजे तक प्रशासन ने चाय तक की व्यवस्था नहीं की है, ऐसे में प्रशासन से क्या ही उम्मीद करें।

टूट गए डूडा आवासों के ताल, निकाल लिया कूलर
पीड़ित प्रमोद और राकेश ने बताया कि डूडा आवासों में उन्होंने अपना कुछ सामान रखा था। उन्हें एक कूलर भी प्रशासन की ओर से दिया गया था। प्रमोद ने बताया किसी ने फोन कर कूलर वापस मांग लिया। वहीं बुधवार को जब वह डूडा आवास गए तो वहां उनका लगाया ताला तोड़कर किसी दूसरे ने अपना ताला लगा दिया। राकेश को आवंटित आवास में भी उनका ताला तोड़कर दूसरा ताला लगा मिला। हादसे के बाद जो सामान उन्होंने किसी तरह जुटाया था अब वह भी खतरे में है।

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